America Israel Iran War: भारत का गुप्त तेल भंडार: पहाड़ों की गुफाओं में छिपा ऊर्जा का खजाना, संकट के समय बनेगा सहारा
वैश्विक तेल संकट की आशंकाओं के बीच भारत के स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) पर चर्चा तेज हो गई है। बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए पहाड़ों की चट्टानों के भीतर विशाल गुफाओं जैसी संरचनाओं में कच्चे तेल का भंडार छिपाकर रखा है। ये भंडार आपात स्थिति में देश को ऊर्जा संकट से बचाने के लिए बनाए गए हैं।
1991 का संकट और नई सोच
भारत में रणनीतिक तेल भंडार बनाने की सोच अचानक नहीं आई। इसकी शुरुआत 1991 के आर्थिक संकट से हुई थी। उस समय गल्फ वॉर के कारण तेल सप्लाई बाधित हो गई थी और भारत के पास विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से खत्म हो रहा था। रिपोर्टों में कहा गया कि देश के पास केवल 3 से 10 दिनों का तेल बचा था। इस संकट ने भारत को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के लिए अलग से रणनीतिक भंडार होना जरूरी है।
रणनीतिक और कमर्शियल भंडार में फर्क
कमर्शियल भंडार: तेल कंपनियों के पास होता है और रोजमर्रा की सप्लाई के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
रणनीतिक भंडार: सरकार के नियंत्रण में होता है और इसे केवल आपात स्थिति में खोला जाता है।
रणनीतिक भंडार का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि अगर युद्ध, प्राकृतिक आपदा या वैश्विक संकट के कारण तेल सप्लाई रुक जाए तो देश कुछ समय तक अपने भंडार के सहारे चल सके।
भंडार बनाने के मानक
भारत ने जब रणनीतिक भंडार बनाने का फैसला किया तो कई भौगोलिक मानकों पर विचार किया गया:
मजबूत चट्टानें, जिनमें बड़ी गुफाएं बनाई जा सकें।
चट्टानों से तेल रिसना नहीं चाहिए।
भूकंप का खतरा कम हो।
पास में समुद्री बंदरगाह हो, ताकि जहाजों से तेल आसानी से लाया जा सके।
पास में रिफाइनरी हो, ताकि पाइपलाइन से तेल पहुंचाया जा सके।
भारत के तेल भंडार कहां हैं?
भारत ने पहले चरण में तीन जगहों पर कुल 5.33 मिलियन मीट्रिक टन क्षमता के भंडार बनाए।
विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश)
क्षमता: 1.33 मिलियन मीट्रिक टन
ग्रेनाइट चट्टानों के भीतर सुरंग जैसी संरचना
पास में बंदरगाह और HPCL रिफाइनरी
2015 में तैयार हुआ, इसमें इराक से तेल भरा गया।
मंगलुरु (कर्नाटक)
क्षमता: 1.5 मिलियन मीट्रिक टन
बसाल्ट चट्टानों के भीतर बनाया गया
2016 में तैयार हुआ, इसमें अबू धाबी से तेल लाकर रखा गया।
पडूर (कर्नाटक, उडुपी के पास)
क्षमता: 2.5 मिलियन मीट्रिक टन
बसाल्ट चट्टानों का इस्तेमाल
2018 में पूरा हुआ।
इन सभी भंडारों को इस तरह डिजाइन किया गया है कि युद्ध, हमले या बड़ी आपदा के दौरान भी इनमें रखा तेल सुरक्षित रह सके।
दूसरे चरण की योजना
भारत अब रणनीतिक तेल भंडार को और बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है।
ओडिशा के चंडीखोल में नया भंडार बनाया जा रहा है।
पडूर में पहले से मौजूद भंडार की क्षमता बढ़ाई जा रही है।
सरकार का लक्ष्य है कि भविष्य में भारत के पास अधिक दिनों तक चलने वाला रणनीतिक तेल भंडार मौजूद रहे।
भारत की क्षमता का अनुमान करें तो
भारत के पास फिलहाल 5.33 मिलियन मीट्रिक टन क्षमता का SPR है।
यह भंडार आपात स्थिति में लगभग 9 से 10 दिनों की जरूरत पूरी कर सकता है।
अगर तेल कंपनियों के कमर्शियल भंडार को भी जोड़ दिया जाए तो कुल स्टोरेज क्षमता लगभग 74 दिनों की जरूरत के बराबर हो जाती है।
यदि वैश्विक तुलना करें तो
अमेरिका: लगभग 40 दिनों का रणनीतिक भंडार।
दक्षिण कोरिया: लगभग 90 दिनों का भंडार।
चीन: करीब 130 दिनों का भंडार।
जापान: लगभग 8 महीनों की जरूरत जितना भंडार।
जापान का उदाहरण सबसे दिलचस्प है। वहां अक्सर भूकंप और प्राकृतिक आपदाएं आती हैं, साथ ही सुरक्षा चिंताएं भी रहती हैं। इसलिए जापान ने इतना बड़ा भंडार तैयार किया है कि लंबे समय तक सप्लाई बंद होने पर भी उसकी अर्थव्यवस्था सामान्य रूप से चल सके।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा
भारत की ऊर्जा जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं। देश अपनी खपत का लगभग 85 प्रतिशत तेल आयात करता है। ऐसे में वैश्विक संकट की स्थिति में रणनीतिक भंडार बेहद अहम हो जाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी SPR क्षमता को और बढ़ाना चाहिए ताकि भविष्य में किसी भी संकट का सामना मजबूती से किया जा सके।
भारत ने पहाड़ों की चट्टानों के भीतर गुफाओं जैसी संरचनाओं में तेल भंडार छिपाकर रखा है। यह व्यवस्था देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। हालांकि फिलहाल भारत के पास केवल 9-10 दिनों का रणनीतिक भंडार है, लेकिन सरकार इसे बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है। वैश्विक संकट की स्थिति में यही भंडार भारत की अर्थव्यवस्था को सहारा देंगे।



