CJP Violence at Jantar Mantar: युवा कवि मनमीत सोनी के व्यक्तित्व का सौन्दर्य मात्र उनकी कविता में जीवन्त मानवीय संवेदना ही नहीं अपितु राष्ट्र रक्षा के प्रत्येक विषये पर वैचारिक धरातल से राष्ट्रवाद की मुखर अभिव्यक्ति भी है..
1. ख़ुद मेरे घर में मेरे मामाजी की बेटी ने नीट का पेपर दिया था। पेपर लीक होने के बाद वह गुस्से में थी। मैं भी गुस्से में था। एक अजीब तरह की निराशा थी। लेकिन निराशा का मतलब अराजकता नहीं होता। उसने फिर मेहनत की। लेकिन फिर नंबर नहीं बने। अब क्या विकल्प था? क्या उसे जंतर मंतर जाना चाहिए था?
नहीं। उसे आगे के बारे में सोचना चाहिए था। उसने वही किया। अब वह शायद विज्ञान विषय से स्नातक करेगी। जीवन के तीन अमोल वर्षों को गंवाने के बावजूद स्नातक करेगी। उसे यही करना चाहिए।
उसे जंतर मंतर नहीं जाना चाहिए। सरकार लाख गलती पर हो, लेकिन वही अपने आप को सुधारेगी। यह एक लम्बी प्रक्रिया है। है तो है। दूसरा कोई नहीं सुधारेगा। ख़ुद सरकार को पता है कि उसे वोट चाहिए तो कमियां दुरुस्त करनी होंगी। नहीं करेगी तो पछताएगी। हमारे पास सरकार बदलने के संवैधानिक विकल्प हैं।
2. पिछले बारह तेरह सालों में यह बारहवां तेरहवां अवसर है, जब भारतीय जनता पार्टी की चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की गई है। यह कोशिश छुपी हुई तो है नहीं। आप कितनी भी कोशिश कर लीजिये। प्रधानमंत्री पर अब भी करोड़ों लोगों को भरोसा है। और यह भरोसा नहीं टूटेगा।
एक सौ चालीस करोड़ लोगों के देश में दस हज़ार नाबालिग – बालिग – अति बालिग मूर्ख लोगों को इकट्ठा करके इसे जन-आंदोलन कहना कितनी बड़ी मूर्खता है, उफ़!
3. सोशल मीडिया से आंदोलन नहीं चलता। आप इस पोस्ट पर मुझे ट्रोल कर लीजिये। क्या फ़र्क़ पड़ता है। पोस्ट डिलीट, ट्रोलिंग डिलीट। वामपंथी गधों को लगता है कि सारी समझदारी उन्हीं के पास है। नहीं! ऐसा नहीं है!
कॉलेज में पढ़ाते हैं। सहायक आचार्य है। कई बार एक साथ पचास विद्यार्थियों की बैक भी लग जाती है तो उन्हें यही समझाते हैं कि यूनिवर्सिटी से गलती हो गई होगी लेकिन ज़्यादा तोड़ फोड़ मत करो। दुबारा चेकिंग करवाओ। और वे पास हो जाते हैं। नहीं तो वापस एग्जाम देकर पास हो जाते हैं। यूनिवर्सिटी के ऑफिशियल माफ़ी मांग लेते हैं। रास्ता निकल जाता है।
4. पूरा आंदोलन हिन्दू विरोध पर टिका है। नीट दिए हुए पांच सौ बच्चे भी वहाँ नहीं है। पूरी तरह नकार और ढीठता की राजनीति है। सरकार को बात करना तो दूर संज्ञान तक नहीं लेना चाहिए। डुबा के सरसों के तेल में लट्ठ ढूंगे फोडने चाहिए, सो अलग। यह क्या बकवास है कि भारत तेरे टुकड़े होंगे, सीता का पति, आज़ादी दो वगैरह। काहे को नड्डा जी से मुलाक़ात करवाई। मुद्दा बड़ा बनने ही क्यों दिया। भीड़ घुसने ही क्यों दी दिल्ली में। दिल्ली की सीमाओं पर ही जूत मारने चाहिए थे। कॉकरोच हो तो इलाज भी कॉकरोच वाला ही होना चाहिए था।
5. एक नंबर के नाकारा, निकम्मे, धर्म विरोधी और उत्पाती किस्म के लोग इकट्ठा हुए हैं। दीपके तो बीयर पार्टी कर रहा था। वांगचुक जैसे अलगाववादी को हीरो बनाया गया। ग़लत ही ग़लत। नींव ग़लत। मकान गलत। मंज़िल ग़लत।
6. दिल्ली के लोगों को जहाँ कॉकरोच दिख जाए, पानी पिलाने के बजाय लट्ठ उठाना चाहिए। जो ईमानदार हैं, जो सिस्टम को समझते हैं, जो सरकार और लोकतंत्र पर भरोसा रखते हैं, वे इसी सिस्टम के भीतर रह कर कुछ बन रहे हैं, काम कर रहे हैं और आगे बढ़ रहे हैं।
7. बाप ने भेजा आईएएस बनने के लिए और बेटा मंडी हॉउस में गांजा पीकर लाइव कर रहा है। वाह। और नीचे उसके भड़वे दोस्त कह रहे हैं : मोर पावर टू यू। अबे मूसलचंद, तेरे मज़े ले रहे हैं सब। नहीं आती तुझे कविता। तू अभिधा को कविता समझ बैठा है। दो साल बाद जब ओवर ऐज हो जाएगा तो सरकार मारे न मारे घरवाले ज़रूर मारेंगे।
8. कह रहे हैं लाला लाजपत राय की तरह लाठी खाएंगे। घरवाले सही समय पर लाठी मारते तो आज तेरा कैरियर ताबूत की तरह बंद नहीं होता। तुझ पर पड़ने वाली एक भी लाठी बीजेपी के ताबूत की आख़िरी क़ील नहीं बनेगी। उल्टा अगले सावनों में तेरा कूल्हा दुखेगा सो अलग।
9. ऐसे ऐसे गण्ड-फट्टुओं से परिचित हूँ कि पिछले दस बरस से अवसाद की गोलियाँ खा रहे हैं और अफ़सोस इन्हें यह है कि दिल्ली जा कर सरकार की लाठी नहीं खा पाए।
और उस लड़की का तो क्या ही कहूं जो असली का कॉकरोच देखले तो बिस्तर पर चढ़ जाती है लेकिन अभी दिल्ली की वीडियो देखकर आनंदअतिरेक में झूम रही है।
हे ईश्वर! इस मनोरंजन के लिए तेरा लाख शुक्रिया!
10. मैं फिर कहता हूँ। यह सरकार अन्य सरकारों जैसी ही सरकार है। लेकिन हिन्दुओं की शत्रु नहीं है। और जो हिन्दुओं का शत्रु नहीं होगा, वह हमें प्यारा होगा। इस उत्पात (आंदोलन नहीं) को रात में शादी ब्याह के तरह फैले हुए कचरे की तरह सरकार जल्द से जल्द साफ़ करे। कल सुबह तक दिल्ली ख़ाली चाहिए।
11. अगर नीट के बच्चे आंदोलन करें। अगर संसद के आगे बैठें। अगर एक अच्छा नेतृत्व हो। अगर मंच पर हिन्दू विरोधी न हों, अगर सीता का पति और ले के रहेंगे आज़ादी जैसी बकवास न हो तो आंदोलन के यज्ञ में एक समिधा मेरी भी होती।
लेकिन आप नीच, कमीने और मूरख एक साथ हैं।
इससे पहले कि सोशल मीडिया टूलकिट में नहीं फंसने वाली जनता आपका इलाज करे, सुबह की बस या रेल से दिल्ली से निकल जाइये। वैसे भी पावर बैंक ख़त्म हो गया होगा। मोबाइल डिस्चार्ज हो गया होगा। नेट जाम होगा।
राम राम। सियावर रामचंद्र की जय!
(मनमीत सोनी)



