Poetry by Manmeet Soni: नारी हृदय के भाव किसी समस्या विशेष पर अपनी संपूर्णता में कैसे निखर सकते हैं या बिखर सकते हैं – देखिये एक विवाहित शिक्षिका पर चली युवा कवि मनमीत की कलम से..
बहुत ध्यान रखना पड़ता है मुझे
हर बार सलवार पहनते हुए सोचती हूँ
कि मेरी ब्रा का रंग उभर कर सामने न आए मेरे सलवार सूट से
डीप कट तो पहन ही नहीं सकती
कोशिश करती हूँ कि गले तक का कुछ पहनूं
फिर भी कई बार याद नहीं रहता
पूरा पीरियड चुन्नी के फिसलने
और वापस सीने पर लेने में चला जाता है
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राकेश और उसका ग्रुप बहुत बदमाश है
वे मुझे ऐसे देखते हैं जैसे खा ही जाएंगे
लेकिन मैं इस बात की कम्प्लेन प्रिंसिपल को नहीं करती
मुझे मालूम है इससे कुछ नहीं होगा
राकेश और उसके ग्रुप को मैं चाहे जितना अपने ममत्व से सींचूँ
लेकिन वे नहीं मानेंगे तो नहीं ही मानेंगे
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पीछे मुड़कर जैसे ही ब्लैक बोर्ड पर कुछ लिखती हूँ
लड़के मेरी बैक साइड देखते हैं
मुझे मालूम है मैं थोड़ी-सी भारी हूँ वहाँ से
मैं जानती हूँ कि लड़के फैंटसी भी करते हैं
इस चक्कर में कई बार टेढ़ी होकर लिखती हूँ ब्लैक बोर्ड पर
शब्द टेढ़े हो जाते हैं और बहुत भद्दी लगती हैं हैंडराइटिंग
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यह तो अच्छा है कि क्लास में दो-तीन लड़कियाँ
रेगुलर आती हैं जिससे मुझे हिम्मत रहती है
वे मुझे कहती हैं कि आप ध्यान मत दिया करो
मैं उन्हें कैसे बताऊँ कि पैंतीस हज़ार के लिए नहीं
अपने जूनून के वास्ते पढ़ाती हूँ कॉलेज में
मेरा मन नहीं लगता घर पर
कि मैं जज बनना चाहती थी
मगर जल्दी शादी हो गई मेरी
फिर बच्चे हो गए और अब तैयारी हो नहीं सकती
—
गुलाबी सलवार सूट में मुझे वे फूल कहते हैं
बैंगनी सलवार सूट में बैंगन कहते हैं
सफ़ेद सलवार सूट में कहते हैं विडो लगती है
हरा पहनती हूँ तो कहते हैं आज हरियाली लग रही है
मैं लड़कों की ज़बान समझने लगी हूँ
मुझे लड़कों से घिन्न होने लगी है
मैं उन्हें माँ की तरह प्यार करना चाहती हूँ
लेकिन अब एक स्त्री की तरह नफ़रत करने लगी हूँ
—
कॉलेज से घर के लिए निकलती हूँ
तो ऑटो पकड़ने से ठीक पहले
धीरे कर लेते हैं बाइक :
कहने को प्यार से पूछते हैं :
“आपको छोड़ दूँ मैम”
लेकिन एक बार बैठ गई थी
तो जानबूझकर ब्रेक मारता ले गया था घर तक
मैं राम राम करती रही पूरे रास्ते
यह तो अच्छा हुआ हस्बैंड ने नहीं देखा!
—
और भी बहुत सारी बातें हैं
जो कॉलेज के टॉयलेट से शुरू होती हैं
और लड़कों की नोट्स की कॉपी में ख़त्म
लेकिन मैं आपको क्या क्या बताऊं और क्या क्या छुपाऊं
कई बार तो जी करता है
पाँचवी क्लास तक की कोई स्कूल ज्वाइन कर लूं
फिर सोचती हूँ दस हज़ार में घर खर्च कैसे चलेगा
—
कभी कभी ऐसा लगता है
जैसे एक गाय हूँ मैं
और मेरे उघडे हुए थनों को कोई निचोड़ रहा है
क्लास से बाहर आती हूँ तो पसीने से भरी हुई आती हूँ
हालांकि ऊपर से यही दिखाती हूँ लड़कों को :
“तुम्हारी ऐसी की ऐसी सालो”
—
भगवान करे जल्दी से बूढी हो जाऊं
अनाकर्षक हो जाऊं जितनी जल्दी हो
माँस स्तन जांघ सब लटक जाएं
गालों और गर्दन पर झुर्रियाँ पड़ जाएं
मैं सचमुच सुंदर नहीं दिखना चाहती
मैं क्या करूँ मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा
—
याद आता है मेरा समय
हालांकि तब भी बहुत बदमाशी थी
लेकिन इतने कमीने नहीं होते थे लड़के
अब वह समय फिर नहीं आ सकता
लेकिन मैं कौनसे समय की बात कर रही हूँ
स्त्रियों के लिए हर समय ख़राब समय रहा है
—
हाए राम!
गर्मियों की छुट्टी हो जाए
तो मनपसंद कपड़े पहनूं
लिपस्टिक लगाऊं
आईने में सजूँ संवरूँ
वे मुझे प्यार से देखें!
राकेश और उसके ग्रुप के चक्कर में
इतनी कम तैयार होती हूँ आजकल
कि इनका मूड ही नहीं करता मुझे प्यार करने का…
हाए राम!
गर्मियों की छुट्टी में
कहीं घूमने जाऊं इनके और बच्चों के साथ!
(मनमीत सोनी)