निवेदिता!
भारत सचमुच एक मनहूस देश है। यहाँ हर साल सदियों से बाढ़ आती है, लोग डूबते हैं, सामान बह जाता है, सब कुछ ख़त्म हो जाता है। यहाँ लोग नियमों से नहीं चलते। फुटपाथ पर सोते हैं। गाड़ियाँ उन्हें कुचल जाती हैं। कोर्ट कचहरी तीन – तीन पीढ़ियों तक खिंच जाती है। यहाँ नौकरी से लेकर पेंशन, यहाँ आधार से लेकर राशन, यहाँ हॉस्पिटल से लेकर एजुकेशन; सब कुछ मनहूस है।
लेकिन निवेदिता! मेरी एक बात सुनो! और यह सच्ची बात परसों रात दस बजे की है जब मैं “स्टाइलिश सैलून” पर दाढ़ी और बाल बनवाने गया था।
मेरी दाढ़ी और कटिंग कर रहा था “अली भाई”! अली भाई के साथ था “शादाब”! शादाब के साथ सिगरेट पीने का इंतज़ार कर रहा था “मक़बूल”!
अली भाई ने मुझसे कहा : मनमीत भाई! क़तर चला जाऊं क्या?
मैंने कहा : मुल्क़ मत छोड़ो यार!
अली भाई ने कहा : दादा! इस चौराहे में मेरी जान बसती है। मुहर्रम भी यहीं से निकलता है और राम नवमी की शोभा यात्रा भी। नहीं जाएंगे दादा! फिर एक बात और! अम्मी को नहीं छोड़ा जाता!
इतने में शादाब ने कहा : वहाँ पैसा बहुत है!
अली भाई ने बात काटी : पैसा गया गाँ…. मरवाने!
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निवेदिता!
तुम मुसलमानों के बीच कभी रही ही नहीं हो। मेरा पूरा बचपन मुसलमानों के मोहल्ले में गुज़रा है। मेरी नानी का घर मुसलमानों के मोहल्ले में था। और इतने प्रगाढ़ रिश्ते थे कि दुबई / क़तर / अरब से कोई मुस्लिम आता था और गठरी में सामान लाता था तो मेरी नानी के “शुभ” हाथों से वह गठरी खुलती थी।
हाँ, यह अलग बात है कि हमें हमेशा एक अतिरिक्त सावधानी रखनी पड़ती थी कि हम भूल से भी उनके मज़हब और अल्लाह के बारे में को ग़लत टिप्पणी न कर दें। लेकिन इन सब के बावजूद हमें उनके घड़े से पानी पीने, उनकी रसोई में गोश्त को टाल कर ( काली थैली ) आलू बुखारे खाने और उनकी औरतों की काली सलवार में रखी मीठी सुपारियों जैसे बबलू / गोल्डन / डॉलर को चाटने चूसने थूकने में कोई परहेज न था।
ताजियों के नीचे से तो मैं कितनी ही बार निकला हूँ। गर्मी में सड़क लगी छबील की स्टाल से कितनी ही बार गिलास भर-भर कर शरबत पिया है। मुसलमानों की गलियों में गधों से भी ऊँचे और मज़बूत हड्डीखोर कुत्तों से डरा हूँ तो बचाया भी मुसलमानों के द्वारा ही गया हूँ।
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निवेदिता! तुम यक़ीन न करोगी लेकिन यह बात सच है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों के लिए मैंने मुसलमानों के मोहल्ले से टिफिन लिए हैं और उन्होंने मुझे कभी मना नहीं किया।
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निवेदिता!
हिन्दुओं और मुसलमानों की दुनिया अलग अलग है। लेकिन इतनी अलग अलग भी नहीं है कि वे हमारे देश को “मनहूस” कहें। हुई होंगी लड़ाइयाँ। कटे होंगे सर। बही होंगी रक्त की नदियाँ। दुनिया का कौनसा मुल्क़ है कि जिसकी नींव ग़लतफ़हमियों ने नहीं रखी। लेकिन धीरे-धीरे हमें एक-दूसरे को बर्दाश्त करना आ गया है।
एक दिन हम उन्हें समझा लेंगे कि भारत अगर हिन्दू राष्ट्र बन भी जाता है तब भी आप हमारे इतने ही अज़ीज़ रहेंगे। एक दिन वे भी हमें कंविन्स कर लेंगे कि हिन्दू राष्ट्र बनाने की कोई ज़रूरत नहीं, हम कहाँ आपके रीत रिवाजों के बीच आ रहे हैं?
लेकिन निवेदिता! तुम! हाँ तुम! अपने काम से काम रखो!
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निवेदिता!
वे भोले हैं जो हर बात में वेद / पुराण ले आते हैं। उनसे भी भोले वे हैं जिन्हें आसमानी किताब की हर बात सच्ची लगती है। वे और भी भोले हैं, जिन्हें लगता है कि या तो हिन्दू बचेगा या मुसलमान! लेकिन इन भोले लोगों से इतर तुम जैसे कमीने भी हैं, जिन्हें लगता है कि इस झगड़े के बाज़ को जितना गोश्त खिलाया जाए, उतना कम है।
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निवेदिता!
क्या तुम कायमखानियों के बारे में जानती हो? वे पक्के राजपूत थे, जो मुसलमान हो गए। उनकी औरतें आज भी घूंघट निकालती हैं और राजपूती ज़ेवर पहनती हैं। दीपावली पर लक्ष्मी जी को धोकती हैं और ईद पर गोश्त पकाती हैं। हम जैसे लोग उन्हीं घरों में खेलकर बड़े हुए हैं। हमारे लिए एक उम्र तक हिन्दू मुसलमान में कोई फ़र्क़ न था। लेकिन आज है। और है, तो कहीं न कहीं इसका अफ़सोस भी है। अफ़सोस है, क्योंकि हम सब एक देश के वासी हैं। चाहे हम हों, या वे हों, दोनों ही क़ौमी यकजहती के आदर्श से बहुत दूर चले गए हैं।
कांग्रेस ने तुष्टिकरण की राजनीति की। भाजपा ने उल्टी राजनीति की। लेकिन आने वाला समय इन दोनों ही राजनीतियों का समय नहीं है। आने वाला समय पाकिस्तान, चीन, रूस, अमेरिका से लेकर नेपाल और श्रीलंका तक फैले हुए ख़तरों का है।
हम पर यह भारी ज़िम्मेदारी है कि हम यहाँ के मुस्लिमों को धर्म के नाम पर बहकने न देवें। हमारा फर्ज़ है कि हिन्दू इतने मतलबी और स्वार्थी न हो जाएं कि इस देश को केवल अपनी ही सम्पत्ति समझें।
हमारे आपसी झगड़े दुनिया के लिए एक मौका है। तुम जैसों के लिए मौका है। कॉकरोचों के लिए मौका है। हमें बहुत सावधान, सतर्क और तैयार रहना होगा।
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निवेदिता!
कभी गौर किया है कि तुम क्या हो? तुम एक परजीवी हो। तुम्हें न हिन्दू से मतलब है न मुस्लिम से। तुम्हें न मर्द से मतलब है न औरत से। तुम्हें ब्राह्मण से मतलब है न दलित से। तुम्हें मतलब है “टुकड़े” करने से। क्योंकि तुम्हें टुकड़े करने के बदले ही बोटी परोसी जाती है। तुम्हारे विद्यार्थी तुम्हारे एजेंट बनकर पूरे भारत में फैल जाते हैं। वे “इंटेलेक्चुअल” होने का दावा करते हैं लेकिन उन्हें आलू प्याज़ दाल चावल का भाव तक नहीं पता। तुम अपने भाषण, अपना ज्ञान, अपनी बौद्धिकता अपने पास रखो।
मैं फिर कहता हूँ : हाँ! हिन्दू और मुसलमान आज की तारीख़ में एक नहीं हैं, लेकिन विश्व-जिहाद के खिलाफ़ यदि कोई पहली सच्ची आवाज़ उठेगी तो हिन्दुओं का साथ देने के लिए मुसलमान ज़रूर आगे आएँगे। मैं उनके “ज़मीर” और “मादरे वतन की ख़ातिर मर मिटने के जज़्बे पर” संदेह नहीं करूँगा। उन्हें एक मिसाल पेश करनी ही होगी। वे अपने इतिहास से सबक़ लेंगे और हिन्दू भाइयों की ओर मुड़ेंगे।
और ऐसा नहीं होगा तब भी, मैं यह ख़्वाब देखूँगा। देखता ही रहूँगा।
निवेदिता!
यह भारत मेरी आँख का तारा है। यह तारा किसी सूरज की उधार की रौशनी से नहीं चमकता। यह अपनी ही तबो-ताब से चमकता है। यदि यह जिन्ना पैदा करता है तो कलाम भी।
यह अकबरुद्दीन ओवेसी पैदा करता है तो आरिफ़ मुहम्मद खान भी। यदि पूरी दुनिया में सबसे उदार मुसलमान कहीं है तो वह सिर्फ़ भारत में है।
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निवेदिता!
हम तो समझते थे कि बड़ी जगह के गुरु बड़े दिल के होते हैं। छोटे थे तो ख़्वाब सजाते थे कि जेएनयू में पढ़ेंगे। लेकिन कितना अच्छा हुआ कि बड़ी जगह से नहीं, हम “सही जगह” से पढ़े।
मैं भूल नहीं सकता अहमद सत्तार नाम के उस शिक्षक को जिसने मुझे यह कहा :
“इक़बाल पर मुसलमान गर्व करते होंगे मनमीत! लेकिन उसके मन में भारत के प्रति गद्दारी थी!”
मैं भूल नहीं सकता हारून धोबी को, कि जिसने बोनमेरो कैंसर से पीड़ित मेरा दादा मरहूम के लिए मक्का में सेहत की नमाज़ पढ़ी।
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निवेदिता!
अपनी बनाई हुई मनहूसियत से बाहर निकलो! अच्छे लोगों से मिलो! वे हिन्दुओं में भी हैं और मुसलमानों में भी। मैं अच्छे लोगों का क़र्ज़दार हूँ। और, जहाँ तक बुरे लोगों का सवाल है, मैं गॉड / अल्ला / ईश्वर के प्रति कृतज्ञता से भरा हूँ। मुझे यक़ीन है कि वह सबको रौशनी देता है।
निवेदिता!
तुम्हें भी रौशनी मिले! चाहे तुम जितनी भी “मनहूस” हो।
(मनमीत सोनी)



