Zaraa Sochiye by Manmeet Soni: क्या नंगेपन और अश्लीलता का चेहरा दिखाते ये छात्र हमारी नई जेनेरेशन है या पश्चिमी सोशल मीडिया की जिन्दा पैदाइश हैं – ज़रा सोचिये !
राजधानी के जंतर-मंतर पर काकरोचों के इस उत्पात (आंदोलन) में वामपंथियों की ओर से एक बेहद मूर्ख जेन ज़ी को डिफेंड करने के लिए एक “डिफेंस मेकेनिज़्म” बनाया गया। सोशल मीडिया पर कल तक भाषा, सभ्यता और भले साहित्य की क़समें खाने वाले यह दोगले विषपायी कुछ अनोखे तर्क दे रहे हैं। हालांकि वामपंथ तर्कों से अधिक अपने पहले से बनाए हुए निष्कर्ष ही में जीता है, लेकिन जब मुझे इन लाचार लोगों पर बेहद हँसी आने लगी तो मैंने इनके कुछ तर्कों को एक पोस्ट के नीचे इकट्ठा किया और इनका क्रमबद्ध रूप से जवाब देने का निर्णय किया :
पहला तर्क :
1. लाठी मारने वालों के जवाब में गालियां उचित हैं –
नहीं! गालियां कहीं भी उचित नहीं है। मुझे भगत सिंह / चंद्रशेखर आज़ाद / रामप्रसाद बिस्मिल को आदर्श मानने वाले वामपंथी किसी भी भारतीय क्रान्तिकारी की गिरी हुई भाषा का एक भी उदाहरण दे देवें, तो मैं कल से ही लेखन से विमुख हो जाऊँगा।
समस्या यह नहीं है कि आपने गाली दी। समस्या यह है कि आपने शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट के नाम पर एक बेहद उज्जड़ और ख़राब चरित्र वाले लोगों को इकट्ठा किया और उन्हें सत्ता के विरुद्ध खड़ा कर दिया।
मैंने अपने जीवन में आज तक ऐसा विरोध नहीं देखा जो “प्रभावितों” से इतर “अप्रभावितों” ने लड़ा हो।
चलिए ऐसा कीजिये कि आपके उत्पात (आंदोलन नहीं) में शामिल होने वाले नीट परीक्षार्थियों की संख्या के बारे में बताइये। क्या आप सौ नीट परीक्षार्थियों की सूची भारत सरकार को सौम्प सकते हैं? यदि वे नहीं तो उनके माता – पिता / उनके परिजन या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित लोगों के किसी ज्ञापन पर हस्ताक्षर दिखा सकते हैं? क्या आपके पास कोई भी प्रामाणिक डाटा है?
जवाब है : नहीं!
दूसरी बात, यदि पुलिस ने आप पर लाठियाँ चलाई तो यह बात पहले से तय थी। क्या आप ने इसके लिए कोई तैयारी की थी? क्या कोई योजना बनाई थी? आपने उत्पात करने वाली भीड़ को मंच से कोई निर्देश दिया था?
क्या आपने उन्हें कोई तरीका बताया था, जैसे गांधीजी बताते थे? जैसे नेहरू जी और लाला लाजपत राय बताते थे? जैसे मेधा पाटकर बताती थीं?
क्या यह आपके नेतृत्व की बीमार खामी नहीं थी कि आपको पता ही नहीं कि “आंदोलन” यदि हिंसक हो जाता है तो आपके पास दूसरा विकल्प या “प्लान बी” क्या होगा। यदि आप इतने बेवकूफ़ हैं तो फिर आप आंदोलन के नेतृत्वकर्ता क्यों बने? क्यों पड़ी लकड़ी उठाई? क्यों उड़ता तीर लिया?
होना तो यह चाहिए था कि यदि सरकार को नंगा ही करना था तो आप सब चुपचाप वहाँ जाकर बैठ जाते। नेतृत्व करने वाले अपने फॉलोवर्स से कहते कि न हिंसा करनी है / न हिंसा का जवाब देना है / न भाषा के स्तर को गिरने देना है / न मोदीजी के प्रति व्यक्तिगत होना है!
लेकिन वही बात, आप इतने ही समझदार होते तो पूरे भारत में आज की तारीख़ में जगह-जगह क्यों कूटे जा रहे होते / माफ़ी मांग रहे होते / और भगोड़े सौरभ दास और अभिजीत दीपके जैसे नालायकों को क्यों अपना नेता बनाते?
दूसरा तर्क :
2. गाली तो एक “सेफ्टी वाल्व” है?
नहीं! गाली एक “सेफ्टी वाल्व” नहीं है बल्कि “एसकेप रूट” यानी “पलायन का मार्ग” है। जब आप मनुष्य नहीं रह जाते तो आप कुत्ते की तरह भोंकने लगते हैं, बिल्ली की तरह अपने पंजों से कुतरने लगते हैं। म्याऊँ म्याऊँ करने लगते हैं। गधे की तरह रेंकने लगते हैं और बंदर की तरह अपने ही शरीर को जगह जगह से खुजाने लगते हैं। आपने यही सब तो किया।
मेलोनी और मोदी का क्या रिश्ता है? कैन यू एक्सप्लेन प्लीज़?
मोदी और भड़वा और मादर… और चूँ… और लौ… का इस आंदोलन से क्या रिश्ता है? कैन यू एक्सप्लेन प्लीज़?
नो! यू कैन्ट एक्सप्लेन!
यही आपकी समस्या है। आपको लगता है कि आपकी गालीबाज़ पीढ़ी ने भाषायी स्तर पर एक अनोखी बहादुरी दिखाई। जबकि कहना यह चाहिए कि इस मूर्ख पीढ़ी ने यह बताया कि इनके पास “धैर्य” नाम की चीज़ नहीं है और यह जैसे कॉलेज में रहते हैं ठीक वैसे ही संसद मार्ग पर भी चले जाते हैं।
क्या आपका नारा “पांच का सिक्का / दस का नोट / मोदी साला मादर….” के बजाय यह नहीं हो सकता था, “पांच का सिक्का / दस का नोट / मोदी तुझमें कितने खोट?
यह “खोट” शब्द कितना खतरनाक है, क्या आप समझ सकते हैं। इस अकेले “खोट” शब्द से मोदीजी पर चारित्रिक रूप से अधिक अटैक किया जा सकता था। लेकिन एक बेकार और रद्दी उत्पात से और क्या उम्मीद की जा सकती थी? वही हुआ जो सत्ता चाहती थी। अब पूरे भारत में आपकी वीडियोज़ वायरल हैं, लोग थू थू कर रहे हैं और मोदी जी को दिलो जान से प्यार करने वाले ऐसे कमीनों को ढूंढ-ढूंढ कर सार्वजनिक रूप से बेइज़्ज़त कर रहे हैं।
तो साबित हुआ न कि यह “सेफ्टी वाल्व” नहीं था। बल्कि “पलायन का मार्ग” था। अपनी संस्कृति, सभ्यता और संस्कार से पलायन। आपने इस पूरे आंदोलन को अपनी ही ऊंचाई से धक्का दे दिया।
अब भुगतो!
तीसरा तर्क :
3. गालियां इस समाज में हमेशा से रही हैं!
सही! गालियां इस समाज में क्या हर समाज में हमेशा से रही हैं। लेकिन उनकी जगहें, उनके अवसर, उनके कारण और उनके संदर्भ भी तो रहे हैं। यह तो स्वीकार करना ही होगा कि गाली एक व्यक्ति से लेकर समाज या समुदाय तक की चेतना को उठा भी सकती है और गिरा भी सकती है।
एक बेहद जायज़ मांग भी अपने माँगने से तरीके से बेहद नाजायज़ हो सकती है।
आप अपने शराबी पिता से भी यह नहीं कह सकते : भेंचो… कम पिया कर! आपको उन्हें यही कहना होगा : कम पिया करो यार पापा! मम्मी का तो ख़्याल करो।
क्या यही बात सरकार पर लागू नहीं होती।
क्या आप किसी चुने हुए बेहद भ्रष्ट जनप्रतिनिधि को यह कह सकते हैं : तेरी “गां… ” से खींच कर मेरे हक़ में तुझसे तेरी ही लिखी हुई डिज़ायर लूँगा साले!
आपको यही कहना होगा : मैं अभी और लडूंगा भाई / श्रीमान / सर!
यही तो गाली के पीछे का सन्दर्भ है। आप बाथरूम में हस्तमैथुन करते हुए आँगन में नहीं आ सकते। आप पत्नी के साथ निजी क्षण को माँ के साथ नहीं बाँट सकते। एक बेटी अपनी माँ से यह तो कह सकती है : “उनसे वो सब होता ही नहीं माँ”!
लेकिन यह नहीं कह सकती : “नल्ला है साला तेरा दामाद”!
तो क्या आप मोदी को “नल्ला” या “दल्ला” कह सकते हैं?
यदि हाँ – तो मुझे आपसे कुछ नहीं कहना!
चौथा तर्क:
4. यह नई जेनरेशन है! इसकी भाषा वह नहीं जो हमारी थी! हम तो “डरपोक” थे!
ओके! लेकिन आपने अपने लिए डरपोक शब्द का ही प्रयोग क्यों किया? आप अपने लिए “गांडू” “चोदू” “फट्टू” “झान्टू” शब्द का प्रयोग क्यों नहीं किया?
मैं बताता हूँ! आपने इन शब्दों का प्रयोग इसलिए नहीं किया क्योंकि आप जानते हैं कि आपकी बात आपकी फेसबुक पोस्ट के माध्यम से हज़ारों लोगों तक जाएगी या जा सकती है। आपको अपनी “इमेज” की परवाह थी / है। दरअसल इमेज की परवाह ही है जो हमें मनुष्य से बेहतर मनुष्य बनाती है। इस “इमेज” के लिए ही तो हमारे सारे संघर्ष हैं। इस “इमेज” के कारण ही हम थोड़े सभ्य और सुशील हैं। इस “इमेज” के कारण ही एक बेटा अपने बाप के सामने सिगरेट नहीं पीता। इस “इमेज” के कारण ही हनीमून पर जाता हुआ “जोड़ा” थोड़ा सा शर्माता है। और यह शर्माना “बेवकूफी” नहीं कहलाती बल्कि “सभ्यता” कहलाती है।
यदि “इमेज” की परवाह ही नहीं तो सारे पर्दों को नोच फाड़ डालिये। फिर क्यों विवाह के संस्कार हों? फिर केवल “सेक्स” हो। खुला “सेक्स” हो। फिर अंतिम संस्कार में भी रीत रिवाज़ क्यों? आप ठीक किसी के मरते ही आँगन के कोने में या किसी सार्वजनिक स्थान पर, जहाँ कचरा जलाते हैं, किसी मृतक को भी जला दीजिये।
सारा साहित्य, सारी कला, सारा दर्शन केवल मनुष्य की “इमेज” पर ही कुर्बान है मूर्खो!
क्या इतनी सी बात आपको समझ नहीं आती?
आप इस जेन ज़ी को मूर्ख मत बनाइये। केवल एक आंदोलन की सफलता के लिए इसे उस हार के रास्ते मत डालिये जहाँ से यह वापस लौट कर आएं तो इनके पास “जीत” की भी भाषा न हो!
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इन जवाबों के साथ मैं इस छोटे से लेख को कंक्लूड करता हूँ। मुझे पता है, आपमें से बहुत से लोग कंविन्स न होंगे। मत होइए। लेकिन मेरी गारंटी है कि मेरी वाल के नीचे जो कमेंट्स आएँगे, उनमें लाख चाहकर भी आप मुझे माँ-बहन की गालियां न देंगे। और इसका सीधा-सा कारण है कि मैंने आपको ऐसी गालियां नहीं दी हैं।
सभ्यता और शुचिता एक ऐसा शुद्ध दबाव बनाती है कि अच्छे-अच्छे बदतमीज़ों को झुकना पड़ता है। तभी तो भारतीय समाज का आज भी सबसे प्रासंगिक नायक “महात्मा गाँधी” किसी घमंडी के लिए “नंगा फ़क़ीर” था और किसी विश्वख्यात वैज्ञानिक के लिए “हड्डी और माँस का ऐसा ढांचा, जो पृथ्वी पर पहली और अंतिम बार आया”!
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मोदीजी सत्ता में न रहेंगे। बीजेपी चली जाएगी। कांग्रेस आ जाएगी। मैं लेखक न रहूँगा। पुलिस वाले बूढ़े हो जाएंगे। लेकिन यह जेन ज़ी अभी लम्बे समय तक जियेगी। मुझे इस संसार की परवाह है। क्योंकि मैं जानता हूँ कि भाषा की लम्बी उम्र से ही संसार की उम्र लम्बी और शोभनीय होगी।
आप अपने बच्चों को बचाइये श्रीमान!
(लेख के साथ नत्थी की हुई तस्वीर में एक लड़का मोदीजी से जॉब न देने के बजाय “ब्लो जॉब” मांग रहा है।
मैं इस बच्चे के प्रति सहानुभूति व्यक्त करता हूँ। यह एक दुर्भाग्यशाली बच्चा है। इसे पता ही नहीं कि इसकी एक हरकत ने इसे कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया।
इसे “वामपंथिन गालीबाज़” किसी डॉक्टर को दिखाए। और जिसने इस बच्चे की फ़ोटो फेसबुक पर सार्वजनिक करके इसका भविष्य ख़राब किया, उस “फेसबुकिये पप्पू” को इतनी शर्म आए कि वह अफ़सोस के किसी मुहने पर आत्महत्या तक की बात सोचे!
शर्म, जो दुल्हन का हो या न हो, लेकिन सभ्यता का गहना तो होता ही है! )
(मनमीत सोनी)



