Lookism: क्या बदसूरती के आधार पर होने वाले भेदभाव के खिलाफ हम लड़ाई लड़ सकते हैं – यदि हाँ, तो हमें कैसे लड़नी होगी ये लड़ाई ?
दिखने में कम आकर्षक लोगों के साथ होने वाला भेदभाव दुनिया भर में आम है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि समाज इसे लगभग सामान्य मान चुका है।
अमेरिका की एक प्रसिद्ध पत्रिका के हर सप्ताह प्रकाशित होने वाले कॉलम “ओपन क्वेश्चन्स” में अमेरिकी लेखक इंसान होने के मायने और उससे जुड़े बड़े सवालों पर विचार करते हैं।
साल 2007 में ब्रिटेन की दार्शनिक मिरांडा फ्रिकर ने Epistemic Injustice: Power and the Ethics of Knowing नाम की एक किताब प्रकाशित की। दर्शनशास्त्र की दुनिया में यह किताब बेहद चर्चित हुई। इसकी वजह यह थी कि इसने ऐसी समस्या को शब्द दिए, जिसे लोग महसूस तो करते थे लेकिन ठीक से व्यक्त नहीं कर पाते थे।
ये दुनिया के लिये नई किसम की समस्या है
कल्पना कीजिए कि आपने अपनी आंखों के सामने कोई अपराध होते देखा है। आप पुलिस के पास जाते हैं, लेकिन पुलिस केवल आपकी त्वचा के रंग की वजह से आपकी गवाही पर भरोसा ही नहीं करती।
या फिर सोचिए कि कोई ताकतवर व्यक्ति आपको लगातार प्रताड़ित कर रहा है। आपको तकलीफ हो रही है, लेकिन आपके पास ऐसे शब्द ही नहीं हैं जिनसे आप दूसरों को समझा सकें कि आपके साथ गलत क्या हो रहा है। यहां तक कि आप खुद भी अपनी स्थिति को पूरी तरह समझ नहीं पाते।
फ्रिकर ने इसका उदाहरण अमेरिकी टीवी सीरियल “मैड मेन” की महिलाओं से दिया। उस दौर में वे अपने वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा यौन उत्पीड़न का शिकार हो रही थीं, लेकिन उस समय “सेक्सुअल हैरेसमेंट” जैसा शब्द ही आम प्रचलन में नहीं था। इसलिए वे अपनी पीड़ा को सही नाम नहीं दे पाती थीं।
दशायें अलग कारण एक
पहली नजर में ये दोनों परिस्थितियां अलग-अलग लगती हैं, लेकिन फ्रिकर का कहना था कि दोनों का मूल कारण एक ही है – ज्ञान और उसे समझने की क्षमता।
पहले मामले में आपके पास सच है, लेकिन कोई आपकी बात सुनना नहीं चाहता। दूसरे मामले में आपके पास अपनी ही जिंदगी में हो रही घटनाओं को समझने और उन्हें शब्द देने की क्षमता सीमित है।
दोनों ही स्थितियों में व्यक्ति एक तरह के “ज्ञान संबंधी अन्याय” (Epistemic Injustice) का शिकार होता है। इसका मतलब है कि या तो वह अपनी बात ठीक से दूसरों तक नहीं पहुंचा पाता, या फिर दूसरे लोग उसकी बात सुनने को तैयार नहीं होते, या वह खुद अपनी परिस्थितियों को पूरी तरह समझ नहीं पाता।
मिरांडा फ्रिकर की किताब आने के बाद से समाज में भेदभाव और पूर्वाग्रह को समझने का तरीका भी काफी बदल गया है।
अब उन कई तरह की मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक तकलीफों को नाम मिलने लगे हैं, जिन्हें पहले पहचानना मुश्किल था। जब किसी समस्या का नाम होता है, तो उसे समझना और उसके खिलाफ आवाज उठाना भी आसान हो जाता है।
क्या है गैसलाइटिंग?
आज हम “मैनस्प्लेनिंग”, “माइक्रोएग्रेसन” और “गैसलाइटिंग” जैसे शब्द आसानी से इस्तेमाल करते हैं। इसी तरह कई ऐसे लोग, जिन्हें पहले लगता था कि उनकी समस्याएं सिर्फ उनकी व्यक्तिगत परेशानियां हैं, अब एक-दूसरे से जुड़ने लगे हैं।
उदाहरण के लिए, न्यूरोडाइवर्जेंट लोग या ऐसे मरीज जिनकी बीमारी को लेकर डॉक्टरों के बीच भी मतभेद रहता है, उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है। अब वे एक-दूसरे के अनुभव साझा करते हैं और सामूहिक रूप से अपनी बात रखते हैं।
कई बार किसी समस्या का नाम मिल जाना किसी व्यक्ति की पूरी जिंदगी बदल देता है। जब कोई नया सामाजिक समूह अपनी पहचान के साथ सामने आता है, तो समाज की सोच भी बदलने लगती है।
कॉन्सेप्ट क्रीप है ये
लेकिन फ्रिकर के विचारों से प्रेरित यह बदलाव पूरी तरह जोखिम से खाली भी नहीं है। मनोवैज्ञानिक निक हैसलम ने इसे “कॉन्सेप्ट क्रीप” (Concept Creep) कहा है।
उनका मतलब है कि समय के साथ हम “हानि” या “अन्याय” जैसी अवधारणाओं का दायरा लगातार बढ़ाते जाते हैं।
हो सकता है कि कुछ नए शब्द लोगों को अपनी तकलीफ समझने में मदद करें, लेकिन जरूरी नहीं कि वे हमेशा वास्तविकता को पूरी तरह सही तरीके से बयान भी करें।
उदाहरण के लिए, जिन मरीजों की बीमारी को लेकर डॉक्टरों की अलग-अलग राय होती है, जरूरी नहीं कि वे सभी एक जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हों।
ए लेटर टु माई डॉटर
इसी तरह कोई नई सामाजिक पहचान कुछ लोगों को ताकत देती है, लेकिन वही पहचान कई बार ऐसे नए बोझ भी पैदा कर देती है, जिनसे छुटकारा पाना आसान नहीं होता। पत्रकार स्टेफनी फेयरींगटन अपनी नई किताब “Ugly: A Letter to My Daughter” में लिखती हैं-
“आज तक मैंने कभी किसी से यह स्वीकार नहीं किया था कि मुझे लगता है मैं बदसूरत हूं।” वे बताती हैं कि बचपन से ही उन्हें हमेशा लगता रहा कि वे आकर्षक नहीं हैं।
लेकिन यह बात कह पाना भी उनके लिए बेहद कठिन था। वे लिखती हैं कि “मेरे लिए ‘मैं बदसूरत हूं’ कहना तो दूर, यह कहना भी मुश्किल था कि लोग मुझे बदसूरत समझते हैं।”
जब कभी उन्होंने किसी तरह अपनी यह भावना व्यक्त करने की कोशिश की, जैसे यह कहना कि “मेरी खूबसूरती मेरी सबसे बड़ी ताकत नहीं है”, तो सामने वाले लोग तुरंत उन्हें दिलासा देने लगते।
वास्तव में विश्वास नहीं होता
वे कहते, “अरे नहीं, तुम तो बिल्कुल अच्छी दिखती हो।” लेकिन फेयरींगटन को हमेशा यकीन रहा कि यह सच नहीं है।
उनका मानना है कि उनकी शक्ल-सूरत ने उनकी पूरी जिंदगी को प्रभावित किया। वे अपने बचपन की एक घटना याद करती हैं।
साल 1986 की एक धूप भरी दोपहर थी। वे सड़क पर खड़ी थीं। तभी उनकी एक दोस्त की मां मिनीवैन में बैठी हुई वहां से गुजरीं। उन्होंने खिड़की से बाहर झांकते हुए हैरानी से कहा,
“क्या यही क्रिसी की बेटी है?” फेयरींगटन बताती हैं कि उनकी मां और उनके भाई दोनों बेहद आकर्षक थे।
वे लिखती हैं -“उनके होंठ भरे हुए थे, जबकि मेरे होंठ बहुत पतले थे। उनके नाक की बनावट सुंदर और तीखी थी, जबकि मेरी नाक गोल, लाल और उभरी हुई थी।”
लेकिन केवल चेहरा ही वजह नहीं होता
वे आगे लिखती हैं – “मेरे कम आकर्षक दिखने की एक वजह यह भी थी कि मेरी समलैंगिक पहचान लोगों को आसानी से दिखाई देती थी।”
यानी उनके व्यक्तित्व और पहचान के कुछ पहलू भी लोगों की नजर में उन्हें अलग और कम स्वीकार्य बनाते थे।
अब सवाल ये है कि असली “लुकिज़्म” आखिर है क्या ? क्या सुंदरता के आधार पर होने वाला भेदभाव भी नस्ल और लिंग आधारित भेदभाव जितना गंभीर है? और वैज्ञानिक शोध इस बारे में क्या कहते हैं?
स्टेफनी फेयरींगटन अपनी किताब में दार्शनिक थॉमस जे. स्पीगल का भी जिक्र करती हैं। स्पीगल ने वर्ष 2022 में प्रकाशित अपने एक शोधपत्र में तर्क दिया था कि “लुकिज़्म” (Lookism) यानी किसी व्यक्ति के कम आकर्षक दिखने के आधार पर उसके साथ भेदभाव करना केवल सामाजिक अन्याय ही नहीं है, बल्कि यह “ज्ञान संबंधी अन्याय” (Epistemic Injustice) का भी एक रूप है।
दरअसल, इस बात पर अब लगभग कोई विवाद नहीं है कि लुकिज़्म वास्तव में मौजूद है।
कई शोध यह साबित कर चुके हैं कि जो लोग देखने में अधिक आकर्षक माने जाते हैं, उन्हें जीवन के लगभग हर क्षेत्र में फायदा मिलता है।
ऐसे लोगों के लिए अच्छी नौकरी पाना अपेक्षाकृत आसान होता है। उनकी आय भी अक्सर दूसरों की तुलना में अधिक होती है।
उन्हें जीवनसाथी या प्रेम संबंध बनाने में भी ज्यादा सफलता मिलती है। यहां तक कि अदालतों में भी उनके साथ अपेक्षाकृत नरमी बरती जाती है।
इसके बिल्कुल उलट, जिन लोगों को समाज कम आकर्षक मानता है, उनके साथ अक्सर अधिक कठोर व्यवहार किया जाता है।
लोग उन्हें कम सक्षम समझते हैं
उनके काम को कमतर आंका जाता है। कई बार उनके साथ बिना किसी वजह के रूखा या अपमानजनक व्यवहार किया जाता है। यानी केवल चेहरे या बाहरी रूप की वजह से किसी व्यक्ति की पूरी छवि बना ली जाती है।
इसके बावजूद, स्पीगल का कहना है कि “बदसूरती” पर खुलकर बात करना आज भी लगभग एक वर्जित विषय है।
समाज इस विषय से बचने की कोशिश करता है
यही कारण है कि लोग इस बात पर गंभीरता से विचार ही नहीं करते कि बाहरी रूप के आधार पर होने वाला भेदभाव किसी व्यक्ति के जीवन पर कितना गहरा असर डाल सकता है।
स्पीगल लिखते हैं कि नस्ल या लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव के बारे में समाज में काफी जागरूकता है। लेकिन लुकिज़्म को लेकर वैसी जागरूकता कभी विकसित ही नहीं हो सकी।
इसके पीछे एक बड़ी वजह यह है कि किसी व्यक्ति को “बदसूरत” कहकर पहचानना अपने आप में बेहद असहज करने वाला अनुभव है। लोग इस शब्द का इस्तेमाल करने से भी बचते हैं।
और शायद इसी कारण इस समस्या पर खुलकर चर्चा भी नहीं हो पाती।
असल में “बदसूरत” शब्द अपने आप में बहुत कठोर है।
अगर कोई व्यक्ति खुद को यह कहे, तो उसे भीतर तक चोट पहुंचती है। और यदि यही शब्द किसी दूसरे व्यक्ति के लिए इस्तेमाल किया जाए, तो वह बेहद क्रूर महसूस हो सकता है।
लेकिन मुश्किल केवल इतनी नहीं है। स्टेफनी फेयरींगटन अपनी किताब में बताती हैं कि सुंदरता और बदसूरती केवल देखने भर की चीजें नहीं हैं।
इनका संबंध संस्कृति से भी है
जीवविज्ञान से भी। व्यक्ति की निजी पसंद से भी।
समाज की सामूहिक सोच से भी। राजनीति से भी।
व्यापार और बाजार से भी। इतिहास से भी।
यानी किसी को सुंदर या बदसूरत मानना केवल चेहरे का मामला नहीं है। इसके पीछे समाज की पूरी सोच और लंबे समय से बनी धारणाएं काम करती हैं।
शायद यही वजह है कि दुनिया में “कम आकर्षक लोगों का राष्ट्रीय संगठन” जैसी कोई संस्था नहीं है कोई ऐसा बड़ा अभियान नहीं चलता, जिसमें लोगों को कार्यस्थलों पर लुकिज़्म के खिलाफ प्रशिक्षण दिया जाए।
कंपनियों के मानव संसाधन (एचआर) विभाग आम तौर पर कर्मचारियों को यह नहीं सिखाते कि बाहरी रूप के आधार पर होने वाले भेदभाव से कैसे बचा जाए।
स्कूलों में भी बच्चों को यह नहीं पढ़ाया जाता कि केवल सुंदरता की तारीफ करना और उसके उलट दिखने वाले लोगों को कमतर समझना कितना नुकसानदायक हो सकता है।
नहीं होती खुल कर बात
संभव है कि समाज अभी इस विषय पर खुलकर बात करने के लिए तैयार न हो। लेकिन इसका परिणाम यह होता है कि लुकिज़्म को अक्सर कोई नाम ही नहीं मिलता।
जब किसी समस्या का नाम नहीं होता, तो उसके खिलाफ लड़ाई भी मुश्किल हो जाती है। तो सवाल यह है कि आखिर हम इस समस्या का सामना सीधे-सीधे कैसे करें?
जो अच्छा लगता है, हम देखते हैं
प्रसिद्ध विज्ञान कथा लेखक टेड चियांग ने अपनी चर्चित लघुकथा “Liking What You See: A Documentary” में इस समस्या का एक बेहद दिलचस्प समाधान कल्पना के रूप में प्रस्तुत किया है।
वे भविष्य की एक ऐसी दुनिया की कल्पना करते हैं, जहां दिमाग में एक छोटा-सा बदलाव करके इंसान के भीतर चेहरे की सुंदरता को महसूस करने की क्षमता को बंद किया जा सकता है।
यह प्रक्रिया आसान भी है और सस्ती भी। कहानी में इस तकनीक का नाम है “कैलियैग्नोसिया” (Calliagnosia)। यह शब्द ग्रीक भाषा के शब्द “कालोस” से बना है, जिसका अर्थ होता है – सुंदरता।
चेहरों के बीच फर्क पहचानना क्या सबके बस की बात नहीं?
कहानी में एक न्यूरोलॉजिस्ट इस प्रक्रिया को समझाते हुए कहता है कि जिसके दिमाग में यह बदलाव किया गया है, वह अब भी चेहरों के बीच अंतर पहचान सकता है।
उसे यह समझ में आता है कि किस व्यक्ति की ठोड़ी नुकीली है और किसकी पीछे की ओर झुकी हुई। वह यह भी पहचान सकता है कि किसकी नाक सीधी है और किसकी टेढ़ी।
किसकी त्वचा साफ है और किसके चेहरे पर दाग-धब्बे हैं। यानी उसकी देखने की क्षमता बिल्कुल सामान्य रहती है।
लेकिन इन सभी अंतरों को देखकर उसके मन में सुंदर या बदसूरत होने की कोई सौंदर्यात्मक प्रतिक्रिया पैदा नहीं होती। वह किसी चेहरे को देखकर आकर्षित या अप्रभावित नहीं होता।
टामेरा ने बताया – करके दिखाया
इस कहानी की मुख्य पात्र एक कॉलेज छात्रा है, जिसका नाम टामेरा है। जब वह छोटी थी, तभी उसके माता-पिता ने उसके दिमाग में यह प्रक्रिया करवा दी थी।
वे प्रगतिशील विचारों वाले लोग थे और उनका मानना था कि समाज में लुकिज़्म नहीं होना चाहिए। इसी कारण उन्होंने अपनी बेटी को बचपन से ही चेहरे की सुंदरता के प्रभाव से मुक्त रखने का फैसला किया।
टामेरा जब आईने में खुद को देखती है, तो उसे बिल्कुल अंदाजा नहीं होता कि वह सुंदर है या नहीं। वह केवल अपना चेहरा देखती है, लेकिन उसके बारे में कोई सौंदर्यात्मक निर्णय नहीं बना पाती।
उसे पहली बार तब पता चलता है कि लोग उसे आकर्षक मानते हैं, जब कोई दूसरा व्यक्ति उसके और उसके पूर्व प्रेमी की तस्वीर देखकर कहता है कि “वह लड़का तुम्हारे लायक ही नहीं था।”
यानी दूसरों की नजर में टामेरा उससे कहीं ज्यादा आकर्षक थी। लेकिन खुद उसे इस बात का कभी एहसास ही नहीं हुआ।
(अर्चना शेरी)



