Poetry by Manmeet Soni: ..बहुत दिन हुए..कि यहाँ से..कीर्तन में मगन चैतन्य महाप्रभु..अपनी टोली के साथ..”हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे..हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे”..गाते हुए नहीं गुज़रे..!
ममता दीदी!
मैं या कोई और
कोई भी बाहरी नहीं है..
सारा भारत मेरा है
हर शहर
हर क़स्बा
हर गाँव
हर पंचायत मेरी है..
मैं
पश्चिम बंगाल में तूफान की तरह आऊंगा
घटाओं की तरह मंडराऊंगा
बादलों की तरह बरसूंगा
हुगली पर गंगा पर गंगासागर पर
दुर्गा की मूर्तियों से लेकर
कलकत्ता के कसाईखानों तक :
मैं कहीं भी बरस सकता हूँ!
—
जो भारतीय है
वह कभी बाहरी नहीं हो सकता
जो बाहरी है
वह कभी भी भारतीय हो सकता है
यदि बाबर इस भारत से प्यार करता
तो भारतीय होता
शक कुषाण तुर्क स्पेनिश डच पुर्तगाली अंग्रेज
अगर इस मिट्टी को सर नवाते
तो हम उन्हें भारतीय कहते और सच्चे भारतीय कहते
—
ममता दीदी!
कलकत्ता के नारियलों पर मेरा नाम लिखा है
चेन्नई के डोसों का ज़िक्र सुनकर मैं पागल हो जाता हूँ
सूरत के हीरों जवाहरातों को मुझे खरीदना है
पटना के किसी ठिये पर खाना है लिट्टी चोखा
भोपाल में बड़े तालाब में मुझे बोटिंग करनी है
मुंबई में मैं राज ठाकरे को सबक़ सिखाना चाहता हूँ
और हैदराबाद में मुझे वेज बिरयानी खानी है
मुझे हर राज्य
अपने कलेजे के टुकड़े जैसा लगता है
मुझे हर राजधानी
नई-नवेली दुल्हन की तरह
शर्माती हुई अपनी ओर खींचती है
मुझे
पसीनों और पानियों में फ़र्क़ करना नहीं आता
मैं
रेलवे स्टेशनों पर
बिसलेरी की बोतलों के सहारे नहीं
बल्कि जूठे हुए नलों के सहारे आता – जाता हूँ
—
ममता दीदी!
रोबिन्द्रनाथ की कहानी का काबुलीवाला
यूं ही बंगाल नहीं पहुंच गया था
उसके रास्ते में यक़ीनन थार का रेगिस्तान आया होगा
ममता दीदी!
यह जो बंगाल में
हर गली में मिलते हैं बाउल गायक
इनका रिश्ता
हमारे यहाँ पाबूजी की फड़ बांचने वालों से भी हो सकता है
ममता दीदी!
यह जो रसगुल्ला है तुम्हारे यहाँ का
इससे कभी अकेले में पूछना
यह बताएगा कि हिंदुस्तान में सबसे पहले गुड़ गलाया गया था
चीनी तो बहुत बाद में आई थी
ममता दीदी!
यह जो कम्युनिस्ट फिरा करते हैं लाल फटे कुरतों में
इन्हें क्या पता कि क्या होता है वामपंथ
बंगाल में तो बहुत बाद में आया वामाचार
हमारी स्यानण की पहाड़ियों में यह महाभारत काल से प्रचलित है
—
ममता दीदी!
यह सूती साड़ी
यह हवाई चप्पल
यह सस्ता चश्मा
यह टेढ़ा बंगाली लहजा
यह सब अटारी पर धरने का वक़्त आ गया है
—
ममता दीदी!
गुजरातियों से बचो न बचो
राजस्थानी से ज़रूर बचना
और उस राजस्थानी से ज़रूर बचना
जो कविता लिखता हो
कि हम वे हैं
जिन्होंने अन्नदाताओं को भी महाराज गंगा सिंह नहीं
मिस्टर गंगा सिंह कहा है
हम उधर मुँह भी नहीं करते
जिधर से गुज़रती हैं
उजड़े हुए रजवाड़ों की सुंदर नखराली बहु-बेटियां
हमें याद आ जाती हैं :
हमारी पुरखिनें
हमारी सांवली पुरखिनें!
—
ममता दीदी!
एक सच्चा भारतीय
एक सच्चे विरोध का मैनीफेस्टो होता है
उसे नहीं डरा सकते
किसी भी पार्टी के गुंडे बदमाश
ममता दीदी!
सीधे-सीधे बिना किसी बहस के
हवाले करो हमारा पश्चिम बंगाल
बहुत दिन हुए
कि यहाँ से
कीर्तन में मगन चैतन्य महाप्रभु
अपनी टोली के साथ
“हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे”
गाते हुए नहीं गुज़रे..!
(मनमीत सोनी)