State Elections 2026: बंगाल और तमिलनाडु के रिजल्ट्स से एक बात बहुत अच्छे से समझने को मिली है..
2014 में मिथुन ने तृणमूल जॉइन की थी, पर वह बहुत पहले से ही लेफ्ट के सपोर्टर थे। मेनस्ट्रीम कॉंग्रेस या बीजेपी के प्रति उनका कोई सपोर्ट नहीं था। लेकिन तृणमूल में घुसने के बाद, राज्यसभा सांसद बनने के 2 साल बाद ही उनको समझ आ गया कि टीएमसी जैसी पार्टी सिवाये तुष्टीकरण के कुछ नहीं कर रही है।
हालाँकि मिथुन 2021 में बीजेपी में घुसे, बीजेपी बंगाल हारी, पर गर्व से हारी, अच्छी मेहनत और बदलाव के बाद हारी, पर हार तो हार ही है। इस हार के बाद 9 से 10 कार्यकर्ता ऑन रिकार्ड मारे गए। ऑफ रिकार्ड कितनी कार्यकर्ताओं और उनकी पत्नी-बेटी के साथ ग़लत हुआ, इसका ठीक-ठीक आँकड़ा किसी के पास नहीं है।
पर बंगालियों को शायद घुसपैठ होती खलने लग गई। मतलब हाथ कंगन आरसी क्या वाला हिसाब हो गया कि जब बांग्लादेशियों को भगाने की बात होती है तो अचानक बॉर्डर से लगे गाँव शहरों से लोग भाग निकलते हैं। कुछ कुछ एरिया में तो इतने बांग्लादेशी हो गए हैं कि भारतीय कम पड़ जाएँ। चिकन नेक तो एक मसला था ही… अब भी है।
यही ग़लती स्टालिन वाली पार्टी की भी रही, तारा सिंह ने कहा था कि तुम्हारा पाक्सतां ज़िंदाबाद हो इससे हमें कोई दिक्कत नहीं, पड़ा होता रहे, पर हमारा हिंदुस्तान ज़िंदाबाद था, ज़िंदाबाद है, ज़िन्दाबाद रहेगा! तुम क्रिसचिएनिटी को प्रोमोट करो कोई प्रॉबलम नहीं, बहुतेरे हिन्दू क्रिसमस पर खुशी-खुशी मुमबत्ती जला आते हैं।
इसलाम प्रोमोट करो, खूब करो, दरगाह पर चादर चढ़ाने में भी हिन्दू पीछे नहीं। लेकिन सनातन को मत कोसो, इसे मत गाली दो। इसको खत्म करने की बात करोगे तो जितनी भी कास्ट्स बँटी हुई हैं, वो एक होंगी ही होंगी, तुम्हें खींच के नीचे गिराएंगी ही गिराएंगी।
मिथुन चक्रवर्ती को भी टीएमसी में यही कमी दिखी थी जो वह उससे अलग हुए कि टीएमसी के पास दुर्गा पूजा के लिए बजट हो न हो, ईद के लिए ज़रूर होता है। बांग्लादेशी लड़के लड़कियाँ बंगाल में भारतीय भाषाओं की ट्रैनिंग लेते हैं।
कोलकाता का 50 हज़ार, दिल्ली का एक लाख और मुंबई बैंगलोर का 2 लाख रुपया रेट फिक्स हो गया था कि इन शहरों में आपको बसाएंगे, काम दिलाएंगे।
ये पैसा किश्तों में भी दिया जा सकता है।
इतना बड़ा तुष्टीकरण होगा और देश की मिजॉरिटी आबादी देखती रह जायेगी, ये तो इम्पॉसिबल है। यूजीसी को लेकर युवाओं में शिकायत है भी तो वो इतनी नहीं है कि टीएमसी या स्टालिन को जिता दे।
इन सबसे इतर, स्मार्ट पॉलिटीशियन ओमर अब्दुल्लाह को देखिए। वो मुस्लिम सपोर्टर है, बिल्कुल है। पर वो कश्मीरी हिन्दुओं के खिलाफ़ नहीं है, वहाँ रघुनाथ मंदिर खुलवाने से लेकर, कश्मीरियों की घर वापसी तक उनके साथ है। देखना अगले इलेक्शन में कश्मीरी पंडित भी इसको वोट कर देंगे! कोई प्रॉबलम नहीं होगी।
देश की बाक़ी पार्टीज़ के लिए ये सबक है कि हिन्दू मिजॉरिटी अंधी नहीं है, आप तुष्टीकरण करोगे तो बीजेपी फ़ायदा उठायेगी ही। आपको जीतना है तो निष्पक्षता का ड्रामा करके एक पक्ष के प्रति ज़्यादा वफ़ादार होने से काम नहीं चलेगा, आपको बाकायदा पक्षपाती होकर 80% पाप्यलैशन के साथ खड़े होना पड़ेगा।
फिर यही 80% पाप्यलैशन, 20% का भी खयाल रखेगी, उन्हें किसी चीज़ की तकलीफ़ न होने देगी। लेकिन आप 20% को ही सबकुछ मानकर राजनीति करेंगे तो ये 80% आपको तकलीफ़ देने में ज़रा नहीं हिचकिचाएगी।
डेमोक्रेसी तो डिमाग्रफी से ही चलती है भाई!
(सिद्धार्थ अरोड़ा सहर)



