Protein: वैज्ञानिकों का बड़ा खुलासा ये है कि एक प्रोटीन जो एल्जाइमर पैदा कर सकता है वो ही आपकी स्मरण शक्ति के लिये अमृततुल्य है..
यहाँ स्टोवर्स इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल रिसर्च के हालिया शोध की बात हो रही है जिन्होंने ये अजीबोगरीब खुलासा किया है।
अभी तक ‘एमाइलॉयड’ (Amyloid) प्रोटीन को केवल अल्जाइमर और पार्किंसंस जैसी खतरनाक बीमारियों का मुख्य कारण माना जाता था। लेकिन स्टोवर्स इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने एक चौंकाने वाली खोज की है। शोध के अनुसार, ये प्रोटीन दरअसल हमारी दीर्घकालिक यादों (Long-term memories) को बनाने और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए बेहद जरूरी हैं।
वैज्ञानिकों ने पाया है कि दिमाग इन प्रोटीनों के एक नियंत्रित रूप का उपयोग करता है—जिसे वे ‘फंक्शनल एमाइलॉयड’ कहते हैं। यह यादों के लिए एक स्थिर “स्टोरेज कंटेनर” की तरह काम करता है। इस खोज की मुख्य बातें:
1. “अच्छे” एमाइलॉयड (The “Good” Amyloids)
Orb2 और CPEB: फल मक्खियों से लेकर इंसानों तक, दिमाग में ‘Orb2’ (स्तनधारियों में इसे CPEB3 कहा जाता है) नामक एक प्रोटीन होता है। यादों को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए इस प्रोटीन का तंत्रिकाओं (Synapses) के पास गुच्छों में जमा होना जरूरी है।
कार्य: बीमारियों में बनने वाले जहरीले गुच्छों के विपरीत, ये “अच्छे” गुच्छे नियंत्रित होते हैं। ये न्यूरॉन्स के बीच के संपर्क को मजबूती देते हैं, जिससे यादें धुंधली नहीं होतीं।
2. “फ्यून्स” (Funes) प्रोटीन की भूमिका
हेल्पर प्रोटीन: शोधकर्ताओं ने एक विशेष ‘हेल्पर’ प्रोटीन की पहचान की है, जिसे ‘फ्यून्स’ नाम दिया गया है।
कैसे काम करता है: फ्यून्स एक “कंस्ट्रक्शन फोरमैन” (मिस्त्री) की तरह काम करता है। यह तरल जैसे Orb2 प्रोटीन को एक ठोस और स्थिर ढांचे में बदलने का निर्देश देता है। फ्यून्स के बिना यादें “तरल” रहती हैं और बह जाती हैं, लेकिन इसकी मदद से वे स्थायी संरचनाओं में बदल जाती हैं।
3. बीमारियों के इलाज में नई उम्मीद
एक टूटा हुआ औजार: इस शोध से संकेत मिलता है कि अल्जाइमर शायद किसी नई “बुरी” प्रक्रिया के कारण नहीं, बल्कि शरीर के एक महत्वपूर्ण तंत्र के खराब होने से होता है। यह ऐसा है जैसे यादें बनाने वाला ‘सीमेंट’ अनियंत्रित होकर गलत जगहों पर फैल जाए।
इलाज के नए रास्ते: अब वैज्ञानिक ऐसे उपचार विकसित कर सकते हैं जो इन प्रोटीनों को नियंत्रित करना सिखा सकें, ताकि जहरीले एमाइलॉयड को मददगार स्थिति में बदला जा सके।
एक और खोज: ‘किबरा’ (KIBRA) प्रोटीन
अन्य शोधों में KIBRA नामक प्रोटीन को “मॉलिक्यूलर ग्लू” (आणविक गोंद) के रूप में पहचाना गया है। यह प्रोटीन तंत्रिकाओं के कनेक्शन को चिपकाए रखने में मदद करता है, जिससे यह बात और पुख्ता होती है कि हमारी याददाश्त मस्तिष्क में मौजूद इन स्थायी प्रोटीन संरचनाओं पर टिकी है।
मस्तिष्क की याददाश्त (Memory) बनाने की प्रक्रिया पर यह शोध वास्तव में क्रांतिकारी है क्योंकि इसने विज्ञान की दशकों पुरानी धारणा को पलट दिया है। आइए इस ‘मेमोरी आर्किटेक्चर’ के बारे में और गहराई से समझते हैं:
1. ‘प्रायन’ (Prion) का रहस्य: विलेन से हीरो तक
साधारण प्रोटीन अपना काम करने के बाद नष्ट हो जाते हैं, लेकिन Orb2/CPEB3 जैसे प्रोटीन “प्रायन-लाइक” (Prion-like) होते हैं।
अनोखी विशेषता: ये प्रोटीन अपनी आकृति बदल सकते हैं। एक बार जब ये अपनी आकृति बदलकर ‘एमाइलॉयड’ (ठोस रूप) में आ जाते हैं, तो ये अपने आस-पास के अन्य प्रोटीनों को भी अपनी तरह ठोस बनाने लगते हैं।
याददाश्त का आधार: हमारी कोशिकाएं हर कुछ घंटों में पुराने प्रोटीन बदलकर नए प्रोटीन बनाती हैं। ऐसे में यादें सालों तक कैसे टिकी रहती हैं? जवाब है ये एमाइलॉयड गुच्छे। ये नए आने वाले प्रोटीनों को भी अपने ढांचे में शामिल कर लेते हैं, जिससे याददाश्त का “सांचा” (Template) कभी नहीं टूटता।
2. ‘फ्यून्स’ (Funes) और ‘लिक्विड-टू-सॉलिड’ ट्रांजिशन
वैज्ञानिकों ने पाया कि याददाश्त बनने की प्रक्रिया दो चरणों में होती है:
तरल अवस्था (Liquid State): जब आप कुछ नया सीखते हैं, तो Orb2 प्रोटीन न्यूरॉन्स के पास एक तरल बूंद (Droplet) की तरह जमा होते हैं। इस समय याददाश्त कच्ची होती है और इसे आसानी से मिटाया जा सकता है।
ठोस अवस्था (Solid State): यहाँ ‘फ्यून्स’ (Funes) प्रोटीन की एंट्री होती है। यह उस तरल बूंद को एक सख्त एमाइलॉयड फाइबर में बदल देता है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे ‘गीले सीमेंट’ को ‘कंक्रीट’ में बदल दिया जाए। एक बार कंक्रीट जम गया, तो याद ‘परमानेंट’ हो जाती है।
3. KIBRA: याददाश्त का ‘मेंटेनेंस इंजीनियर’
हाल ही में एक और महत्वपूर्ण प्रोटीन की पहचान हुई है जिसे KIBRA कहते हैं।
चुनौती: समय के साथ यादें धुंधली होने लगती हैं क्योंकि न्यूरॉन्स के बीच के कनेक्शन (Synapses) ढीले पड़ जाते हैं।
समाधान: KIBRA एक ‘निशान’ (Tag) की तरह काम करता है। यह उन सक्रिय सिनैप्स पर चिपक जाता है जहाँ यादें स्टोर होती हैं। यह PKMzeta जैसे अन्य प्रोटीनों को बुलाता है ताकि वे याददाश्त की संरचना को लगातार ‘रिपेयर’ और ‘रिफ्रेश’ करते रहें।
4. अल्जाइमर (Alzheimer’s) को देखने का नया नजरिया
इस रिसर्च के बाद वैज्ञानिक अब अल्जाइमर को एक “अनियंत्रित याददाश्त प्रक्रिया” के रूप में देख रहे हैं:
स्वस्थ दिमाग: एमाइलॉयड का निर्माण केवल जरूरत पड़ने पर और सही जगह पर (सिनैप्स पर) होता है।
बीमार दिमाग: जब ‘फ्यून्स’ जैसे रेगुलेटर (नियंत्रक) काम करना बंद कर देते हैं, तो एमाइलॉयड पूरे दिमाग में अनियंत्रित तरीके से फैलने लगता है और ‘प्लाक’ (Plaques) बना देता है, जो न्यूरॉन्स को खत्म कर देते हैं।
भविष्य की चिकित्सा
अगर हम यह पूरी तरह समझ लें कि ‘फ्यून्स’ जैसे प्रोटीन एमाइलॉयड को कैसे नियंत्रित करते हैं, तो हम ऐसी दवाएं बना पाएंगे जो बुढ़ापे में याददाश्त बढ़ाने में मदद करेंगी। अल्जाइमर के जहरीले गुच्छों को वापस ‘हेल्थी’ याददाश्त वाले गुच्छों में बदल सकेंगी।



