Zaraa Socho by Manmeet Soni: जीवन की एक गहरी निराशा की पीड़ा है ये मनमीत सोनी का लेख जो परिवार में भी देखी जा सकती है और संबन्धों में भी..
अब से एक घंटे पहले की बात है। मैं अपने दूसरे घर, जहाँ दादी रहती है, गया था। मेरे एक परिजन, जो मोदी विरोधी हैं, और जो मोदी विरोधी के साथ किसी सीमा तक राष्ट्र विरोधी भी हो गए हैं, वे अपनी चौदह साल की बेटी के साथ जेन ज़ी की वीडियोज़ लोगों को व्हाट्सअप कर रहे थे।
उन दोनों के चेहरे पर अपार हर्ष था। जैसे कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के कारण सरकार ही गिर गई हो। मैं उन दोनों को कुछ कहता,
इससे पहले ही वे परिजन बोल पड़े :
“हम बाप-बेटी आज साले मोदी की ऐसी-तैसी करने में लगे हैं!”
मैं कुछ देर चुप रहा। लेकिन मुझसे ज़्यादा देर चुप नहीं रहा गया।
मैंने मेरी बेटी जैसी छोटी बहन से कहा :
तुझे पता है : “वहाँ क्या नारे लगे?”
उसने कहा : “यही ना कि पीरियड्स में मेरा पैड भी इतना लीक नहीं होता जितना मोदी गवर्नमेंट में पेपर लीक होते हैं…”
मैंने शर्म से गर्दन झुका ली। मैं आगे बोल नहीं पाया। कुछ सम्भला और परिजन से कहा :
“आपने तो सभ्यता खो दी। लेकिन इस बच्ची के बारे में सोचिये। इसकी भाषा देखिये। इसे पता ही नहीं कि यह क्या बोल रही है!”
मेरे वे परिजन उखड़ गए।
बोले : “मैं तो इसे आज दिल्ली ले कर जा रहा था। साथ में बेटे को भी। और कुछ दोस्तों को भी। लेकिन उस हरामज़ादे ने इस्तीफा दे दिया!”
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मैं कमरे से बाहर आ गया। दादी के पास चला गया। वे टेलीविज़न पर कौशिक जी महाराज को सुन रही थी। कुछ देर इधर उधर की बातें करके घर लौट आया।
कोई अतिश्योक्ति नहीं कि इस समय मेरे होंठ फड़फड़ा रहे हैं और आँखों में हल्की-सी लाल नमी है। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि “मा……..द” और “लीक होते हुए सैनिट्री पैड” की भाषा से उस बच्ची को बाहर कैसे निकालूंगा? – जबकि जब से कुछ लिख रहा हूँ, मैंने काग़ज़ पर भाषा को साधने का ही प्रयास किया है। क्योंकि भाषा ने ही मुझे मेरा अस्तित्व और आकार दिया है!
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मुझे इस बात का दुःख नहीं कि उस बच्ची के लिए कुछ भी गुप्त नहीं रहा। मुझे दुःख इस बात का है कि “मा…..द” शब्द सुनते ही उसके मुँह पर एक हल्की-सी शिकन आ जानी चाहिए थी, वह क्यों नहीं आई। जबकि अपने से बड़ों की उपस्थिति में मुझे आज तक यह भय रहता है कि मैं उनके सामने कोई अपशब्द न बोल दूँ।
दुःख इस बात का है कि जिस घर में मैंने केवल आत्मा, चेतना और भाषा के विकास के लिए गीता प्रेस के मोटे मोटे ग्रंथ : जैसे – गीता, श्रीमदभागवत, हिन्दू संस्कृति अंक, हनुमान अंक, शक्ति अंक, सतकथा अंक, रामचरितमानस लाकर रखे और पूरी एक रैक केवल धार्मिक पुस्तकों से इसलिए भर दी कि कभी अगर मेरे परिवार के बच्चों का मन हुआ तो वे इस दिशा में साहित्य और सामग्री की कमी नहीं पाएँगे; मैं उसी घर में इतना लाचार हो गया कि न उसे डांट सका न उसे समझा सका। मेरे भीतर एक ऐसा काला शून्य पसर गया है कि मैं यह सब लिखते हुए अपने आपको आधा मरा हुआ पाता हूँ।
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सवाल यह है ही नहीं कि मैं नरेन्द्र मोदी का प्रशंसक हूँ। सवाल सरकार के झुकने का नहीं, शिक्षामंत्री के इस्तीफे का नहीं और भविष्य में सरकार बनने या न बनने का भी नहीं। लेकिन यह भाषा यदि एक पूरी पीढ़ी की “कमाई” है तो असली सवाल यह है कि हम जो ठीक पिछली पीढ़ी वाले हैं, उन्होंने इस नई पीढ़ी के लिए क्या किया?
मुझे,
या ब्रदर!
ओके ब्रो!
लोल!
Asap!
से दिक़्क़त नहीं। लेकिन मुझे गांडू, झाँटु, लोड़ू, लो.., चूँ.., लो.. लहसुन के खुले अबाधित प्रयोग से दिक्कत है तो है। यदि जंतर मंतर पर एक बच्ची कहती है कि साले मोदी मेलोनी की “…….” में घुस जा! एक लड़का यह कहता है कि चार चवन्नी घोड़े पर / मोदी मेरे “……” पर। तो यह सवाल तो उठता ही है कि चाहे किसी प्रधानमंत्री की वजह से आपका एक साल बर्बाद हो गया हो, तब भी क्या उसे क्रोध की किसी भी सीढ़ी पर खड़े होकर इस तरह से गालियां दी जा सकती हैं?
यदि हाँ, तो फिर कोई सवाल बचता ही नहीं। लेकिन नहीं, तो फिर जो बच्चे पटरी से उतर गए हैं, उन्हें कविता / उपन्यास / कहानी / विनय / विनम्रता / शालीनता की भाषा पर वापस कैसे लाया जा सकता है? या उन्हें उस घरेलू भाषा की ओर कैसे मोड़ा जा सकता है, जिसमें पांच हज़ार बरस का इतिहास सुरक्षित धड़कता था।
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भाषा का महत्व केवल इसलिए थोड़ी है कि हमें कोई बात कहनी है और उसका अर्थ “ट्रांसफर” कर देना है। भाषा का महत्व तो इसलिए है कि जब दो लोग बात करें तो वे एक दूसरे के मन में शीशे की तरह उतर जाएं। यदि हम एक-दूसरे के मन में उतरना भूल जाएंगे, यदि हम भाषा को केवल एक “टूल” समझेंगे तो हम हमारी माँ को “बाप की लुगाई”, बाप को “माँ का खसम” और दादी को “दादा की रां…” कह कर भी पीछा छुड़वा सकते हैं। लेकिन सवाल वही है कि हमें तो माँ / अम्मी / मम्मी / अम्मा में से ही कोई प्रत्यय चुनना होगा। हमें पा / पापा / डैडी / अब्बा / बापू में से ही किसी शब्द से पिता को सम्बोधित करना चाहिए।
संकट यह है कि इस “चाहिए” / “ought to” की ज़रूरत ही ख़त्म होती जा रही है। ऐसा लगता है जैसे एक नैतिकतापूर्ण जीवन की मांग इस तेज़ और अपनी ही गति से लहराते डगमगाते जीवन में से घट गई है। इसका स्थान आवश्यकता की निर्मम बेशर्मी ने ले लिया है, जिसका विकल्प अभी कोई नहीं है।
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कल मेरी माँ फ्लैट पर आई। उसने जंतर – मंतर की दो-चार रील्स देख ली होंगी।
उसका एक साधारण सा प्रश्न था :
“यह जो लड़की इतने गंदे शब्द बोल रही है, इसे शर्म नहीं आ रही कि इसके माँ बाप भी इसे देखेंगे?”
मुझे माँ के इस प्रश्न की “वैल्यू” समझ नहीं आई। लेकिन आज सुबह जब मैं अपनी भोली बावली बहिन से मिला और उसे कहते सुना : “तो क्या हो गया यार भैया”…. तो मुझे समझ आया कि मेरी माँ कितनी दूरदर्शी है।
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अब मैं थक गया हूँ। भाड़े पर कविता पढ़ने वाले संजीव पालीवाल और एक साल में ऋतुओं की तरह विचारधारा बदलने वाले सुशोभित सक्तावत जैसे कमीनों के स्टेटस देखकर पक गया हूँ। मैं समझ गया हूँ कि एक महान षड्यंत्र के तहत हम सभी खींच लिए गए हैं। यह जीवन, जिसमें “मिनिमम” नैतिकता का भगार / छोंक इसलिए ज़रूरी था कि कुछ गुप्त बचा रहे ताकि आकर्षण का समाजविज्ञान जीवित रहे; अब वह ज़रूरत भी समाप्त हुई जाती है।
मैं मेरे घर में इतनी बुरी तरह हार गया हूँ कि अब मैंने अपनी किताबों की रैक के आगे एक पर्दा लगा दिया है। मेरे भीतर के श्लोक, मुहावरे, लोकोक्तियाँ और कहावतें गूंगी हो गई हैं। मैं गालियों से नहीं, उनकी जगह और उनके प्रयोग के अवसर के प्रति चिंतित हूँ।
मैं यह जानता हूँ कि एक पति वासना से घिरकर अपनी पत्नी को बंद कमरे में यह तक कह सकता है : ब्रा खोल दे! लेकिन उसी पति के भीतर यह पवित्र जागरूकता होती है कि वह दस लोगों के बीच अपनी पत्नी को यह नहीं कह सकता : “कल रात रोज़ जैसा मज़ा नहीं दिया यार तूने!”
यदि इस तरह का मज़ा हम खुले में मांग रहे हैं, तो मेरा मोदीजी से आग्रह है कि आप भी इस्तीफ़ा दे दीजिये। यह महादेश अब पूरी तरह से गिद्धों, कुत्तों, गधों और हरामियों के हाथ में है। और बची खुची आशा को मैं मोर के पंख की तरह निकाल कर फेंक रहा हूँ।
फिर कहूंगा :
“प्यारी जेन ज़ी! तुमने हमें वही लौटाया जो हमने तुम्हें दिया। लेकिन एक दिन तुम जब यह पाओ कि जीवन की अपवित्र कुंठाओं को व्यक्त करने के लिए भी एक पवित्र भाषा चाहिए होती है, तो लौट आना”!
(मनमीत सोनी)



