Tuesday, September 1, 2026
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Zara Sochiye by Manmeet Soni: दिमागी नक्सल – एक मास्टरस्ट्रोक

Zara Sochiye by Manmeet Soni: इस सार्थक आलेख में लोकप्रिय युवा कवि एवं लेखक मनमीत सोनी की कलम बताती है कि यूं ही नहीं कह दी पीएम मोदी ने दिमागी नक्सल वाली बात..

Zara Sochiye by Manmeet Soni: मनमीत सोनी का तथ्यात्मक विश्लेषण सटीक भी है और सार्थक भी – जो हम सभी के ध्यान की दिशा में आवश्यक भी है.. 

2026 का यह पंद्रह अगस्त, 2014 से 2025 के पंद्रह अगस्तों से बिलकुल अलग था। लाल क़िले से आख़िर वह कह ही दिया गया, जिससे बचने की कोशिश पिछले 12 बरसों से की जा रही थी। सम्भवतः इसलिए कि मोदी भी मन ही मन जानते हैं कि कि 2029 का लोकसभा चुनाव यदि वे जीत गए तो यह उनका अंतिम चुनाव होगा या यह भी हो सकता है कि आयु को देखते हुए उन्हें बीच में ही रिटायर होना पड़े।

मोदी जी ने देश के विरोधियों को नया नाम दिया है : “दिमागी – नक्सल”।

और यह बहुत सोच समझकर दिया गया नाम है।

ध्यान रहे कि पहले जो शब्द प्रचलित था, वह “अर्बन नक्सल” था। लेकिन मोदीजी ने “अर्बन” शब्द को हटा दिया है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि “अर्बन” कहने से केवल एक “वर्ग विशेष” की ओर इशारा होता था या हो सकता था। लेकिन “दिमागी – नक्सल” कहने से अब वह हर व्यक्ति इसके घेरे में आ गया है, जो देश – विरोधी है, चाहे वह “गाँव” का हो, “क़स्बे” का हो, “मेट्रो सिटी” का हो। चाहे “ग़रीब” हो, चाहे “अमीर” हो, चाहे “हिन्दू” हो, चाहे “मुसलमान” हो।

यह एक तीर से दो निशाने साधने वाली बात है। मोदीजी अच्छी तरह जानते हैं कि वे भारत नहीं हैं। जैसे इंदिरा इंडिया नहीं थीं। लेकिन उनका विरोध करने वाली की छवि एक बहुत बड़ी जनसंख्या के अनुसार “भारत – विरोधी” की बन जाती है। और इसमें मोदीजी के अंधभक्तों की गलती नहीं बल्कि मोदीजी के विरोधियों की ही गलती है कि वे यह साबित नहीं पाते कि वे “मोदी – विरोधी” हैं, “देश – विरोधी” नहीं।

इस “दिमागी – नक्सल” का परिणाम क्या होगा? – जानते हैं आप?

परिणाम बड़ा सरल होगा। परिणाम यह होगा कि हल्के से हल्का “मोदी – विरोधी” भी चीख़-चीख़ कर कहेगा कि हाँ मैं दिमागी – नक्सल हूँ। (चिदंबरम जैसे भारी भरकम भी फंस गए)।

आपको चारों ओर दिमागी – नक्सल ही दिखाई देंगें। परिणाम यह होगा कि नक्सल का इतिहास नहीं जानने वाला मोदी – समर्थक किसी भी मोदी – विरोधी को सीधे – सीधे “दिमागी नक्सल” कहेगा।

और मोदी – विरोधी कहेगा : “हाँ! हूँ दिमागी – नक्सल! क्या उखाड़ लेगा?”

परिणाम यह होगा कि इस देश में 2029 तक आते – आते “दिमागी – देशभक्त” और “दिमागी – नक्सल” की दो श्रेणी बन जाएँगी। परिणाम यह होगा कि हिन्दू – मुसलमान, अमीर – ग़रीब, सवर्ण – दलित जैसे चुनावी समीकरण तो होंगे ही, इनके साथ “दिमागी – देशभक्त” और “दिमागी – नक्सल” जैसे समीकरण भी होंगे। हर हाल में यही होगा कि “दिमागी – नक्सल”, “दिमागी – देशभक्त” से संख्या में कम होंगे। चुनाव आक्रामक हो जाएगा। देशभक्ति और गद्दारी जैसे विषय पर चला जाएगा। निश्चित जानिये कि देशभक्त यदि चालीस प्रतिशत होंगे तो नक्सली बीस प्रतिशत। और भाजपा 300 सीटों के आस – पास चुनाव को खींच लाएगी।

यह बहुत सरल गणित है। लेकिन कांग्रेसियों को यह समझ में नहीं आएगा। इसका सीधा-सा कारण है कि पिछले बारह बरसों से वे मोदीजी की बनाई हुई पिच पर ही चुनाव का क्रिकेट खेल रहे हैं। ऊपर से राहुल गाँधी जैसा नेतृत्व। ऊपर से चिदंबरम / जयराम रमेश / सुप्रिया श्रीनेत जैसे वज्र मूर्ख। क्या कहा जाए। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि मोदीजी ने लाल क़िले से एक तीर छोड़ा और कांग्रेसियों ने उस नुकीले तीर से कहा :

“ऐ भाई! तू हवा में कैसे उड़ सकता है भाई तीर! आ! हमारे पिछवाड़े में घुस जा!”

मैं नक्सल – आंदोलन पर बात कर ही नहीं रहा। मैं तो नक्सल – आंदोलन की जो आम – जनता में छवि है, उसकी बात कर रहा हूँ। आतंकवाद एक अकादमिक विषय हो सकता है। ठीक उसी तरह नक्सलवाद भी। इन पर सैंकड़ो किताबें भी लिखी गई हैं। लेकिन एक आम भारतीय बड़ा सीधा और सरल होता है। वह आतंकवादी / नक्सल / वामपंथी को एक तराज़ू में तौलता है।

वह यही कहेगा : “भाग! कुत्ते साले!”

और आप उस आम भारतीय को न तो समझा सकते हैं ( वह आपसे ज़्यादा समझदार है ) और न कंविन्स कर सकते हैं कि भाई आतंकवाद / नक्सलवाद के पीछे गरीबी है / अशिक्षा है। आम भारतीय कहेगा : भारत में करोड़ों लोग ग़रीब हैं। उनमें से कितने आतंकवादी या नक्सल बन गए! बोलो गांडुओ! जवाब दो!

और “दिमागी – नक्सल” के पास कोई जवाब नहीं होगा।

अब मैच खुल गया है। बादल छंट गए हैं। कॉकरोच पार्टी वाले थक – थुका कर कहीं पड़े हैं। सरकारी राडार पर हैं, सो अलग। अब प्रत्येक देश – विरोधी घोषित रूप से “दिमागी नक्सल” है। अब समय आ गया है कि हृदय से देशभक्त लोग इन कमीनों का मज़ाक़ उड़ाएँ। उदाहरण के लिए कुछ “दिमागी – नक्सल” मेरी वाल पर भी आएँगे। लेकिन मैं उन्हें “इंटरटेन” ही नहीं करूँगा। लोग उनकी बातों पर हंसेंगे। उन्हें दुत्कार देंगे। उनके मज़े लेंगे। जब कोई मज़ाक़ का विषय बन जाए, तो उसे गंभीरता से नहीं लेना चाहिए।

“मैं भी दिमागी – नक्सल” अभी और जोर पकड़ेगा। आप देखते जाइएगा कि कैसे – कैसे मेंढक और कॉकरोच दरअसल असल में सांप निकलेंगे। मोदीजी ने हमारे हाथों में एक बेहद महीन छलनी दे दी है। इसके लिए मोदी जी का शुक्रिया।

कुल मिलाकर 2029 और सरल हो गया है।

काश, कांग्रेस मेरा ज़मीर ख़रीद पाती तो मैं उसे बता पाता कि मोदीजी के इस दांव की काट क्या है?

ख़ैर, मेरे भले कुएँ में पड़ो!

(मनमीत सोनी)

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