Wednesday, April 22, 2026
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Dhurandhar: आदित्य धर की ये फ़िल्म एक लक्ष्मण रेखा की तरह है

Dhurandhar: इस फिल्म ने जो लोकप्रियता हासिल की है, इसके पहले 1975 मे शोले ने भी इसी तरह एक ट्रेंड चेंज किया था - 'हम आपके हैं कौन' भी इसी श्रेणी मे थी..

Dhurandhar: इस फिल्म ने जो लोकप्रियता हासिल की है, इसके पहले 1975 मे शोले ने भी इसी तरह एक ट्रेंड चेंज किया था – ‘हम आपके हैं कौन’ भी इसी श्रेणी मे थी..

धुरंधर फ़िल्म एक लक्ष्मण रेखा की तरह है, 1897 मे ज़ब फ़्रांस मे ईसा मसीह पर आयी फ़िल्म सुपर हिट हुई थी और उसका प्रभाव भारतीय समाज पर आया तो दादा साहेब फाल्के ने राजा हरिश्चन्द्र फ़िल्म बनाकर भारतीयता को जीवित कर दिया था।

1975 मे शोले ने दोबारा एक ट्रेंड चेंज किया, ‘हम आपके है कौन’ भी इसी श्रेणी मे थी। उसके बाद खान इंडस्ट्री का उदय हुआ, हर फ़िल्म मे एक अच्छा मुस्लिम किरदार था जो हिन्दू दर्शकों को ईमान की सीख देता था। लव जेहाद को यदि सबसे बड़ा बूस्ट मिला तो वो इसी खान युग मे मिला।

अब धुरंधर ने फिर ट्रेंड को पलट दिया है। गाने भी चुनकर डाले गए, दाऊद को जहर देते समय “तिरछी टोपी वाले”। अब जेन जी इस गाने को सबसे ज्यादा सुन रहा है, गाने की अभिनेत्री सोनम का भी फैन हो रहा है जिन्हे अबू सलेम की वजह से देश छोड़ना पड़ा था। जेन जी ये पढ़ रहा है।

इस लेवल का असर इस फ़िल्म ने डाला है, फ़िल्म मे जो है सो है ही आप जितना रिसर्च मे उतरोगे तो ऐसा लगेगा कि अब कुछ नया पता चला हो। आदित्य धर ने यदि ये सब सोचकर निर्देशन किया है तो ये मानना पड़ेगा कि आदित्य धर कम से कम भारतीय इतिहास का सबसे महान निर्देशक है क्योंकि इतनी पीक डिटेलिंग किसी ने नहीं की है।

राष्ट्रवादी फिल्मो का सिलसिला 2017-18 से शुरू हो गया था, पानीपत, तान्हाजी और उरी जैसी फिल्मे आने लगी थी। लेकिन धुरंधर ने इस ट्रेंड को अब स्थायी रूप से स्थापित कर दिया है, वो एक अलग बात है कि कांग्रेस फिर सत्ता मे लौटे और इस पर वज्रपात करके चोट पहुंचाए।

लेकिन कांग्रेस का सत्ता मे लौटना असंभव है क्योंकि उन्हें पता नहीं है कि बीजेपी का एक धुरंधर उनकी टीम मे है जिसे वे शहजादा मानते है।

इस फ़िल्म ने भारत का राजनीतिक परिदृश्य भी बदल दिया है, ब्रांडिंग नरेंद्र मोदी से ज्यादा बीजेपी और राष्ट्रवाद की हुई है। फ़िल्म मे मासूम भी मर रहे तो कोई सांत्वना नहीं दिखाई गयी और थिएटर मे भी लोगो ने इस नए ट्रेंड का स्वागत किया। अन्यथा पुरानी फिल्मो मे हीरो पाकिस्तानी लोगो को भी बचाता था और हिन्दू दर्शक को सेक्युलरीज्म परोसा जाता था।

जो नई पीढ़ी यह फ़िल्म देख रही है वो कदाचित 2-4 महीने मे इसे भूल भी जायेगी लेकिन अवचेतन मन मे सेट हो गया है कि भारत मे भविष्य दक्षिणपंथी पार्टियों का होगा।

(परख सक्सेना)

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