RSS: संघर्ष के सौ वर्ष: बालासाहब देवरस की दूरदर्शी नीति ने कैसे गोविंदाचार्य को गुमनामी और दंड से बचाकर बनाया संघ का मजबूत स्तंभ..
जब बालासाहब देवरस ने संघ को नए वैचारिक विस्तार की दिशा दी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तीसरे सरसंघचालक के रूप में बालासाहब देवरस ने जब संगठन की कमान संभाली, तब उन्होंने कई ऐसे कदम उठाए, जिनसे यह साफ संकेत मिला कि वे संघ को केवल परंपरागत ढांचे तक सीमित नहीं रखना चाहते थे, बल्कि उसके सामाजिक और वैचारिक आधार को और व्यापक बनाना चाहते थे। सरसंघचालक बनने से पहले महात्मा फुले की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित करना भी उसी सोच का प्रतीक था।
संघ शुरू से ही जातिगत भेदभाव के खिलाफ रहा है। स्वयं महात्मा गांधी ने संघ शिविरों का दौरा करने के बाद उल्लेख किया था कि वहां अलग-अलग जातियों के लोग एक साथ रहकर भोजन करते हैं, बिना किसी भेदभाव के। बावजूद इसके, बालासाहब देवरस ने यह संकेत दिया कि अब दलित और वंचित वर्गों को संगठन से और अधिक मजबूती से जोड़ा जाएगा।
रूठे हुए स्वयंसेवकों को लौटाने की रणनीति
बालासाहब देवरस की कार्यनीति का एक अहम पक्ष यह था कि जो पुराने कार्यकर्ता किसी कारणवश संघ से दूर हो गए थे, उन्हें फिर से संवाद के जरिए संगठन से जोड़ने की कोशिश की जाए। इसी क्रम में उन्होंने मधुकर देवल जैसे वरिष्ठ स्वयंसेवक से संपर्क किया, जो वैचारिक मतभेदों के कारण संघ से अलग हो गए थे।
बालासाहब को यह भली-भांति पता था कि मधुकर देवल भले ही सक्रिय न हों, लेकिन मन से वे संघ से जुड़े हुए थे। सरसंघचालक बनने के बाद बालासाहब ने उन्हें पुनः संगठन से जोड़ने की दिशा में पहल की, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि वे केवल नए वर्गों को नहीं, बल्कि पुराने साथियों को भी साथ लेकर चलना चाहते थे।
‘खुला मंच’ से संवाद की नई संस्कृति
बालासाहब देवरस ने संघ के भीतर संवाद की एक नई परंपरा विकसित की। उन्होंने अनुशासन के साथ-साथ लोकतांत्रिक संवाद को भी महत्व दिया। ‘खुला मंच’ जैसे प्रयोगों के माध्यम से साधारण स्वयंसेवकों को यह अवसर मिला कि वे बिना किसी भय के अपने विचार खुलकर रख सकें।
इस पहल ने संघ के भीतर गुटबाजी की संभावनाओं को कम किया और आपसी संवाद से समस्याओं का समाधान करने की संस्कृति को मजबूत किया।
गोविंदाचार्य को मिला ‘अभयदान’
संघ के इतिहासकारों के अनुसार, यदि बालासाहब देवरस सरसंघचालक न होते, तो बिहार आंदोलन के दौरान के.एन. गोविंदाचार्य को उनकी सक्रिय राजनीतिक भूमिका के कारण दंडित किया जा सकता था। उस समय गोविंदाचार्य संघ के विभाग प्रचारक थे और बिना औपचारिक अनुमति के आंदोलन में आगे बढ़कर हिस्सा ले रहे थे।
संघ की परंपरा के अनुसार, किसी राजनीतिक आंदोलन में भाग लेने से पहले दायित्व से मुक्त होना आवश्यक होता है। गोविंदाचार्य की सक्रियता कुछ अधिकारियों को खटक रही थी और उनके खिलाफ कार्रवाई की तैयारी भी हो रही थी।
बालासाहब के हस्तक्षेप से बदली दिशा
जब मामला शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचा, तब बालासाहब देवरस ने स्वयं गोविंदाचार्य को सुना और स्पष्ट किया कि उनकी ओर से कोई अनुशासनहीनता नहीं हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि बिहार आंदोलन को केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि सत्य और अन्याय से जुड़ा सामाजिक आंदोलन माना जाना चाहिए।
इस हस्तक्षेप ने गोविंदाचार्य को न केवल दंड से बचाया, बल्कि उन्हें आगे बढ़ने का नैतिक बल भी दिया। इसके बाद वे संगठन, राजनीति और मीडिया में लगातार आगे बढ़ते गए।
दूरदर्शी नेतृत्व की मिसाल
आज भले ही गोविंदाचार्य सक्रिय राजनीति के केंद्र में न हों, लेकिन उन्हें संघ के मजबूत वैचारिक स्तंभों में गिना जाता है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह बालासाहब देवरस की वही नीति रही, जिसमें वे असहमति रखने वाले स्वयंसेवकों की बात को संवाद से समझते और समाधान निकालते थे।
(प्रस्तुति -त्रिपाठी पारिजात)



