Dhurandhar फिल्म बनाने वालों को स्वयं भी ये आशा नहीं होगी कि देश इसे इस कदर हाथों हाथ लेगा..भांडवुड के साथ साथ बिका हुआ मीडिया भी छाती पीटने लगा और उनके ज्यादातर निकम्मे नैरेटिव्स ध्वस्त हो गये..
यूँ तो ये सारे के सारे #भांड हैं—थाली के बैंगन, अवसरवादी, रीढ़विहीन। जहाँ कैमरा, पैसा और सत्ता दिखी उधर लोट गए। इन्हें न समाज से मतलब है, न संस्कृति से, न राष्ट्र से। इतिहास में ऐसे लोग योद्धा नहीं कहलाते, ये कहलाते हैं #उपयोगी_गुलाम
और भारत में य़ह भूमिका पूरी निष्ठा से #बॉलीवुड निभा रहा है।
यह कभी कला का मंच नहीं था, यह हमेशा से #वैचारिक_कोठा रहा है। यहाँ भारतीय समाज को धीरे-धीरे नंगा किया गया—परिवार को बेड़ियाँ बताया गया, माता-पिता को बोझ, विवाह को धोखा, साधना को पाखंड और राष्ट्रभक्ति को अपराध। जिसने सवाल उठाया उसे तुरंत #फासिस्ट, #कट्टर, #असहिष्णु का तमगा पकड़ा दिया गया।
परिणाम यह हुआ कि #युवा_पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा न घर का रहा, न घाट का। जड़ों से कटा, पहचान से खाली, और नकली नायकों के पीछे भागता हुआ। आज अगर कोई पीढ़ी बच सकती है तो वह इन भांडों से नहीं, बल्कि #दादा_दादी की सख़्त सीख, #नाना_नानी की कथाओं और परिवार की अनुशासनपूर्ण परंपरा से बचेगी।
इन दिनों धुरंधर सिर्फ़ फिल्म नहीं रही—यह एक चेतावनी बन गई है। बॉक्स ऑफिस इसकी छोटी बात है, असली चोट इसके वैचारिक संकेतों से लगी है। यही कारण है कि पूरा #लिबरल_इकोसिस्टम छटपटा रहा है, बयान बदल रहा है, नैरेटिव गढ़ रहा है।
और जब लगा कि किसी तरह मामला संभल जाएगा, तभी रणवीर ने सार्वजनिक रूप से #RSS100 पर शुभकामनाएँ दे दीं।
बिना घुटनों के बल गिरे, बिना सफाई दिए, बिना माफ़ी माँगे।
यहीं से सिस्टम हिल गया।
अब रोना इस बात का नहीं है कि बधाई दी गई -रोना इस बात का है कि #बॉलीवुड_से_RSS_को_बधाई दी गई।
यह वही संघ है जिसे ये लोग सालों से गाली बनाकर बेचते रहे। इसी को कोसकर इन्होंने विदेशी मंचों पर भारत को बदनाम किया, #अवॉर्ड_बटोरे, और खुद को “#बुद्धिजीवी” कहलवाया। आज उसी मंच से समर्थन आना—यह इनके लिए वैचारिक अपमान नहीं, वैचारिक अंत है।
आदित्य धर यहाँ सिर्फ़ निर्देशक नहीं है—वह संकेत है कि अब #डर_का_ठेका खत्म हो रहा है। धुरंधर काफी नहीं थी, अब कलाकारों से संघ को बधाई दिलवाना—यह साफ़ एलान है कि तुम्हारा सिस्टम अप्रासंगिक हो चुका है।
यह कोई सिस्टम तोड़ना नहीं है।
यह उससे #ज्यादा_मजबूत_सिस्टम खड़ा करना है।
एक ऐसा सिस्टम जो
#राष्ट्रवादी है,
#सनातनी है,
और #भारतीयता को शर्म नहीं, शक्ति मानता है।
यही बात इन्हें जला रही है। क्योंकि अब विरोध सिर्फ़ शब्दों में नहीं रहा—अब सफलता, #जनसमर्थन और बॉक्स ऑफिस भी साथ खड़े हैं।
आज बॉलीवुड का एक बड़ा वर्ग इसलिए तिलमिलाया हुआ है क्योंकि उसका वैचारिक ठेका खत्म हो रहा है।
अब ये तय नहीं करेंगे कि कौन देशभक्त है, कौन देशद्रोही – कौन बोलेगा और कौन चुप रहेगा।
सबसे खतरनाक बात यह है कि अब लोग बिना इनसे अनुमति लिए सोचने लगे हैं और हर गुलाम #मानसिकता का अंत यहीं से शुरू होता है।
यह कोई क्षणिक उछाल नहीं है। यह वर्षों की घुटन के बाद उठा #वैचारिक_विस्फोट है।
और आने वाले समय में सिनेमा मनोरंजन नहीं, #सभ्यता_का_हथियार बनेगा। और यही सच्चाई इन भांडों को रात भर करवटें बदलने पर मजबूर कर रही है।
(प्रस्तुति -रजिन्दर चौधरी)



