Bollywood: ये सच्ची कहानी है एक आम आदमी की एक दिग्गज फिल्म डायरेक्टर बनने की – इससे मिल सकती है बड़ी प्रेरणा फिल्मी दुनिया के नये लोगों को..
साल 1958 की बात है, आगरा का एक नौजवान अपनी आंखों में हीरो बनने का सपना लिए सपनों की नगरी मुंबई पहुंचा। लेकिन हकीकत ख्वाबों से जुदा थी। बहुत संघर्ष के बाद भी वह हीरो नहीं बन सका और उसे एक ‘जूनियर आर्टिस्ट’ के रूप में काम करना पड़ा। करीब सात महीनों तक भीड़ का हिस्सा बनकर काम करने के बाद उसे समझ आ गया कि एक्टिंग उसके बस की बात नहीं है। लेकिन आगरा वापस लौटने की हिम्मत भी नहीं थी, क्योंकि वह खाली हाथ नहीं जाना चाहता था।
असिस्टेंट डायरेक्टर से बड़े निर्माता तक का सफर तभी उस नौजवान ने फिल्म लाइन में ही पीछे रहकर काम करने का सोचा। उन दिनों आर.के. नय्यर अपनी पहली फिल्म ‘लव इन शिमला’ बना रहे थे। आगरा का वह लड़का उनसे मिला और काम मांगा। नय्यर साहब ने उसे अपना असिस्टेंट बना लिया और फिल्म में एक छोटा सा रोल भी दिया। उस लड़के ने जी-तोड़ मेहनत की और एक दिन वह खुद फिल्म इंडस्ट्री का एक बड़ा डायरेक्टर और प्रोड्यूसर बनकर उभरा। उसने ‘अनहोनी’, ‘मजबूर’, ‘खेल खेल में’, ‘ज़िंदगी’, ‘झूठा कहीं का’ और ‘नज़राना’ जैसी शानदार फिल्में बनाईं। फिल्म जगत में वह एक सम्मानित नाम बने और उनकी बेटी ‘रवीना टंडन’ आगे चलकर बॉलीवुड की टॉप एक्ट्रेस बनीं। हम बात कर रहे हैं दिग्गज फिल्मकार रवि टंडन की।
कड़कड़ाती धूप और 104 डिग्री बुखार में शूटिंग आज रवि टंडन जी की पुण्यतिथि है (11 फरवरी 2022 को उनका निधन हुआ था)। उनके संघर्ष का एक किस्सा बहुत मशहूर है। जब वह जूनियर आर्टिस्ट थे, तब एक बार घोड़बंदर में शूटिंग चल रही थी। भीषण गर्मी थी और रवि जी को तेज बुखार था। फिल्म के हीरो रंजन और हीरोइन अमीता घोड़े पर थे और जूनियर आर्टिस्ट्स को उनके पीछे दौड़ना था। रवि जी ने कमजोरी की वजह से दौड़ने से मना किया, तो प्रोडक्शन मैनेजर ने कहा कि अगर नहीं दौड़ोगे तो वापस जाने का टिकट कटा लो। पैसों की तंगी की वजह से रवि जी ने हार नहीं मानी और तपती दोपहर में बुखार के बावजूद दिन भर दौड़ते रहे। शाम तक उनका बुखार और बढ़ गया, लेकिन उन्होंने अपना काम पूरा किया।
जब वक्त का पहिया घूमा: बदले की जगह दिया सम्मान रवि टंडन जी के जीवन का सबसे भावुक किस्सा वह है जब उन्हें एक डायरेक्टर ने गाली देकर सेट से निकाल दिया था। दरअसल, जूनियर आर्टिस्ट के दिनों में एक फिल्म की शूटिंग के दौरान रवि जी एक डायलॉग ठीक से नहीं बोल पा रहे थे। डायरेक्टर ने उन्हें बुरी तरह जलील किया और बेइज्जत कर भगा दिया।
बरसों बाद, जब रवि टंडन खुद एक बड़े डायरेक्टर बन गए, तो वह 1971 में फिल्म ‘बलिदान’ बना रहे थे। उन्होंने देखा कि उनकी फिल्म में एक जूनियर आर्टिस्ट वही शख्स है जिसने कभी उन्हें अपमानित किया था। वह डायरेक्टर अब दाने-दाने को मोहताज था। रवि टंडन ने बदला लेने के बजाय बड़प्पन दिखाया। उन्होंने उस व्यक्ति को मेकअप रूम में आराम से बैठने को कहा और पक्का किया कि उसे पूरे पैसे मिलें। इतना ही नहीं, रवि जी शॉट लेने से पहले उस पुराने डायरेक्टर से सलाह भी लेते थे ताकि उसे सम्मान महसूस हो। रवि जी के इस व्यवहार ने उस व्यक्ति की आंखों में आंसू ला दिए और उसने अपने पुराने बर्ताव के लिए माफी मांगी।
रवि टंडन जी ने उस डायरेक्टर का नाम कभी उजागर नहीं किया, क्योंकि वे किसी की गरिमा को ठेस नहीं पहुंचाना चाहते थे। ऐसे महान और उदार व्यक्तित्व थे रवि टंडन साहब। आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें कोटि-कोटि नमन।



