America – Iran War: यदि ईरान इसी तरह सऊदी अरब और यूएई पर बम गिराता है या उनके रास्ते रोकता है तो भारत को भी युद्ध मे उतरने पर विचार कर लेना चाहिए..
ईरान के विरुद्ध अमेरिका के युद्ध में भारत को भी मे उतरने पर विचार इसलिये कर लेना चाहिए क्योंकि अब हमारे हित सीधे रूप से प्रभावित हो रहे है।
ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को ब्लॉक कर दिया है, अब इस रास्ते कोई जहाज सऊदी नहीं पहुँच सकता। यूएई समेत शेष गल्फ तो पूरा ही ब्लॉक हो चुका है, सऊदी जाने का रास्ता पश्चिम से खुला है मगर वहाँ यमन मे ईरान ने हूती आतंकवादी बैठा रखे है।
भारत के पास 75 दिनों का तेल रिजर्व है इसलिये समस्या आयात करने की नहीं है, सबसे बड़ी समस्या है कि निर्यात कैसे करें? सऊदी अरब को हम 12 अरब डॉलर का सामान बेचते है, UAE के साथ तो ये निर्यात 2.5 गुना है। ये रकम बड़ी है और इन देशो पर बमबारी नहीं रूकती तो हमारे हित सीधे रूप से प्रभावित होते है।
इसलिये यदि भारत को 10 अरब डॉलर से अधिक नुकसान होने लगे तो फिर ईरान पर आक्रमण करने मे कोई बुराई नहीं है। 700 अरब डॉलर से ज्यादा तो हमारा विदेशी मुद्रा भंडार है, 5-7 अरब डॉलर फूक देने से यदि व्यापारिक सहायता हो जाती है तो नुकसान नहीं है।
अपना कोई पुराना खटारा जहाज ओमान की खाड़ी मे भेजो, उसमे किसी अपराधी को पायलट बनाकर बैठा दो। ईरान तबाह करेगा और आप इसे एक्ट ऑफ़ वॉर घोषित कर सकते हो।
होर्मूज वाला इलाका खाली चाहिए, ईरान की नौसेना उतनी शक्तिशाली नहीं है। यदि भारतीय सेना उसे नष्ट कर दे और तेहरान मे ईरानी सेना के मुख्य अड्डों पर हमला करें तो हमारा हित पूरा हो सकता है।
ये बात सही है कि इसके बाद ईरान से हमारे संबंध पूरी तरह बिगड़ जाएंगे, लेकिन ईरान की वज़ह से अरबो डॉलर का निर्यात प्रभावित हो रहा है और ये नुकसान वाकई बहुत बड़ा है। जितने का हमें चाबहार पोर्ट नहीं पड़ा उससे 8-10 गुना तो ईरान बेमतलब मे हमारा नुकसान करवा रहा है।
भारत आक्रमण भले ना करें मगर यदि भारत मे ईरान के विरुद्ध एक माहौल भी तैयार हो जाए तो ईरान पर दबाव बन जाएगा। मोदी सरकार का वोटर बेस इस युद्ध मे ईरान के विरुद्ध है मगर समस्या ये है कि अरबो को भी वो मजहब के चश्मे से देख रहा है। भारत की जनता अमेरिका को विजयी देखना चाहती है लेकिन भारत की भूमिका पर किसी का कोई मन नहीं।
अमेरिका युद्ध तो जीत लेगा इसमें कोई संदेह नहीं है, अमेरिका सामरिक रूप से आज तक पराजित हुआ भी नहीं वो अंतिम राजनीतिक बिसात पर मार खाता है। अफगानिस्तान, इराक और लीबिया को बर्बाद करना उसका लक्ष्य था उसमे वो सफल हुआ मगर लोकतंत्र स्थापित ना कर सका वो पराजय थी।
ईरान मे भी पूर्ण विश्वास है कि अमेरिका जमीनी तबाही तो कर देगा, ईरान को फिर से सैन्य रूप से खड़ा होने मे दशकों का समय लगेगा। तब तक तो हमारा IMEC कोरिडोर भागने लगेगा, लेकिन अमेरिका कही ना कही टाइम पास भी करेगा। ये जो नए हथियारों का जखीरा बनाया है उसकी टेस्टिंग अमेरिका ईरान मे करेगा।
ईरान के लोगो के पास दो मौके है या तो खुद विद्रोह कर दे या अमेरिका के केमिकल और जैविक हथियारों का प्रकोप झेले। ईरान की महिला फुटबाल टीम ने उनका राष्ट्रगान नहीं गाया यह दर्शाता है कि जनता आजादी चाहती है। यदि ऐसा है तो भारत को भविष्य की चिंता भी नहीं करनी चाहिए।
हमारी चिंता इस समय सऊदी अरब, कुवैत और कतर की है। अमेरिका के सैन्य अड्डों पर नहीं बल्कि व्यापारिक स्थलों पर भी ईरान बम गिरा रहा है, ऐसे मे भारत बहुत अधिक समय तक खुद को युद्ध से दूर नहीं रख सकता। ईरान और पाकिस्तान का दक्षिणी समुद्र एक ही है, लगे हाथो एक युद्ध अभ्यास भी हो जायेगा।
ये बहुत गंभीर निर्णय होगा मगर इससे भारत की दशकों की विदेश नीति बदल जायेगी, अमेरिका वैसे भी ईरान को खंडहर बनाकर ही जायेगा। ऐसे मे थोड़ा शक्ति परिक्षण हो जाये और अरब देशो के साथ व्यापार निरंतर बना रहे, इस विकल्प पर भारत को विचार करना चाहिए।
इसके विपरीत सोचे तो भी एक विकल्प है कि जैसा चल रहा है चलने दे और अफ्रीका के कुछ शांत देशो मे व्यापार की गुंजाईश देखे। वैसे भी ऐसे दबावो मे हम बड़े फैसले अच्छे लेते है, ट्रम्प चाचा से अनुरोध है ईरान का जो करना है जल्दी करो और IMEC कोरिडोर का रास्ता खुलवा दो। हम 2025 का झगड़ा भूल आपको पहले वाला चाचा मान लेंगे।
(परख सक्सेना)



