Beware: भारत में भूजल दोहन से पृथ्वी की धुरी खिसकने का खतरा: वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी..
नई दिल्ली: भारत में भूजल का अत्यधिक दोहन अब केवल पानी की कमी तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इससे पृथ्वी की धुरी तक प्रभावित हो रही है। दुनिया में जितना भूजल निकाला जाता है, उसका लगभग 25 प्रतिशत अकेले भारत निकालता है। यह मात्रा चीन और अमेरिका के संयुक्त भूजल उपयोग से भी अधिक है। इस असंतुलन के कारण पृथ्वी के द्रव्यमान का वितरण बदल रहा है और इसकी धुरी खिसक रही है।
पृथ्वी की धुरी क्यों खिसक रही है
जब जमीन के नीचे से पानी निकाला जाता है, तो उस क्षेत्र का द्रव्यमान कम हो जाता है। यह पानी समुद्रों में पहुंचकर पृथ्वी पर द्रव्यमान का वितरण बदल देता है। पृथ्वी एक घूमती हुई गेंद की तरह है, और जब इसका भार असमान रूप से वितरित होता है, तो इसकी घूमने की धुरी भी बदल जाती है। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक “पोलर मोशन” कहते हैं।
वैज्ञानिक अध्ययनों के निष्कर्ष
NASA और अन्य संस्थानों के शोध बताते हैं कि 1993 से 2010 के बीच भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन में भूजल दोहन के कारण लगभग 54 ट्रिलियन लीटर पानी जमीन से निकाला गया। इसके चलते पृथ्वी की धुरी लगभग 78 सेंटीमीटर पूर्व की ओर खिसक गई। यह बदलाव भले ही धीरे-धीरे हो रहा हो, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं।
भारत में भूजल दोहन की स्थिति
भारत हर साल 250–260 क्यूबिक किलोमीटर भूजल निकालता है। यह मात्रा अमेरिका (111 Km³) और चीन (112 Km³) के संयुक्त उपयोग से भी अधिक है।
भारत में निकाले गए पानी का 90 प्रतिशत कृषि सिंचाई में उपयोग होता है।
धान, गन्ना और गेहूं जैसी फसलें अत्यधिक पानी खींचती हैं।
नहरों और जल प्रबंधन की कमी के कारण किसान ट्यूबवेल पर निर्भर रहते हैं।
मुफ्त या सस्ती बिजली मिलने से किसान लंबे समय तक पंप चलाते हैं।
1.4 अरब लोगों की पानी की मांग भी इस दोहन को बढ़ाती है।
सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य
पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु भूजल दोहन में सबसे आगे हैं।
दिल्ली, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है।
पंजाब और हरियाणा में हर साल भूजल स्तर 0.5–1 मीटर नीचे जा रहा है।
अनुमान है कि 2025 तक 21 भारतीय शहरों (जैसे बेंगलुरु, चेन्नई) में ‘डे जीरो’ यानी पानी खत्म होने की स्थिति आ सकती है।
सबसे बड़ा खतरा
भूमि धंसना: दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों में जमीन धंस रही है क्योंकि भूजल खत्म होने से मिट्टी सिकुड़ रही है।
नदियों का प्रवाह कम होना: यमुना और गोदावरी जैसी नदियों में पानी का प्रवाह घट रहा है।
मौसम चक्र बदलना: पृथ्वी की धुरी का झुकाव (~23.5°) मौसमों को नियंत्रित करता है। अगर यह बदलता है तो गर्मी-सर्दी की अवधि और तीव्रता बदल जाएगी।
समुद्र स्तर बढ़ना: ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की बर्फ तेजी से पिघलेगी, जिससे मुंबई और कोलकाता जैसे तटीय शहर डूब सकते हैं।
दिन-रात की अवधि में बदलाव: धुरी खिसकने से दिन और रात की लंबाई में मामूली अंतर आ सकता है।
भूकंप और ज्वालामुखी: धुरी में बदलाव से पृथ्वी के भीतर दबाव बदल सकता है, जिससे टेक्टोनिक प्लेट्स सक्रिय होंगी और भूकंप बढ़ेंगे।
क्या यह तत्काल का खतरा है?
वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी खतरा तत्काल नहीं है। वर्तमान में धुरी का खिसकाव लगभग 10 सेंटीमीटर प्रति वर्ष है। इसके गंभीर प्रभावों में सैकड़ों वर्ष लग सकते हैं। लेकिन भूजल दोहन, ग्लोबल वार्मिंग और बर्फ पिघलने की वजह से यह प्रक्रिया तेज हो रही है।
भारत का अत्यधिक भूजल दोहन न केवल देश के लिए बल्कि पूरी पृथ्वी के लिए खतरा बनता जा रहा है। अगर यह जारी रहा तो आने वाले वर्षों में मौसम, समुद्र स्तर, कृषि और मानव जीवन पर गहरा असर पड़ेगा। वैज्ञानिकों की चेतावनी स्पष्ट है—भारत को तुरंत जल प्रबंधन और भूजल संरक्षण की सख्त नीति लागू करनी होगी, वरना यह संकट वैश्विक आपदा में बदल सकता है।
(त्रिपाठी पारिजात)



