Sunday, April 12, 2026
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Iran War: पाकिस्तान सोशल मीडिया पर सारे देशों का राघव चड्ढा है

Iran War: बड़ी चालाकी से पाकिस्तान ने अमेरिका का टास्क पूरा किया भले ही वो नाकाम रहा, गड्डियाँ तो आ गईं, अब कुछ दिन मुल्क की गड्डी चल पायेगी किसी तरह..

Iran War: बड़ी चालाकी से पाकिस्तान ने अमेरिका का टास्क पूरा किया भले ही वो नाकाम रहा, गड्डियाँ तो आ गईं, अब कुछ दिन मुल्क की गड्डी चल पायेगी किसी तरह..

पाकिस्तान सोशल मीडिया पर सारे देशो का राघव चड्ढा है, मेटा एड्स रन करके इतने दिमागो को अपनी ओर कैसे करना है इसमें उसे दुनिया के हर देश पर बढ़त है। झूठी खबर फैलानी हो या कोई प्रोपोगंडा परोसना हो, पाकिस्तान उसमे चैंपियन है।

मध्यस्थता करना और दलाली करना दो अलग बाते है, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का ट्वीट व्हाइट हॉउस लिखकर भेज रहा है। पाकिस्तान को खुद नहीं पता कि लेबनान शांति समझौते मे है या नहीं, प्रधानमंत्री हाँ बोल रहा है मगर इस्लामाबाद मे लेबनान का कोई व्यक्ति नहीं गया। इजरायल जो कि प्रमुख खिलाडी है वो भी समझौते मे नहीं है।

मध्यस्थता का सबसे बड़ा उदाहरण सोवियत संघ है, जिसने 1965 मे ताशकन्द समझौते के लिए बुलाया। सारी शर्ते सोवियत की रखी हुई थी, लाल बहादुर शास्त्री को आपत्ति थी तो वे भी ठिकाने लगा दिये गए। ये होता है प्रभुत्व और वर्चस्व, अमेरिका और ईरान मे आखिर लड़ाई क्या है?
क्या ये जमीन के टुकड़े के लिए लड़ रहे है? क्या ये किसी भौतिक वस्तु के लिए लड़ रहे है?

ये सिर्फ अमेरिका के मिडिल ईस्ट मे प्रभुत्व की लड़ाई है, ईरान परमाणु बम बनायेगा या नहीं। बनाया तो अमेरिका की हार नहीं बनाया तो ईरान की हार, बस इन दो शर्तों मे इस युद्ध का आउटपुट है।
मध्यस्थता की परिभाषा क्या है? पाकिस्तान शांति की शर्ते रखे और अमेरिका ईरान उसे माने, तब आप कह सकते है कि ये सोशल मीडिया पर जो गंध फ़ैल रही है वो सही है कि पाकिस्तान सुपर पॉवर बन गया।

लेकिन यहाँ तो ट्वीट तक अमेरिका लिखकर दे रहा है, बात एकदम सीधी है अमेरिका और ईरान दोनों को अकड़ है कि पहले हम नहीं बोलेंगे। ऐसे मे एक ब्रोकर बीच मे बैठाया गया और ब्रोकर को ही साधारण भाषा मे दलाल बोलते है।

6 अरब डॉलर के फोरेक्स रिज़र्व वाले और पिछले ही साल भारत के हाथों कूटे पाकिस्तान की इतनी हैसियत ही नहीं कि शांति वार्ता करा सके। अमेरिका और ईरान ने आपसी समझ से ये जगह चुनी, भारत ने बिल्कुल सही किया कि फटे मे पैर नहीं उलझाया।

यदि ये भारत की कमजोर विदेश नीति थी भी तो क्या डेनमार्क, बेलजियम और स्विट्ज़रलैंड की भी कमजोर है। ये देश तो शांति समझौतो की राजधानी माने जाते है लेकिन वास्तविकता ये है कि वर्चस्व की लड़ाई मे समझौते नहीं सौदे होते है जो दलाल ही करा सकते है जीवंत राष्ट्र नहीं।

(परख सक्सेना)

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