Vinod Kambli: ये नाम है एक ऐसे क्रिकेट स्टार का जो सुपरस्टार सचिन तेन्दुलकर के साथ उभरा था और लगता था शायद सचिन से भी अधिक प्रतिभाशाली है विनोद..
चौदह पारियों में हजार टेस्ट रन। और चौदह बार रिहैब।
दोनों गिनतियां एक ही आदमी की हैं।
पहली अखबारों में छपी थी। दूसरी उसने खुद कबूल की।
पिछले हफ्ते ठाणे से उसका एक वीडियो आया। कैमरे की तरफ देखकर वो अपना नाम बताता है, और बोलते-बोलते जुबान अटक जाती है। फिर धीरे-धीरे कहता है, यहां बहुत प्यार मिला है, साफ-सफाई एकदम फर्स्ट क्लास है, कहीं से नहीं लगता कि घर पर नहीं हूं।
फिर खुद से ही पूछता है… और मैं हूं कहां?
और खुद ही जवाब देता है। निदान में।
वीडियो फैला, तो बातें भी फैलीं। किसी ने लिखा, सचिन का दोस्त वृद्धाश्रम में पड़ा है। किसी ने लिख दिया कि परिवार ने छोड़ दिया।
इस आखिरी बात का कोई सबूत मुझे कहीं नहीं मिला। जो मिला, वो इसका उल्टा था। वो आगे बताऊंगा।
नाम – विनोद कांबली।
उस जगह का नाम एक बार फिर सुनिये – निदान।
हमारे यहां ये वैद्य का शब्द है। बीमारी की जड़ पहचानने को निदान कहते हैं। दवा बाद में आती है, पहले पहचान आती है।
इस आदमी की पूरी कहानी, मुझे लगता है, इसी एक शब्द के इर्द-गिर्द घूमती है।
अब शुरू से शुरू करते हैं।
मुंबई का कांजुरमार्ग। एक चाल। पिता गणपत कांबली मैकेनिक थे, और पूरा घर उसी एक कमाई पर टिका था। बेटा क्रिकेट का किट उठाकर भीड़ से ठसाठस भरी लोकल में शिवाजी पार्क जाता था, जहां रमाकांत आचरेकर सिखाते थे। उसी मैदान पर एक और लड़का था। नाम सचिन।
1988 में स्कूल के एक मैच में दोनों ने मिलकर छह सौ चौंसठ रन जोड़ दिए, और दोनों में से कोई आउट नहीं हुआ। दुनिया ने पहली बार दोनों का नाम एक साथ पढ़ा। और उस दिन ज्यादा रन सचिन के नहीं, विनोद के थे।
फिर वो दौर आया, जब ये लड़का जहां जाता, रिकॉर्ड पीछे-पीछे चलते। इक्कीसवें जन्मदिन पर वनडे शतक। इक्कीस की उम्र में लगातार दो टेस्ट में दोहरे शतक। हजार टेस्ट रन तक पहुंचने वाला सबसे तेज भारतीय, जो आज भी है।

वानखेड़े पर जब दोहरा शतक लगा, तो इंग्लैंड के ग्राहम गूच और माइक गैटिंग खुद पास आए और पीठ थपथपाई। वही लोग, जिन्हें वो बचपन से देखता आया था। बाद में उसने बताया था, रीढ़ में सिहरन दौड़ गई थी।
एक चाल का लड़का, और दुनिया उसकी पीठ थपथपा रही थी।
पर ऊंचाई जितनी जल्दी मिली, उतनी ही जल्दी हाथ से फिसली भी।
तेईस साल की उम्र में उसने अपना आखिरी टेस्ट खेल लिया।
और फिर 13 मार्च 1996 आया। कोलकाता का ईडन गार्डन्स, वर्ल्ड कप का सेमीफाइनल। भारत हार की तरफ जा रहा था, भीड़ बेकाबू हुई, स्टैंड में आग लगी, और मैच वहीं रोक दिया गया। दस रन पर नाबाद विनोद कांबली रोते हुए मैदान से बाहर निकले। वो तस्वीर पूरे देश के मन में बैठ गई।
मैं इसी शहर में रहता हूं। अक्सर ईडन ने सामने से गुजरता हूं। जो कई खिलाड़ियों के बेहतरीन खेल रिकॉर्ड का गवाह है। कांबली का भी। चौबीस साल का एक लड़का, जो आउट नहीं हुआ था, फिर भी हारकर लौट रहा था।
इसके बाद टीम में आना-जाना चलता रहा। अट्ठाईस की उम्र में भारत की जर्सी हमेशा के लिए उतर गई।
अब यहां एक बात समझनी जरूरी है।
खेल मनोविज्ञान पर हुए अध्ययन बताते हैं कि जिस खिलाड़ी ने बचपन से अपनी पूरी पहचान सिर्फ खेल से बनाई हो, मैदान छूटते ही वो अक्सर खुद से पूछने लगता है, अब मैं कौन हूं। ऊपर से वो लोग भी धीरे-धीरे दूर हो जाते हैं, जो ड्रेसिंग रूम में रोज साथ होते थे। खालीपन और गहरा हो जाता है।
विनोद के साथ भी शायद यही हुआ। ये मेरी पढ़ाई है, उनका कहा हुआ नहीं। पर 2009 का साल देखिए। उसी एक साल में उसने फिल्म की, बिग बॉस में गया, टीवी पर अपने मन का गुस्सा निकाला, और विधानसभा चुनाव भी लड़ा, हार गया।
एक आदमी हर दरवाजा खटखटा रहा था, उस मैदान की तलाश में जो पीछे छूट गया था।
उसी साल एक टीवी शो पर उसने कह दिया कि सचिन चाहते तो थोड़ी और मदद कर सकते थे। बचपन की वो दोस्ती बरसों के लिए दूर हो गई।
फिर नवंबर 2013 में सचिन ने वानखेड़े पर आखिरी टेस्ट खेला और विदाई की स्पीच दी। उस स्पीच में विनोद का नाम नहीं था। बाद में विनोद ने कहा, काश वो हमारी साझेदारी का जिक्र कर देते। और ये भी कहा, जब उनकी आंखों में आंसू आए, तो मैं भी खुद को रोक नहीं पाया।
रूठा हुआ था, फिर भी दोस्त के आंसू पर रो रहा था।
उसी महीने के आखिर में विनोद को दिल का दौरा पड़ा। लीलावती में दो ऑपरेशन हुए। बरसों बाद उसने खुद बताया, दोनों का खर्च सचिन ने उठाया था।
2017 में दोनों फिर गले मिले। और 2024 में विनोद ने वो बात कही, जो मन की सेहत की सबसे सच्ची बात है। कहा, उस वक्त मैं बहुत फ्रस्ट्रेटेड था, इसलिए लगा कि सचिन ने मदद नहीं की। सच ये है कि उसने मेरे लिए सब किया।
जो मन भीतर से टूट रहा होता है, वो अक्सर सबसे करीब खड़े इंसान पर ही बरसता है।
इसी टूटे मन के साथ एक और चीज चलती रही। शराब।
कब शुरू हुई, इसकी कोई पक्की तारीख मुझे नहीं मिली, और अंदाजे से मैं नहीं लिखूंगा। जो दर्ज है, वो उसका अपना कबूलनामा है। चौदह बार रिहैब गया।
अब वो बात, जो ऊपर अधूरी छोड़ी थी। परिवार ने छोड़ दिया?
उनकी पत्नी एंड्रिया ने पिछले साल एक बातचीत में खुद बताया था कि 2023 में उन्होंने तलाक की अर्जी दी थी। फिर वापस ले ली। कहा, लगा कि मैं चली गई तो वो बेसहारा हो जाएगा, वो बच्चे जैसा है। कई बार घर से निकल भी जातीं, फिर मन में सवाल उठता, खाना खाया होगा? ठीक तो होगा? लौटकर देखतीं, तो लगता कि उसे उनकी जरूरत है।
एक औरत, जो जाने के लिए दरवाजे तक गई, और एक छोटे-से सवाल की फिक्र में लौट आई… खाना खाया होगा?
दिसंबर 2024। शिवाजी पार्क में आचरेकर सर का स्मारक खुल रहा था। वही मैदान, जहां कभी वो बच्चा लोकल से उतरकर किट लिए पहुंचता था। सचिन उसके पास आए। विनोद उठ नहीं पाए। बैठे-बैठे दोस्त का हाथ पकड़ा, और देर तक पकड़े रहे। फिर उसी मंच से अपने गुरु की याद में एक पुराना गाना गाया, और सचिन ने ताली बजाई।
उन्हीं दिनों एक इंटरव्यू में उसने कहा, रिहैब दोबारा जाने में मुझे कोई झिझक नहीं। जब तक परिवार साथ है, किसी चीज से डर नहीं लगता। पूरा करूंगा, और लौटकर आऊंगा।
कपिल देव की तरफ से भी मदद की पेशकश आई थी, इलाज कितना भी लंबा चले। बस एक शर्त थी। रिहैब का पहला कदम उसे खुद रखना होगा।
और यही लत के इलाज का सबसे बड़ा सच है। दरवाजा कोई भी खोल सकता है, अंदर पैर खुद रखना पड़ता है।
कुछ दिन बाद तबीयत बिगड़ी। ठाणे के अस्पताल में भर्ती हुए, दिमाग में खून के थक्के मिले। बिस्तर पर लेटे-लेटे उसने कैमरे पर कहा, यहां के डॉक्टर की वजह से जिंदा हूं, वो जो कहेंगे वही करूंगा।
और नए साल के पहले दिन, अस्पताल से निकलते वक्त, भारत की जर्सी पहनकर उसने लोगों से एक ही बात कही। शराब और नशे से दूर रहिए, ये जिंदगी बर्बाद कर देते हैं।
जो आदमी खुद इस लत से चौदह बार लड़ चुका हो, वो कैमरों के सामने खड़ा होकर दूसरों को उसी से बचने को कह रहा था। इसमें शर्म नहीं थी, कबूल था।
और कबूल ही तो निदान है। बीमारी का नाम लेना, इलाज की पहली सीढ़ी।
हमारे घरों में नशे की लत को आदत कहा जाता है, जिद कहा जाता है, कमजोरी कहा जाता है। डॉक्टर इसे दिमाग की एक लंबी बीमारी मानते हैं, जिसका इलाज होता है।
और एक बात, जो हर उस घर को पता होनी चाहिए जहां कोई बार-बार फिसलता है। अमेरिका का नशा-शोध संस्थान NIDA साफ कहता है कि दोबारा फिसल जाने का मतलब ये नहीं कि इलाज बेकार गया। जैसे ब्लड प्रेशर या अस्थमा का मरीज फिर बिगड़ जाए, तो इलाज दोबारा शुरू होता है, छोड़ा नहीं जाता।
अपने देश का हाल भी सुन लीजिए। एम्स की 2019 की सरकारी रिपोर्ट कहती है कि भारत में करीब पौने छह करोड़ लोग शराब की नुकसानदेह लत या निर्भरता में हैं। और इनमें से अड़तीस में से सिर्फ एक को कोई इलाज मिल पाता है।
बाकी सैंतीस कहां हैं?
हमारे घरों में। हमारे मोहल्लों में। उस चुप्पी में, जहां बीमारी का नाम लेना भी शर्म की बात मानी जाती है।
विनोद की कहानी में वो चुप्पी टूटी हुई है। पिछले साल उनके छोटे भाई वीरेंद्र ने लोगों से खुलकर कहा, विनोद घर पर हैं, इलाज चल रहा है, बोलने में दिक्कत है, उनके लिए दुआ कीजिए, उन्हें आपके प्यार की जरूरत है। उसी भाई ने बताया कि सचिन बराबर फोन करके हाल पूछते हैं, एंड्रिया से बात करते हैं।
सुनील गावस्कर की संस्था ने हर महीने मदद बांध दी।
और ठाणे के जिस निदान सेंटर को लोग वृद्धाश्रम कहकर अफसोस जता रहे थे, उसके संस्थापक महेश नाइक ने बताया कि विनोद को वहां उसी अस्पताल ने भेजा था, जहां उनका इलाज हुआ। जब वो आए, तो ठीक से खड़े भी नहीं हो पाते थे। फिजियोथेरेपी चली, और असर अच्छा हुआ। नाइक कहते हैं, कांबली हमारे हीरो हैं, जब तक चाहें बिना एक पैसा दिए रह सकते हैं।
तो जिसे लोग छोड़ा हुआ आदमी कह रहे थे, उसके पीछे एक पत्नी खड़ी है, एक भाई खड़ा है, एक दोस्त खड़ा है, और अजनबियों की एक पूरी टीम खड़ी है।
इसी साल अप्रैल में वो एक विज्ञापन में कैमरे के सामने लौटे। एंड्रिया ने कहा, विनोद धीरे-धीरे पक्के कदमों से ठीक हो रहे हैं, और इस काम ने उनका हौसला बढ़ाया है। मई में वो वानखेड़े पहुंचे, वही मैदान जहां इक्कीस की उम्र में दोहरा शतक लगाया था। इस बार दो लोगों के सहारे चलते हुए, पर चेहरे पर मुस्कान थी।
और अब ये नया वीडियो। 27 सितंबर यानी कल ठाणे से खबर आई कि इसमें कांबली ने अपनी सेहत और रिकवरी को लेकर फैंस को भरोसा दिलाया है। वीडियो में उनकी सबसे सादी लाइन यही है… अभी मेरा इलाज चल रहा है।
टेस्ट क्रिकेट में विनोद की पहली पारियां आसमान छूती थीं, और दूसरी पारियां अक्सर जल्दी खत्म हो जाती थीं। आंकड़े यही कहते हैं।
पर जिंदगी की दूसरी पारी वो इस वक्त खेल रहा है। जुबान अटकती है, कदम सहारा मांगते हैं, याददाश्त आंख-मिचौली खेलती है। और फिर भी वो आदमी कैमरे के सामने बैठकर कहता है, इलाज चल रहा है।
यह कहानी एक बिखरे हुए टैलेंट की नहीं है। यह उस आदमी की कहानी है, जो चौदह बार फिसलने के बाद भी कहता है, मुझे ठीक होना है।
आपके आसपास भी कोई होगा, जिसके बारे में सब कह चुके हैं कि ये नहीं सुधरेगा। दो बार गया, तीन बार गया, फिर वहीं लौट आया। घरवाले थकते-थकते गुस्से में बदल जाते हैं। ये थकान भी सच्ची है।
पर मुझे विनोद की कहानी में जो बात जमी, वो ये कि गिनती मायने नहीं रखती। मायने ये रखता है कि अगली बार के लिए दरवाजा खुला है या नहीं, और उस दरवाजे पर कोई एंड्रिया, कोई वीरेंद्र, कोई सचिन खड़ा है या नहीं।
फिसलना हार नहीं है। ठीक होने की चाह छोड़ देना हार है।
यह कहानी उस घर तक पहुंचनी चाहिए, जहां कोई आज फिर हारकर बैठा है, और घरवाले इसे उसकी जिद समझ रहे हैं। वो जिद नहीं, बीमारी है, और उसका इलाज है।
मैं राहुल हूं। इन दिनों रोज मन की सेहत पर एक सच्ची कहानी लिख रहा हूं। किसी बीमार इंसान के बारे में यहां एक भी लाइन अंदाजे से नहीं लिखी जाती, हर बात किसी बयान या खबर से जांची हुई होती है।
किसी लत से लड़कर लौटे आपके किसी अपने ने, उस लड़ाई के बीच, कौन-सी एक बात कही थी जो आज भी आपके साथ है?
(राहुल मिश्रा)



