Poetry by Manmeet Soni: अक्षय तृतीया पर लिखी मनमीत की इस कविता में सदा की भाँति उनका पानी जैसा सरल लेखन दिखाई देता है जो हर मन की प्यास बुझाने आया है..
कल कहा तुमने मुझे :
आखातीज (अक्षय तृतीया) का त्यौहार है
बाज़ार जाइये
ला कर दीजिये मुझे मिट्टी का घड़ा –
मैं घड़ा डालूंगी!
और उसके लाड करुँगी!
और उसकी पूजा भी करूंगी!
—
गया मैं बाज़ार
एक लुगाई बैठी थी हट्टी-कट्टी
तपी हुई कुम्हारन
मुझे देखकर बोली :
“डेढ़ सौ का घड़ा / ढाई सौ का घड़ा / तीन सौ का घड़ा!”
“कौनसा घड़ा लेंगे आप भाईजी?”
मैंने कहा :
“जिसमें पानी ठंडा रहे / बहुत ठंडा रहे!”
वह हँसी मेरे भोलेपन पर
उठाया उसने एक घड़ा
उछाला उसे हवा में
बजाया अपनी अंगुलियों से
और इतराकर बोली :
“आप ये ढाई सौ वाला ले जाओ / मैडम खुशम ख़ुश हो जाएगी!”
—
ले आया मैं ढाई सौ का घड़ा
स्कूटर पर आगे रखकर
बचाते हुए उसे गिरने से
सम्भलाया उसे पत्नी को
पत्नी ने उसे सीने से लगा लिया
ठीक वैसे ही
जैसे कोई माँ लगाती है
अपने बच्चे को सीने से
धोया पत्नी ने घड़े को
उसकी मिट्टी साफ़ की
खंखोळा उसे
भरा उसे साफ़ पानी से
लाई पूजाघर से रोली और मौली
तिलक लगाया उसके
नाळ बांधी
सतिया बनाया
हाथ जोड़े
बोली :
“हे पानी देवता! सदा हमारे घर यूं ही बिराजो!”
—
कितना सरल समर्पण था पत्नी का
मैं दंग रह गया देखकर
मैंने भी जोड़े हाथ
पानी देवता से कहा :
“हे पानी देवता!
पानी जैसा सरल रखना मेरे लेखन को
ताकि हर कोई अपनी प्यास बुझा सके”!
—
अहा!
क्या आपने पिया है
कभी नए घड़े का पानी?
कितना शीतल
और मिट्टी के सौंधेपन से भरा
सूंघा है कभी घड़े को
उसके मुँह के पास अपना मुँह ले जाकर?
कोई गाना गुनगुनाया है?
आवाज़ की गूँज महसूस की है?
पुकारा है अपना या किसी और का नाम?
नहीं!
तो ऐसा कर के देखिये साहब!
—
मैं तो हटा ही नहीं नए घड़े के पास से
मुझे तो उस घड़े में
वह घड़ा दिखाई दिया
जिससे मैंने पहली बार पानी पिया होगा
मैंने तो उस घड़े में
उस घड़े को भी देखा
जिसे मेरा बच्चा फोड़ेगा
श्मशान घाट में
मेरे शव के बिलकुल पास!
—
कल दोपहर से लेकर
कितनी ही बार पी चुका हूँ नए घड़े का पानी
पत्नी कह रही है :
क्या बावले हो गए हैं आप?
मैं कहता हूँ :
मैं तो हमेशा से ही बावला हूँ!
—
घड़े को छूता हूँ
तो सोहनी याद आती है
याद आती है सोहनी की ननद
जिसके पक्के घड़े की जगह कच्चा घड़ा रख दिया था
सोहनी
चिनाब के पानी में डूब कर मर गई थी
और यह देखकर महिवाल भी डूब गया था –
मेरी कविता!
सोहनी बनकर
भावनाओं की चिनाब में कूद जाया कर
और
उस विचार से मिल जाया कर
जो उस किनारे महिवाल की तरह तेरा इंतज़ार करता है!
—
ऐ घड़े!
कोई कुम्हार तुझे चाक पर बनाता रहे
कोई कुम्हारन तेरा मोल-भाव करती रहे
कोई मनमीत तुझे ख़रीद कर घर लाता रहे
कोई प्रिया तुझे रोली-मौली से पूजती रहे
—
ऐ घड़े!
तू भरा रहे
तेरी उम्र दराज़ हो
हरी काई आ जाए
तेरी गीली गोल चिकनी दीवार पर
तुझमें डूबते रहें
प्लास्टिक के मग्गे
स्टील के गिलास
तू
यूं ही बुझाता रहे
हम सबकी प्यास!
(मनमीत सोनी)



