Thursday, March 5, 2026
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Yogi Adityanath ने आईना दिखाया है देश के गद्दारों को

Yogi Adityanath जैसा मुख्यमन्त्री न उत्तर प्रदेश में पहले कोई देखा गया है न भारत के किसी भी राज्य में..उन्होंने सिखाया है कि प्रदेश के मुखिया को कैसे प्रशासन करना चाहिये..

Yogi Adityanath जैसा मुख्यमन्त्री न उत्तर प्रदेश में पहले कोई देखा गया है न भारत के किसी भी राज्य में..उन्होंने सिखाया है कि प्रदेश के मुखिया को कैसे प्रशासन करना चाहिये..

जब सवाल उठे… तो चुप्पी भी एक अपराध बन जाती है
कभी-कभी कोई एक वाक्य पूरे देश के ज़मीर को झकझोर देता है।
योगी आदित्यनाथ जी का एक बयान आजकल खूब चर्चा में है..उन्होंने कोई नारा नहीं दिया, कोई उकसावा नहीं किया,
बस एक आईना दिखाया।
उन्होंने कहा है कि “कैंडल मार्च ग़ाज़ा के मुद्दे को लेकर निकलते हैं, लेकिन पाकिस्तान और बांग्लादेश में जब हिंदू मारा जाता है तो आपके मुंह बंद हो जाते हैं।”
यह वाक्य किसी मज़हब पर हमला नहीं है,
यह चयनात्मक संवेदना पर सवाल है।
दुनिया के किसी कोने में अगर मासूम मरते हैं,
तो दुख होना चाहिए—बिलकुल होना चाहिए।
लेकिन सवाल यह है कि
दुख का पैमाना मज़हब देखकर क्यों बदल जाता है?
जब ग़ाज़ा की तस्वीरें आती हैं,
मोमबत्तियाँ जलती हैं,
पोस्टर बनते हैं,
टाइमलाइन भर जाती है।
लेकिन जब
पाकिस्तान में मंदिर तोड़े जाते हैं,
हिंदू लड़कियों का जबरन धर्मांतरण होता है,
बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के घर जलते हैं—
तब वही संवेदनशील वर्ग
अचानक “न्यूट्रल” हो जाता है।
यही दोहरा मापदंड
योगी जी के बयान की असली जड़ है।
यह बयान नफरत नहीं फैलाता,
यह नकली सेक्युलरिज़्म की परतें उधेड़ता है।
जो लोग कहते हैं
“धर्म को राजनीति से अलग रखो”
उन्हीं की राजनीति
धर्म देखकर जागती और सोती है।
योगी आदित्यनाथ जी की शैली हमेशा से ऐसी रही है—
बात गोल-मोल नहीं,
सीधी और साफ़।
कुछ लोगों को यह तीखा लगता है,
लेकिन सच अक्सर
मीठा नहीं होता।
यह सवाल आज हर उस भारतीय को खुद से पूछना चाहिए
जो मानवाधिकार की बात करता है—
क्या हमारा विरोध और हमारी संवेदना
वाकई इंसान के लिए है
या सिर्फ अपनी विचारधारा के लिए?
अगर इंसान मायने रखता है,
तो हर जगह रखे—
चाहे नाम कोई भी हो,
देश कोई भी हो।
योगी जी का बयान
नफरत की आग नहीं है,
यह सवालों की मशाल है।
और सवालों से डरने वाला समाज
कभी न्याय नहीं कर पाता।
अब तय आपको करना है—
क्या आप सिर्फ ट्रेंड पर बोलेंगे
या सच पर भी?
अगर यह लेख आपको सोचने पर मजबूर करे,
तो लाइक करें।
अगर दिल से सहमति या असहमति हो,
तो कमेंट में खुलकर लिखें।
क्योंकि चुप्पी से कुछ नहीं बदलता—
संवाद से बदलता है।
“यह मेरी व्यक्तिगत राय है, आप सहमत हों या असहमत — अपनी बात शालीन शब्दों में रखें।”

(प्रस्तुति -शरद राय)

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