Poetry by Manmeet Soni:..और यह रास्ता आप कभी भी अपना सकती थीं। इसके लिए आपको मोदी या राहुल या केजरीवाल की ज़रूरत नहीं थी।..
मैं यह चिट्ठी भारतीय स्त्रियों के नाम लिख रहा हूँ। मैं जानता हूँ कि इस चिट्ठी पर कई तरह की प्रतिक्रियाएँ आएँगी। शायद गालियां ज़्यादा। लेकिन मैं डर नहीं रहा हूँ।
मैं इसलिए नहीं डर रहा हूँ कि मैं, मेरे आस – पास की स्त्रियों, जैसे : मेरी माँ, मेरी बहन, मेरी दादी, मेरी पत्नी और मेरी महिला-मित्रों पर बेहद भरोसा करता हूँ। मुझे भरोसा है कि अच्छे मन से की हुई बात अपने पते तक ज़रूर पहुँचती है।
—
यह चिट्ठी एक ज़रूरी चिट्ठी है। कांग्रेस के राजकुमार और विपक्ष ने मोर्चा खोल दिया है। भारत के विद्यार्थियों को भड़काने की नाकाम और नापाक कोशिश के बाद अब वे भारतीय – स्त्रियों को निशाना बना रहे हैं। उन्हें लगता है कि वे “आसान टारगेट” हैं। जेल काट कर आए तथाकथित स्त्रीवादी कवियों, अपनी पत्नियों के प्रति बेईमान सामाजिक कार्यकर्ताओं और नाक-नाक तक वासना में डूबे हुए राजनीतिक लोगों को भी यह लगता है कि आप “आसान टारगेट” हैं।
वे ऐसा इसलिए समझते हैं क्योंकि उन्हें आपकी भावुकता आपकी कमज़ोरी लगती है। उन्हें लगता है कि आप अपने परिवारों और समाज से इतनी दुखी हैं कि उनकी हाँ में हाँ मिलाने लगेंगी।
उन्हें लगता है कि आप उनके कहने पर सलवार कमीज़ खोलकर / साड़ियां फेंककर / बुर्के उतारकर उनका वोट बैंक बन जाएँगी और 2029 में उनकी सरकार आ जाएगी।
लेकिन मैं जानता हूँ कि आप ऐसा नहीं होने देंगी। मुझे आप पर भरोसा है। यह भरोसा आपकी बेवकूफी या भोलेपन के कारण नहीं है। बल्कि यह भरोसा इसलिए है कि आपने हम मर्दों की कमीनगी को कभी ख़ुद पर हावी नहीं होने दिया। बल्कि आपने हमसे प्यार किया, हमें समझाया, हमारा ध्यान रखा और हम भटक गए तो हमें राह पर भी लेकर आईं। आपने हम कमीनों के बराबर कमीनी होना नहीं चुना। जबकि यह सबसे आसान रास्ता था। और यह रास्ता आप कभी भी अपना सकती थीं। इसके लिए आपको मोदी या राहुल या केजरीवाल की ज़रूरत नहीं थी।
—
देखिए! बिलकुल साफ़ बात है। मैं दो बातें नहीं करता। मैं मुझे और मुझ जैसों का बचाव भी नहीं कर रहा। मैं स्वीकार करता हूँ कि हम मर्दों ने आज तक जो भी जिया / किया / लिखा / कहा / सोचा, वह सब कुछ आप स्त्रियों के खिलाफ़ ही था। वह चाशनी में लिपटा हुआ ज़हर था। चाहे वह वेद ही क्यों न हो। गीता ही क्यों हो। रामचरितमानस ही क्यों न हो। कुरान या बाइबिल ही क्यों न हो।
सत्ता हमेशा हमारे हाथ में रही। नियम क़ायदे हमने ही बनाए। सभ्यताओं का चक्र कुछ ऐसा ही चला। सदियों आपको घरों के दरवाज़ों के पीछे रहना पड़ा। कभी घूंघट ने मारा कभी हिजाब ने। कभी रसोई ने तो कभी माहवारी ने। कभी स्वयं आपका शरीर ही आपकी बाधा बन गया कभी आपका कोमल मन आपके आड़े आ गया।
—
लेकिन वह समय गुज़र गया है। अब आप बहुत आज़ाद हो चुकी हैं। कितने ही बंधन टूट चुके हैं। कुछ जगहों पर तो आप मर्दों से आगे भी हैं। लगातार सुधार हो रहे हैं। इसके बावजूद जो कमियां हैं, उन्हें हम और आप मिलकर दूर कर लेंगे। यह हमारे घर / हमारे समाज / हमारे परिवेश का मामला है। मेरी आपसे हाथ जोड़ कर गुज़ारिश है कि अपना हाथ उन लोगों के हाथों में मत दीजिये, जो आपको घर से निकालकर संदेह के चौराहे पर बे-घरबार खड़ा कर देना चाहते हैं।
एक मर्द होने के नाते मैं हर मर्द के बारे में गारंटी लेता हूँ कि वह आपके भले से पहले अपना भला सोचेगा। चाहे वह कांग्रेस का राजकुमार ही क्यों न हो। उसे तो सत्ता चाहिए। उसे तो वोट बैंक चाहिए। लेकिन मुझे “आप” चाहिए। सिर्फ़ “आप की” वजह से मेरा बँधा हुआ घर – परिवार चाहिए।
और मैं जानता हूँ कि आप भी घर – परिवार से इतर नहीं सोचती हैं। या कम सोचती हैं।
—
भारतीय स्त्रियो!
घर – परिवार कोई बुरी चीज़ नहीं है। तमाम बुराइयों के बीच इसी में सुख – चैन की नींद आती है। एक स्त्री ( चाहे नौकरीपेशा ही क्यों न हो ) लेकिन अपने बच्चे को दूध पिलाने में जो सुख पाती है या उसे उसकी पसंद का खाना खाते हुए जो आनंद पाती है, उसकी तुलना किसी टुटपूंजीया नौकरी से नहीं की जा सकती। मैं मर्द होकर अपने बच्चे के साथ समय बिताना ज़्यादा पसंद करता हूँ बजाय काम पर जाने के। फिर आप तो जन्मदात्री हैं। आपसे यह सुख कहाँ अनजान है।
हाँ, जीवन केवल बच्चों या पति की सेवा नहीं है लेकिन इस समर्पण को निकाल देने के बाद जो जीवन बचता है, क्या उसे जीवन कहा जा सकता है?
—
आपको भड़काने के बहुत प्रयास होंगे। आपसे सारे बंधन काट डालने को कहे जाएंगे। आपकी पवित्र पुस्तकों का अपमान किया जाएगा। आपकी मनु स्मृति, आपकी गीता, आपकी रामायण पर चौतरफ़ा हमले होंगे। यह जानते हुए भी कि उनमें कुछ बुरी बातें हैं, हम उन्हें फाड़ तो नहीं सकते न। आख़िर वे हमारी व्यवस्था को बनाए रखने में सहयोगी रही हैं। हाँ, जो भी अंश आपको आपके खिलाफ़ लगे, उसकी सार्वजनिक होली जला दीजिये। कोई समस्या नहीं। लेकिन इस जाल में मत फंसिये कि सब कुछ ही बुरा है / ख़राब है / खिलाफ़ है / गंदा है / फेंक देने लायक़ है।
—
सत्ता का खेल बहुत गंदा होता है। मुझे कोई समस्या नहीं कि आज मोदी है तो कल राहुल प्रधानमंत्री होंगे। जनता अगर चुनेगी तो बनेंगे ही। मैं रोकने वाला कौन होता हूँ। लेकिन एक सार्वजनिक कार्यक्रम केवल इसलिए किया जाए कि भारतीय स्त्रियों को आज़ादी के नाम पर उनके परिवार से काटने की नापाक कोशिश की जाए तो आपको चेताना मेरा धर्म बनता है।
—
इस चिट्ठी में यहाँ तक पहुँचते पहुँचते मैं सोचने लगा हूँ कि आगे आपसे क्या कहूँ। वे आपको बार बार याद दिलाएंगे कि आप अपनी ब्रा और पैंटी तक खुलेआम नहीं सुखा सकतीं। वे कहेंगे कि आपको सैनिट्री पेड भी छुपकर काली थैली में खरीदने पड़ते हैं। वे आपको कहेंगे कि अपने पति से सेक्स करना है या नहीं यह आप नहीं, बल्कि आपके पति तय करते हैं और इस तरह यह प्यार नहीं बल्कि बलात्कार बन जाता है।
मैं उनसे सहमत हूँ। मैं कोई एलियन नहीं हूँ। मैं यह सारी बातें जानता हूँ। लेकिन मैं फ़र्ज़ी स्त्रीवादी कवि / लेखक नहीं बनूंगा। मैं तो आपसे आपकी दुर्गति के लिए माफ़ी ही मांग सकता हूँ।
यह जो ब्रा / पैंटी / सेक्स करना है या नहीं / लड़का पैदा होगा या लड़की / नौकरी करनी है या नहीं / छोटे कपड़े पहनने हैं या नहीं; यह मुद्दे सरकार हल नहीं करती। इनके लिए तो आपको ही भीतरी संघर्ष करना होगा। आपको ही सदियों के ताले खोलने होंगे। आपको ही अपने बच्चों को इनके बारे में “ओपन” और “सहज” करना होगा।
यही रास्ता है। यही सही भी है।
फिर भी आपको किसी पार्टी के मुखिया में अपना रहबर नज़र आता है तो मैं कुछ नहीं कहूंगा। आप अपनी भलाई बेहतर जानती हैं। मैं तो आपके साथ आपके हर निर्णय में खड़ा हूँ। एक मामूली-सा कवि और कॉलेज का लेक्चरर हूँ। इशारों में ही कुछ बातें कह सकता था।
सो, कह दीं।
—
भारतीय स्त्रियो!
बस आख़िरी बात,
यह जो कुछ दिन पहले जंतर मंतर पर हुआ, यह आपकी परवरिश नहीं हो सकती। इतनी गंदी और घटिया औलादें आपकी नहीं हो सकतीं। मैं आपको और आपके भाषाई संस्कारों को जानता हूँ। मेरा निवेदन है कि अपने साथ अपने बच्चों को भी सत्ता के इस गंदे खेल से बचाइये।
जेन ज़ी / जेन अल्फ़ा / आप स्त्रियां / अल्पसंख्यक / दलित / पिछड़े / आदिवासी वगैरह उनके लिए सिर्फ़ वोट बैंक हैं। लेकिन हमारे देश का तो सारा भविष्य ही इन पर टिका हुआ है। सरकार पर दबाव बनाकर झुकाने की अ-लोकतान्त्रिक परम्परा एक बार जो चल पड़ी तो बहुत दूर तक जाएगी।
इसलिए अपने भीतर की गुंडियों / कमीनियों को पहचानिये। उन्हें अलग कीजिये। उनको नकारिये।
बस इतना ही।
बाक़ी आप मुझसे ज़्यादा समझदार हैं क्योंकि आप “भारतीय स्त्रियां” हैं।
(मनमीत सोनी)



