Wednesday, February 4, 2026
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Acharya Anil Vats presents: जब रावण को पड़ गई दैत्यराज बालि की आवश्यकता – श्री राम को पराजित करने के लिये

Acharya Anil Vats presents: जब रावण ने युद्ध में सहायता के लिए राजा बलि का द्वार खटखटाया: राम-रावण संग्राम से जुड़ी एक रहस्यमयी कथा..

Acharya Anil Vats presents: जब रावण ने युद्ध में सहायता के लिए राजा बलि का द्वार खटखटाया: राम-रावण संग्राम से जुड़ी एक रहस्यमयी कथा..

राम-रावण युद्ध के दौरान एक ऐसा निर्णायक दौर भी आया, जब अपार शक्ति, पराक्रम और अहंकार से भरे लंकापति रावण को पहली बार अपने भीतर कमजोरी का एहसास होने लगा। युद्ध पूरी तरह शुरू हो चुका था। एक के बाद एक रावण के प्रमुख राक्षस योद्धा धराशायी हो रहे थे। दूसरी ओर, भगवान श्रीराम की वानर सेना को भी क्षति उठानी पड़ रही थी, लेकिन युद्ध का पलड़ा धीरे-धीरे रावण के विरुद्ध झुकता दिखाई देने लगा था।

रावण के कई महान सेनापति और शक्तिशाली योद्धा मारे जा चुके थे। अब उसे यह आभास होने लगा था कि पराजय बहुत दूर नहीं है। हालांकि, अपने स्वभाव के अनुसार उसने स्वयं को सांत्वना देते हुए मन में गर्व से कहा कि वह त्रिलोकेश्वर है और संसार में कोई भी ऐसा नहीं जो उसे पराजित कर सके। देवता तक उसके नाम से भयभीत रहते हैं और उसकी आज्ञा का पालन करते हैं—ऐसा उसका भ्रम था।

लेकिन यह आत्मविश्वास क्षणिक था। अगले ही पल उसके मन में चिंता ने घर कर लिया। उसने सोचा कि यदि किसी भी तरह वह पराजय के कगार पर पहुंच गया, तो स्वयं की रक्षा के लिए उसे किसी ऐसे राजा का सहारा लेना होगा जो हर दृष्टि से शक्तिशाली हो और संकट की घड़ी में उसका साथ दे सके।

रावण ने स्वयं से प्रश्न किया कि ऐसा कौन हो सकता है जो उससे भी अधिक सामर्थ्यवान हो। थोड़ी देर विचार करने के बाद उसे यह स्वीकार करना पड़ा कि संसार में उससे अधिक बलशाली कोई नहीं है। देवताओं में भी उतनी क्षमता नहीं है। तब उसने शक्ति के बजाय तेज और यश के आधार पर विचार किया और तभी उसके मन में एक नाम उभरा—महाराज बलि।

रावण को स्मरण हुआ कि राजा बलि ऐसे पराक्रमी और तेजस्वी राजा थे, जिनके सामने बड़े-बड़े देवता भी नतमस्तक रहे थे। वह स्वयं भी राक्षस कुल से थे, इसलिए रावण को लगा कि उनसे सहायता मांगना उचित रहेगा। लेकिन यह भी उसे याद आया कि राजा बलि इस समय सुतल लोक में निवास कर रहे हैं और उनसे मिलने के लिए स्वयं वहीं जाना पड़ेगा। बिना देर किए रावण ने सुतल लोक जाने का निर्णय ले लिया।

जब रावण सुतल लोक पहुंचा, तो द्वार पर उसे भगवान विष्णु के वामन अवतार को द्वारपाल के रूप में खड़ा पाया। वामनदेव को देखकर रावण समझ गया कि वे उसे भीतर प्रवेश करने से अवश्य रोकेंगे। इसी कारण उसने उन्हें अनदेखा कर आगे बढ़ने का प्रयास किया, लेकिन वह सफल नहीं हो सका।

जैसे ही रावण आगे बढ़ा, वामनदेव ने अपनी गदा द्वार पर रख दी और स्पष्ट रूप से प्रवेश निषेध का संकेत दिया। यह देखकर रावण समझ गया कि सीधे प्रवेश असंभव है। तब उसने एक सूक्ष्म रूप धारण कर लिया, ताकि किसी की दृष्टि में आए बिना भीतर जा सके।

रावण को यह भ्रम था कि इस रूप में वह वामनदेव की दृष्टि से बच जाएगा, लेकिन वह इस सत्य से अनजान था कि विष्णु की दृष्टि से कोई भी नहीं बच सकता। वामनदेव ने जानबूझकर अनभिज्ञता का अभिनय किया, जिससे रावण द्वार के काफी समीप पहुंच गया। तभी वामनदेव का पांव उसके ऊपर पड़ गया। रावण तड़पने लगा, उसकी सांसें घुटने लगीं और वह कराह उठता रहा।

जब वामनदेव को लगा कि रावण का दंड पूर्ण हो गया है, तो उन्होंने उसे मुक्त कर दिया और भीतर जाने की अनुमति दे दी। भीतर पहुंचते ही रावण अपने वास्तविक स्वरूप में आ गया और राजा बलि को प्रणाम कर सहायता का निवेदन करने लगा।

रावण को देखकर राजा बलि को आश्चर्य हुआ। उन्होंने उसके आने का कारण पूछा। रावण ने अहंकार भरे स्वर में कहा कि पूरे त्रिलोक में केवल वही हैं जो उसकी रक्षा कर सकते हैं। तभी राजा बलि ने पूछा कि वह भीतर कैसे आया और क्या वामनदेव ने उसे रोका नहीं। रावण ने घमंड में कहा कि कोई उसे रोक ही नहीं सकता।

राजा बलि ने शांत स्वर में उसे बताया कि वामनदेव ने उसे रोका था, लेकिन उसकी पीड़ा सुनकर करुणा दिखाते हुए भीतर आने दिया। यह सुनकर रावण क्रोधित हो उठा और स्वयं को सर्वोच्च देव बताने लगा। इस पर राजा बलि उठ खड़े हुए और बोले कि यदि रावण स्वयं को सर्वोच्च मानता है, तो सहायता मांगने का कोई औचित्य नहीं रह जाता।

कुछ लज्जित होकर रावण ने फिर भी सहायता की प्रार्थना की। तब राजा बलि ने ध्यान लगाया और अपने दिव्य ज्ञान से देखा कि श्रीराम अपनी पत्नी सीता को मुक्त कराने के लिए युद्ध कर रहे हैं। उन्होंने रावण को स्पष्ट सलाह दी कि सीता को लौटा देना ही उसके लिए हितकर होगा।

रावण ने इस सलाह को ठुकरा दिया और वानर सेना को तुच्छ बताया। इस पर राजा बलि ने उसे याद दिलाया कि इन्हीं वानरों में से एक ने लंका को जला दिया था, दूसरे को वह हिला भी नहीं सका और तीसरे ने भारी क्षति पहुंचाई थी। उन्होंने यह भी कहा कि उसका भाई विभीषण स्वयं श्रीराम के पक्ष में खड़ा है, इसलिए उसकी विजय असंभव है।

अंततः राजा बलि ने सहायता की शर्त रखी और एक विशाल स्वर्ण-हीरक पर्वत दिखाया, जिसे उठाने को कहा। रावण उसे हिला तक नहीं सका। तब राजा बलि ने बताया कि वह पर्वत दरअसल हिरण्यकश्यप की बाली थी और उसी जन्म में रावण स्वयं हिरण्यकश्यप था। उन्होंने समझाया कि जब वह तब उस बाली को धारण करता था और आज उसे उठा भी नहीं पा रहा, तो उसकी शक्ति कितनी घट चुकी है।

राजा बलि ने स्पष्ट चेतावनी दी कि उस समय भगवान विष्णु नृसिंह रूप में थे और आज वही विष्णु श्रीराम के रूप में उसका वध करने आए हैं। कोई भी उसे बचा नहीं सकता। लेकिन रावण ने इस चेतावनी को भी अनसुना कर दिया और चुपचाप वहां से लौट गया।

(प्रस्तुति – आचार्य अनिल वत्स)

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