Thursday, October 8, 2026
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AI : रोज करोड़ों लीटर हमारा पीने का पानी खा जाता है एआई

AI: क्या एक दिन हमारे हिस्से का सारा पानी पी जायेगा एआई?

AI और डेटा सेंटर की बढ़ती पानी की खपत: इंटरनेट और AI चलाने में आखिर कितना पानी खर्च होता है?

आज इंटरनेट हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। हम हर दिन मोबाइल से फोटो अपलोड करते हैं, वीडियो देखते हैं, सोशल मीडिया चलाते हैं, ऑनलाइन खरीदारी करते हैं और AI टूल्स की मदद से अपने सवालों के जवाब भी हासिल करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन सभी डिजिटल सेवाओं को चलाने के पीछे कितने बड़े संसाधनों की जरूरत होती है?

शायद यह जानकर आपको हैरानी होगी कि इंटरनेट, क्लाउड सेवाओं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को चलाने वाले बड़े-बड़े डेटा सेंटर को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी की जरूरत पड़ती है। दुनिया में AI का इस्तेमाल जैसे-जैसे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे डेटा सेंटर की संख्या, बिजली की जरूरत और पानी की खपत भी बढ़ रही है।

डेटा सेंटर क्या होता है?

डेटा सेंटर को आसान भाषा में ऐसे समझ सकते हैं जैसे एक बहुत बड़ी इमारत, जिसमें हजारों और कई बार लाखों कंप्यूटर सर्वर लगे होते हैं। यही सर्वर इंटरनेट पर मौजूद वेबसाइटों, फोटो, वीडियो, ऐप्स और दूसरे डिजिटल डेटा को स्टोर और प्रोसेस करते हैं।

जब आप Google पर कुछ सर्च करते हैं, YouTube पर वीडियो देखते हैं, किसी वेबसाइट को खोलते हैं या ChatGPT जैसे AI से कोई सवाल पूछते हैं, तो उसके पीछे डेटा सेंटर के सर्वर काम करते हैं।

ये सर्वर 24 घंटे चलते रहते हैं। लगातार काम करने की वजह से इनके अंदर बहुत अधिक गर्मी पैदा होती है। अगर इस गर्मी को नियंत्रित नहीं किया जाए तो सर्वर खराब हो सकते हैं, काम करना बंद कर सकते हैं और महंगे कंप्यूटर उपकरणों को नुकसान पहुंच सकता है।

इसी वजह से डेटा सेंटर में कूलिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है।

डेटा सेंटर में पानी की जरूरत क्यों पड़ती है?

डेटा सेंटर को ठंडा रखने के लिए अलग-अलग तरह की तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें कुछ सिस्टम सीधे पानी का इस्तेमाल करते हैं।

एक प्रमुख तरीका इवैपोरेटिव कूलिंग है। इसमें पानी की मदद से गर्मी को बाहर निकाला जाता है। इस प्रक्रिया में पानी का एक हिस्सा गर्म होकर भाप में बदल जाता है और वातावरण में चला जाता है।

यही पानी की वह मात्रा है जिसे आमतौर पर वॉटर कंजम्पशन यानी पानी की खपत के रूप में देखा जाता है।

हालांकि हर डेटा सेंटर एक जैसी कूलिंग तकनीक का इस्तेमाल नहीं करता। इसलिए सभी डेटा सेंटर की पानी की खपत भी एक जैसी नहीं होती। किसी सेंटर में पानी की खपत ज्यादा हो सकती है, जबकि दूसरे सेंटर में अपेक्षाकृत कम।

सिर्फ कूलिंग में ही नहीं, बिजली बनाने में भी पानी लगता है

डेटा सेंटर की पानी की खपत की कहानी सिर्फ सर्वर को ठंडा करने तक सीमित नहीं है।

डेटा सेंटर को लगातार चलाने के लिए बहुत बड़ी मात्रा में बिजली की जरूरत होती है। कई जगहों पर यह बिजली ऐसे पावर प्लांट से आती है, जहां बिजली उत्पादन के दौरान भी कूलिंग के लिए पानी का इस्तेमाल किया जाता है।

इसका मतलब है कि डेटा सेंटर से जुड़ी पानी की खपत को दो हिस्सों में देखा जा सकता है।

पहला, डेटा सेंटर के अंदर सर्वर और दूसरे उपकरणों को ठंडा करने में इस्तेमाल होने वाला पानी।

दूसरा, डेटा सेंटर को बिजली उपलब्ध कराने वाली बिजली उत्पादन व्यवस्था में इस्तेमाल होने वाला पानी।

इसलिए किसी डेटा सेंटर के पर्यावरण पर प्रभाव को समझते समय केवल उसके अपने परिसर में इस्तेमाल होने वाले पानी को देखना पर्याप्त नहीं होता।

दुनिया में कितनी पानी की खपत हो सकती है?

डेटा सेंटर और AI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ पानी की खपत को लेकर चिंता भी बढ़ रही है।

कुछ अनुमानों के मुताबिक दुनिया भर के डेटा सेंटर हर साल सैकड़ों अरब लीटर पानी की खपत कर सकते हैं। एक अनुमान में कहा गया है कि वैश्विक डेटा सेंटर की पानी की खपत वर्ष 2030 तक लगभग 644 अरब लीटर सालाना तक पहुंच सकती है।

हालांकि ऐसे आंकड़ों को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि अलग-अलग रिपोर्ट में पानी की खपत का आकलन अलग तरीके से किया जा सकता है। कुछ आंकड़े सीधे डेटा सेंटर में इस्तेमाल होने वाले पानी को गिनते हैं, जबकि कुछ आकलन बिजली उत्पादन जैसी अप्रत्यक्ष पानी की खपत को भी शामिल करते हैं।

फिर भी एक बात स्पष्ट है कि AI और क्लाउड कंप्यूटिंग के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के कारण डेटा सेंटर की पानी और बिजली की जरूरत आने वाले वर्षों में महत्वपूर्ण मुद्दा बनने वाली है।

Google, Amazon और Meta जैसे बड़े टेक कंपनियों पर नजर

दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां अपने डेटा सेंटर नेटवर्क को लगातार बढ़ा रही हैं। Google, Amazon Web Services यानी AWS और Meta जैसी कंपनियों के पास दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बड़े डेटा सेंटर हैं।

Google ने अपनी रिपोर्टिंग में डेटा सेंटर संचालन से जुड़ी अरबों लीटर पानी की खपत की जानकारी दी है। इसी तरह अन्य बड़ी टेक कंपनियां भी डेटा सेंटर की पानी और ऊर्जा जरूरतों को कम करने के लिए नई तकनीकों पर काम कर रही हैं।

यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि डेटा सेंटर अक्सर ऐसे क्षेत्रों में बनाए जाते हैं जहां बिजली, जमीन और इंटरनेट कनेक्टिविटी आसानी से उपलब्ध हो। लेकिन अगर ऐसे क्षेत्र में पानी की कमी पहले से मौजूद है, तो बड़े डेटा सेंटर स्थानीय जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मुद्दा?

भारत में डिजिटल सेवाओं, क्लाउड कंप्यूटिंग और AI का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। इसके साथ ही देश में नए डेटा सेंटर बनाने की योजनाएं भी बढ़ रही हैं।

भारत जैसे देश के लिए डेटा सेंटर की पानी की जरूरत एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय मुद्दा बन सकती है, खासकर उन इलाकों में जहां पहले से ही पानी की कमी या भूजल स्तर में गिरावट की समस्या है।

इसलिए आने वाले समय में डेटा सेंटर बनाने से पहले केवल बिजली और इंटरनेट की उपलब्धता ही नहीं, बल्कि पानी की उपलब्धता और स्थानीय पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को भी ध्यान में रखना जरूरी होगा।

क्या इसका कोई समाधान है?

टेक कंपनियां पानी की खपत कम करने के लिए कई नई तकनीकों पर काम कर रही हैं।

एक तरीका एयर कूलिंग है, जिसमें सर्वर को ठंडा करने के लिए पानी की जगह मुख्य रूप से हवा का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि इसकी प्रभावशीलता मौसम और डेटा सेंटर के डिजाइन पर निर्भर करती है।

दूसरा महत्वपूर्ण तरीका क्लोज्ड-लूप लिक्विड कूलिंग है। इसमें कूलिंग सिस्टम में मौजूद तरल को बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे पानी की बर्बादी को कम करने में मदद मिलती है।

इसके अलावा कुछ कंपनियां डेटा सेंटर को ठंडे इलाकों में बनाने पर भी विचार कर रही हैं। ठंडे मौसम का फायदा उठाकर प्राकृतिक रूप से कूलिंग की जरूरत को कम किया जा सकता है।

भविष्य में समुद्र के पानी, पुनर्चक्रित पानी और दूसरी वैकल्पिक कूलिंग तकनीकों के इस्तेमाल पर भी काम बढ़ सकता है।

AI के दौर में पानी भी बन रहा है महत्वपूर्ण संसाधन

AI को लेकर दुनिया में चर्चा आमतौर पर बिजली, चिप्स और कंप्यूटिंग क्षमता के आसपास होती है। लेकिन अब पानी भी AI और डेटा सेंटर की बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है।

AI मॉडल को प्रशिक्षित करने और उन्हें चलाने के लिए बड़ी कंप्यूटिंग क्षमता चाहिए। इसके लिए बड़ी संख्या में शक्तिशाली सर्वर और डेटा सेंटर की जरूरत होती है। इन सर्वरों को लगातार ठंडा रखना जरूरी है।

इसलिए आने वाले वर्षों में AI की सफलता केवल तेज कंप्यूटर और ज्यादा चिप्स पर निर्भर नहीं करेगी। यह भी महत्वपूर्ण होगा कि टेक कंपनियां कम बिजली और कम पानी में ज्यादा कंप्यूटिंग कैसे कर सकती हैं।

कुल मिला कर देखें तो

इंटरनेट और AI का इस्तेमाल हमारे लिए भले ही केवल मोबाइल या कंप्यूटर स्क्रीन पर दिखाई देता हो, लेकिन इसके पीछे विशाल डेटा सेंटर और हजारों-लाखों सर्वर लगातार काम करते हैं। इन सर्वरों को चलाने के लिए बिजली के साथ-साथ कूलिंग की भी जरूरत होती है और कुछ कूलिंग सिस्टम में बड़ी मात्रा में पानी इस्तेमाल होता है।

AI और डिजिटल सेवाओं का विस्तार आने वाले वर्षों में जारी रहने वाला है। ऐसे में टेक्नोलॉजी के विकास के साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा कि डेटा सेंटर पानी और ऊर्जा जैसे प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल ज्यादा जिम्मेदारी से करें।

यानी भविष्य की डिजिटल दुनिया में सवाल केवल यह नहीं होगा कि AI कितना स्मार्ट है, बल्कि यह भी होगा कि AI को चलाने के लिए कितने प्राकृतिक संसाधनों की जरूरत पड़ रही है और उन्हें कितना बचाया जा सकता है।

(अर्चना शैरी)

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