स्त्रियाँ केवल भोगसामग्री या बच्चा पैदा करने का यन्त्र ही नहीं, अपितु, वे प्रत्यक्ष लक्ष्मी है। उनके सतीत्व की विशेषता से वेद-शास्त्र पुराणों के अमित पृष्ठ रञ्जित हैं। पुरुष के चरित्र भ्रष्ट होने पर वहाँ उन दुष्परिणामों का भोक्ता होता है, स्त्री का चरित्र भ्रष्ट होने से मातृ पितृकुल दोनों ही कलंकित और अपमानित होते हैं। स्त्रियां सदाचारिणी एवं पतिव्रता रहकर पतिकुल तथा पितृकुल दोनों का कल्याण कर सकतीं है। सती नारी साक्षात् गङ्गा किं वा उमामहेश्वरस्वरूप मानी गयी हैं—
न गङ्गया तया भेदो या नारी पतिदेवता ।
उमामहेश्वरः साक्षात् तस्मात्तां पूजयेद् बुधः । ।
स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु । त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् । ।
इत्यादि भावनाओं के सामने क्षुद्र विषयेन्द्रिय सम्प्रयोगज सुखों का कितना मूल्य रह जाता है? स्त्रियों के इन्हीं उदात्त भावों के रक्षार्थ धर्मशास्त्रों के कठोर नियम है। यद्यपि तर्क की दृष्टि से कहा जा सकता है कि ये ही नियम पुरुषों के लिए भी उचित होने चाहिए, तथापि धर्मशास्त्रों ने शरीर, इन्द्रिय, स्वभाव, शक्ति, प्रकृति की विलक्षणता को देखते हुए इनके रहन-सहन, कर्तव्यों आदि में भेद रखा है। जैसे सब रोगों के लिए समान औषधियों का प्रयोग नहीं हो सकता वैसे ही हर एक अधिकारी के लिए समान कर्म भी नहीं हो सकते। स्पष्ट है कि स्त्री साल में एक ही गर्भ धारण कर सकती है, परन्तु पुरुष तो कई गर्भाधान कर सकता है। पुरुष के लिए यज्ञ, तप, दान, त्याग की विशेषता है। अग्निहोत्रादि वैदिक कर्म बिना दारपारिग्रह के नहीं हो सकते। पुरुष का विधुर जीवन निषिद्ध है। अतः वैदिक कर्म-कलाप प्रचलित रहने के लिए पुरुष का पुनर्विवाह सङ्गत है । परन्तु स्त्री की तो पतिसहगमन या वैधव्यधर्मपालन में ही परमसद्गति सम्भव है। अतएव पति के अभाव में उसका प्रवृत्तिमार्ग निरुद्ध हो जाता है। कहा जाता है कि पुरुषों ने द्वेषवश स्त्रियों पर अत्याचार किया है। जहां-तहां शास्त्रों में भी स्त्रियों की बहुत निन्दा की गई है, परन्तु ऐसा कहने वाले स्त्रियों की प्रशंसाओं की भातों को भूल जाते हैं। हिन्दूशास्त्रों में जैसा माता का सम्मान मिलेगा, वैसा कहीं भी नहीं मिल सकता। पिता से भी दशगुणित माता का गौरव माना गया है
पितुर्दशगुणा माता गौरवेणातिरिच्यते ।
सीता, सावित्री, अरुन्धती, अनुसूया, कौशल्या, सुमित्रा, प्रभृति सतियों का जितना आदर और सम्मान शास्त्रों में है, उसे देखते हुए किसे कहने का साहस हो सकता है कि यहाँ स्त्रियों का अनादर है? मनु भगवान् स्पष्ट लिखते है कि “स्त्रियां साक्षात् लक्ष्मी है। उनकी पूजा जहाँ होती है, वहाँ सब प्रकार की समृद्धि होती है जहाँ इनका अपमान होता है, वहाँ सब प्रकार की विपत्ति आती है।” प्रमादियों द्वारा उनका अपमान भी अवश्य होता है परन्तु इतने से शास्त्रों और तन्निष्ठों पर दोषारोपण नहीं किया जा सकता। शास्त्रों में जो स्त्रियों के दोषों का प्रसङ्ग है, वह कुछ स्थलों में वैसे स्वभाववालियों का स्वभावानुवाद और कुछ स्थलों में वैराग्य के लिए दोष-दर्शनमात्र है। दोष वहाँ ही दिखलाया जाता है जहाँ स्वाभाविक राग होता है। स्त्रियों में पुरुषों का राग स्वाभाविक है। बड़े-बड़े योगीन्द्र मुनीन्द्र भी सदा स्त्रियों में दोष- दर्शन करते रहते हैं, उन्हें भी इस राग के वश में ही जाना पड़ता है। फिर जब दोष-वर्णन और दर्शन करते हुए भी लोगों को रागवश होना पड़ता है, तो फिर गुणानुसन्धान में तो कहना ही क्या? वह तो स्वभाव से ही होता है, क्योंकि वस्तु सौष्ठवबुद्धि के बिना तो राग होता नहीं। अनुचित राग से बचने के लिए जैसे पुरुष स्त्रियों में दोषानुसंधान करते हैं, वैसे स्त्रियों को भी पुरुष में दोषानुसंधान करना चाहिए। परस्त्री या परपुरुष में राग सर्वथा ही पतन का मूल है। उससे बचने के लिए दोषानुसंधान युक्त ही है। यह बात दूसरी है कि जब निखिल विश्व में भगवदबुद्धि या भगवती की भावना हो जाय तब इसकी आवश्यकता ही नहीं रहती। स्त्रियां स्वभाव से ही लज्जाशील होती है। उनमें अपनी ओर से चञ्चलता कम होती है, उसकी अधिकता तो पुरुषों में ही होती है, अतः उन्हें ही अधिक दोषदर्शन की अपेक्षा होती है।
इसके अतिरिक्त स्त्री का निज पति में राग से ही कल्याण हो जाता है। परन्तु पुरुष का पत्नी के ही राग से कल्याण नहीं होता। अतः भगवान् में राग के लिए लौकिक राग मिटाना पुरुषों के लिए बहुत आवश्यक होता है। जैसे शिष्य का या विश्व का किसी भगवत्परायण में प्रेम होना कल्याणप्रद ही है, परन्तु वैसे ही भगवत्परायण की शिष्य या विश्व में आसक्ति कल्याणप्रद नहीं कही जा सकतदी। भगवान् से विमुख विश्व के पीछे भागना यह ‘३३’ की स्थिति दोनों ही के लिए भयावनी है। इसकी अपेक्षा ‘३६’ की स्थिति अच्छी है। विश्व अपने प्रपञ्च में रहे और भगवत्परायण विश्व की उपेक्षा करके भगवान् की ओर प्रवृत्त हो। इसके अतिरिक्त ‘६३’ की स्थिति है, जिसमें संसार महात्मा की ओर और महात्मा संसार की ओर परन्तु इससे भी कोई लाभ नहीं। सब से ठीक स्थिति तो ‘६६’ की है अर्थात् महात्मा भगवत्परायण हो और संसार उनका अनुगमन करे, तब दोनों ही कल्याण प्राप्त कर सकते हैं। यही स्थिति इधर भी है, पत्नी पतिपरायण हो और पति भगवत्परायण हो, तो दोनों ही की दिव्य गति हो सकती है। इसलिए वैराग्यार्थ स्वाभाविक राग को कुछ शिथिल करने के लिए जैसे अन्यान्य विषयों में दोष-वर्णन है वैसे ही स्त्रियों में भी दोषों का प्रदर्शन कराया गया है। यह दोष भी प्रधान रूप से परस्त्रियों में प्रीतिवारणार्थ और असत्स्वभाववाली स्त्रियों का स्वभावकीर्त्तन है। साध्वी सती स्त्रियों को तो साक्षात् लक्ष्मी कहकर उनकी प्रशंसा ही विभिन्न स्थलों में की गयी है। वस्तुतः स्त्री- पुरुष सभी की स्वधर्म पालन से प्रशंसा और विधर्मस्थ होने से निन्दा होती है।
जैसे कामधेनु के रहने पर दुग्ध की चिन्ता नहीं होती वैसे ही धर्म में प्रीति रहने पर वस्तु की कमी नहीं रहती। जैसे जल का नीचे की ओर बहने का ही स्वभाव होता है, वैसे ही भगवत्परायण की ओर सबका हृदय झुक ही जाता है। दाम्भिक भी छल छद्य से बहुतेरों के श्रद्धाभाजन बन जाते हैं। परन्तु अन्त में उनका दम्भ अवश्य खुल जाता है। परिपूर्ण पुरुषोत्तम के सर्वत्र सर्वस्वरूप से ही दर्शन की कमी में किसी से द्वेष हो सकता है। निरपराध प्राणी को भी लोगों से निन्दा करने पर अपने को निर्दोष समझकर क्षुब्ध न होना चाहिए, क्योंकि सबसे बड़ा दोष तो यही है कि अबतक संसारबन्धन से मुक्त होकर भगवत्पद को प्राप्त नहीं किया। भगवान् और धर्म से विमुख रहने पर अपना काम तो बिगड़ता ही है, संसार घृणा और निन्दा ऊपर से करता है। स्वधर्मपालन एवं भगवदाराधन से प्राणी आत्मकल्याण के साथ-साथ संसार की पूजा और प्रशंसा का भी पात्र हो जाता है। अनिच्छा से भी की गयी भगवान् की भक्ति से प्राणियों को अनन्त सुख ही मिलता है। धर्मशील के पास बिना बुलाये ही समस्त सुख सम्पत्तियां पहुंचती है। जैसे समस्त सरिता सागर के पास पहुँचती है, यद्यपि उसे उनकी कामना नहीं है। इसी तरह समस्त सुख सम्पत्तियों धर्मनिष्ठ के पास पहुँचती है, यद्यपि उसे किन्हीं की भी अपेक्षा नहीं है। पारमार्थिक सिद्धान्त यही है कि जो स्वधर्मनिष्ठ है, वही वन्दनीय एवं आदरणीय है। स्वधर्मबहिर्मुख पुरुष नरकगामी हो सकते हैं। स्वधर्मनिष्ठ नारी ऐहिक पारलौकिक अनेक प्रकार की सुखभागिनी होती हुई परमनिः श्रेयस् को प्राप्त कर लेती है और लोक में भी पार्वती के समान वन्दनीय होती है।
एक अध्यापिका ने प्रश्न किया था कि ‘भगवान् शंकराचार्यजी ने “द्वारं किमेकं नरकस्य नारी” इत्यादि वचनों से स्त्री को नरक का द्वार आदि बतलाकर स्त्रीजाति की निन्दा क्यों की है? क्या स्त्री के लिए पुरुष को नरक का द्वार नहीं कहा जा सकता?’ इसका उत्तर यह है कि यद्यपि स्त्री के लिए परपुरुष अवश्य नरक का द्वार है, तथापि भक्ति से, तथापि भक्ति से, पतिव्रत धर्म के पालन से, स्त्री अपना और अपने मातृकुल, पितृकुल एवं पतिकुल का भी कल्याण कर सकती है। दुराचारी पति का भी स्त्री कल्याण कर सकती है, परन्तु पति दुराचारिणी पत्नी का कल्याण नहीं कर सकता।
वस्तुतः निन्दा का तात्पर्य वैराग्य उत्पन्न करने में ही हो। श्रीशंकराचार्य ने ही क्या सभी शास्त्रों ने स्त्रियों में दोषदर्शन के लिए उनकी निन्दा की है। विवेकियों को भी स्त्री आदि विषयों में व्यामोह हो जाता है, जिससे कल्याण का मार्ग रुक जाता है। जैसे शिष्य का गुरुभक्ति से कल्याण होता है, वैसे ही गुरु के लिए शिष्यभक्ति अपेक्षित नहीं उसे तो भगवद्भक्ति की ही अपेक्षा होती है। वैसे ही स्त्री का पतिभक्ति से ही कल्याण हो जाता है।परन्तु पति का पत्नि भक्ति से कल्याण नहीं, उसे भगवद्भक्ति करनी होगी
हां, इस तथ्य को स्त्रीजाति की निन्दा नहीं समझना चाहिए, क्योंकि स्त्रीजाति में ही माता होती हैं। माता की भक्ति से परमकल्याण होता है। माता साक्षात् अनन्तकोटि ब्रह्माण्डजननी भगवती का ही स्वरूप है। उसकी आराधना से अनायास ही प्राणियों के हाथ कल्याण आ जाता है। साधारण रूप से बलवान् इन्द्रियग्राम मातृबुद्धि न होने देकर निकृष्ट बुद्धि ही उत्पन्न करता है, इसीलिए युवतियों के संग को शास्त्रों ने मना किया है।
कल्याण चाहनेवाली स्त्री को भी अपने पति को छोड़कर अन्य पुरुषों के दर्शन स्पर्शनादि संग से अत्यन्त बचना चाहिए। पुरुष स्त्रियों के विषय में जो दोष कहे गये हैं, उन सभी दोषों को स्त्री को अन्य पुरुषों के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए। अभियोक्ता पुरुष के ही अपराध से स्त्री अपराधिनी बनती है, स्वतन्त्र रूप से स्त्री की अनाचार में प्रवृत्ति कदापि नहीं होती। अतएव एक वेदमन्त्र में कोई राजा कहता है कि मेरे राज्य में स्वैरी नहीं, तो स्वैरिणी कहाँ से हो सकती है?-
“न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न नास्तिकः ।…
न स्वैरी स्वैरिणी कुतः।।”
गुणमयी देवी माया के दुरत्यय प्रभाव से साधारण ज्ञानी भी विषयों के संसर्ग से मोहित हो जाते हैं। वाताम्बुपर्णाशी (वायु, जल, पत्ते खानेवाले) विश्वामित्र, पराशर प्रभृति मुनिगण भी स्त्री आदि विषयों के सौन्दर्य में जब मोहित हो सकते हैं, तब फिर शाधारण दुग्ध, दधि, घृत, ओदनादि खानेवाले प्राणी मोहित हों, इसमें क्या आश्चर्य है? विषयों की अपवित्रता, क्षणभंगुरता अस्थि मांस चर्ममय पंजरस्वरूपता आदि समझते हुए भी माया जवनिका से दोषों का आवरण हो जाता है। चमकीली चमड़ी से आवृत हो जाने के कारण सम्पूर्ण दोष छिप जाते है। कोमलाङ्गी चमकीली सर्पिणी के स्पर्श के समान चमकीली कोमलांगी कामिनी का स्पर्श खतरे से खाली नहीं है।
ऐसे भाव भी अपरिपक्व मन पर असर नहीं कर सकते, इसीलिए तपस्या भगवद्भक्ति, दोषदर्शन- सहित संसर्गत्याग होने पर ही प्राणी में अन्तर्मुखता रह सकती है, अन्यथा नहीं। इन सब भावों को समझकर ही उर्वशी के विरह से खिन्न होकर सम्राट ऐल ने कहा था- ‘अहो! मेरे मोह का कितना विस्तार हुआ? उर्वशी में आसक्त हुए मेरे कितने आयु के भाग बीत गये? मैने अनेकों वर्ष समूह तक सूर्य का उदय और अस्त भी नहीं जाना, मैंने चक्रवर्ती नरेन्द्र होकर भी अपने को स्त्रियों का क्रीड़ामृग बना डाला। उसकी विद्या, तपस्या, त्याग, श्रुत, एकान्तवास, मौन सब व्यर्थ है, जिसका मन स्त्री द्वारा अपहृत हुआ है-
किं विद्यया किं तपसा किं त्यागेन श्रुतेन वा ।
किं विविक्तेन मौनेन स्त्रीभिर्यस्य मनो हृतम् । ।
मुझ स्वार्थवंचित पण्डितमानी मूर्ख को धिक्कार है, जो समर्थ होकर भी गो-खर के समान स्त्री से पराजित हुआ। अनेकों वर्ष उर्वशी के अधरासव का पान करने पर भी मेरे काम की तृप्ति वैसे ही नहीं हुई, जैसे घृताहुति से अग्नि की तृप्ति नहीं होती। इसलिए साधक को चाहिए कि वह कभी भी स्त्रैणों और स्त्रियों का संग न करे, क्योंकि विषयों और इन्द्रियों के सम्प्रयोग से ही मन में क्षोभ उत्पन्न होता है, अन्यथा नहीं। अदृष्ट, अश्रुत वस्तु से किसी प्रकार का विकार नहीं होता । इन्द्रियों का विषय- सम्प्रयोग रुक जाने से संकुचित होकर मन भी शान्त हो जाता है –
अथापि नोपसज्जेत स्त्रीषु स्त्रैणेषु चार्थवित्।
विषयेन्द्रियसंयोगान्मनः क्षुभ्यति नान्यथा । ।
अदृष्टादश्रुताद् भावान्न भाव उपजायते ।
असम्प्रयुञ्जतः प्राणान् शाम्यति स्तिमितं मनः ।।
हजारों तन्त्र, मन्त्र, योग, युक्ति आदि से भी दुःसाध्य मन के निरोध और कामादि दोषों के मिटाने का यही उपाय है कि विषयों और इन्द्रियों का सम्बन्ध न होने पाये। भोगाभ्यास से इन्द्रियों की कुशलता, विषयों के प्रति चञ्चलता बढ़ती है, भोगाभ्यास कम होने से वह घट जाती है। इसलिए परमकृपालु कृष्ण भगवान् ने उद्धव से कहा है-
तस्मादुद्धव मा भुङ्क्ष्व विषयानसदिन्द्रियैः ।
आत्माग्रहणनिर्भातं पश्य वैकल्पिकं भ्रमम् ।।
अर्थात् हे उद्धव! तुम इन दुष्ट इन्द्रियों से भोगों का ग्रहण मत करो। आत्मा के अग्रहण से प्रतिभासमान संसार को केवल वैकल्पिक भ्रम समझकर उपरत हो जाओ। बाह्य रूप से विषयों का संग छूट जाने पर भी वासनारूप से हृदय में स्थिथ विषयों का अनुसन्धान मन से होता है। उससे प्राणी का अनर्थ हो जाता है-
ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते।। वासनारूप में स्थित अन्तर विषयों का चिन्तन करने से उनके प्रति प्रीति और फिर उन्हें प्राप्त करने की अभिलाषा उत्पन्न हो जाती है।उत्कट कामवेग हो जाने से फिर प्रवृत्ति का रुकना कठिन हो जाता है, अतः सत्संग, सच्छास्त्राभ्यास, हरिचरित्रश्रवण, वेदान्त-विचार, जप, ध्यान आदि से विषयों का चिन्तन भी छोड़ना चाहिए। वस, इस कार्यो में सफल होते ही प्राणी निर्भय पद पा लेता है। जाती है।
सारांश यह है कि शंकराचार्य, तुलसीदास तथा सभी शास्त्र प्राणिकल्याणार्थ ही विषयों से वैराग्य के लिए उनमें दोष वर्णन करते हैं। पुरुष के लिए स्त्री कल्याणमार्ग में सबसे अधिक बाधक है, अतः स्वाभाविक राग मिटाने के लिए ही आचार्यों का यह तीव्र प्रयत्न है। परपुरुष के प्रति स्त्री भी यही भावना बना सकती है। परन्तु एक अपने पति में आसक्तचित्त स्त्री को अन्यत्र राग बहुत कम प्राप्त होता है, अत: स्त्री के लिए पृथक् वैराग्य का उल्लेख कम मिलता है, जिस स्वाभाविक प्रीति का शास्त्र से भी समर्थन या विधान होता है, उससे वैराग्य और उसमें दोषदर्शन का विधान अनावश्यक होता है। जैसे प्राणी गुरुभक्ति द्वारा क्रमेण ब्रह्मनिष्ठ हो जाता है, वैसे ही स्त्री पतिभक्ति द्वारा क्रमेण ब्रह्मनिष्ठ भी हो सकती है। स्वधर्म के अनुष्ठान से ही स्त्री, पुरुष सभी को सिद्धि प्राप्त होती है-
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ।
पुरुष के लिए भी यद्यपि साधारण रूप से अपनी पत्नी में प्रेम बाधक नहीं, प्रत्युत त्रिवर्ग का साधन ही है। कौटुम्बिक सुख, सन्तान लाभ, व्यवहार सामञ्जस्य, सभी कुछ स्त्री से ही सम्पन्न होता है, परन्तु अन्त में ब्रह्मनिष्ठ सम्पादन के लिए स्त्री, पुत्रादि सभी प्रपञ्च से उपरत हुए बिना काम नहीं चल सकता। अतः उसके लिए विशेष दोष वर्णन सार्थक है। इसी दृष्टि से तुलसीदास जी भी कहते हैं –
जप तप नियम जलाशय झारी, होय ग्रीष्म शोषइ सब नारी।
(धर्मसम्राट करपात्री जी महाराज)



