Ashwini Upadhyay ने एक बार फिर ऐसा बयान देकर देशभर में बहस को हवा दे दी है, जो भारत की राजनीतिक और संवैधानिक सोच के मूल में सवाल खड़े करता है..
अश्विनी उपाध्याय जी का बयान सीधा और सोच जगाने वाला है। आप भी सुनिये उन्होंने क्या कहा –
“अगर आपातकाल के दौरान धर्मनिरपेक्षता थोपी जा सकती थी, तो उसी तरह भारत को हिंदू राष्ट्र क्यों नहीं घोषित किया जा सकता?” इस एक पंक्ति ने ही जनमत को दो ध्रुवों में बाँट दिया।
कुछ लोगों के लिए यह टिप्पणी कथित ऐतिहासिक विरोधाभासों को चुनौती देती है और इस बात पर दोबारा विचार करने को प्रेरित करती है कि समय के साथ संविधान के सिद्धांतों की व्याख्या कैसे होती रही है। वहीं दूसरी ओर, कई लोग चेतावनी देते हैं कि ऐसी दलीलें संविधान की मूल भावना को कमजोर कर सकती हैं और भविष्य के लिए खतरनाक मिसालें कायम कर सकती हैं।
समर्थकों का मानना है कि उपाध्याय जानबूझकर समाज को उन सवालों से रूबरू करा रहे हैं, जिनसे लंबे समय से बचा जाता रहा है, जबकि आलोचकों का कहना है कि यह सोच भारत की बहुलतावादी और समावेशी पहचान के लिए खतरा बन सकती है।
मतभेद चाहे जो हों, यह बयान एक राष्ट्रीय आत्ममंथन को अवश्य जन्म देता है। इसने धर्मनिरपेक्षता, पहचान, बहुमत की इच्छा और संवैधानिक नैतिकता जैसे मुद्दों पर फिर से सोचने के लिए लोगों को प्रेरित किया है। कठिन सवाल अक्सर असहज करते हैं, लेकिन वे संवाद को आगे भी बढ़ाते हैं।
लोकतंत्र में ऐसी बहसें संस्थाओं को कमजोर नहीं करतीं, बल्कि उनकी मजबूती की परीक्षा लेती हैं। अब सवाल जनता के सामने है- क्या यह इतिहास से जुड़ी एक गंभीर चुनौती है, जिस पर गहन विचार होना चाहिए, या फिर भारत की समावेशी दृष्टि से एक विचलन..?
(प्रस्तुति -प्रिया द्विवेदी)



