Speak Sanskrit: संस्कृत विदुषी शांति देवी की पुण्यतिथि पर संस्कृतमय आयोजन, भाषा संवर्धन का लिया गया संकल्प..
पटना, 22 अप्रैल। “सर्वत्र संस्कृतम्” के संकल्प को साकार करने और “आधुनिको भव, संस्कृतं वद” अभियान को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से संस्कृत शिक्षिका एवं विदुषी शांति देवी की पुण्यतिथि इस वर्ष विशेष रूप से संस्कृतमय वातावरण में मनाई गई। यह आयोजन न केवल एक श्रद्धांजलि सभा रहा, बल्कि संस्कृत और हिन्दी के प्रचार-प्रसार के प्रति प्रतिबद्धता को भी पुनः सुदृढ़ करने का अवसर बना।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा बिहार संस्कृत संजीवन समाज, पटना के महासचिव डॉ. मुकेश कुमार ओझा ने अपने संबोधन में कहा कि शांति देवी की स्मृति में आयोजित ऐसे कार्यक्रम समाज में भाषा और संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़ाते हैं। उन्होंने बताया कि एक माता के रूप में शांति देवी से मिली प्रेरणा ही “आधुनिको भव, संस्कृतं वद” अभियान की आधारशिला है, जो आज व्यापक रूप से लोगों को संस्कृत बोलने के लिए प्रेरित कर रहा है।
श्रीमती किरण ओझा ने शांति देवी के शिक्षण कार्यों को याद करते हुए कहा कि वे एक आदर्श प्रधानाध्यापिका थीं, जो विद्यार्थियों के बीच संस्कृत में संवाद को प्रोत्साहित करती थीं। उनका मानना था कि भाषा केवल पढ़ने की नहीं, बल्कि व्यवहार में लाने की चीज़ है।
प्रत्यूष शुभम् ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि शांति देवी का संपूर्ण व्यक्तित्व संस्कृत और हिन्दी की गहराई से जुड़ा हुआ था। उनके जीवन में दोनों भाषाओं के प्रति गहरी निष्ठा स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी। वहीं, पल्लवी किरण ने कहा कि इस पूरे अभियान की प्रेरणा का स्रोत शांति देवी ही हैं, जिनके विचार और कार्य आज भी लोगों को मार्गदर्शन दे रहे हैं।
कार्यक्रम में श्री रामसेवक पाण्डेय, रामेश्वर पाण्डेय, अभिनव झा और डॉ. सुशील कुमार सहित अन्य वक्ताओं ने भी शांति देवी के जीवन, उनके योगदान और उनके आदर्शों पर विस्तार से प्रकाश डाला। सभी ने उनके व्यक्तित्व को सरल, प्रेरणादायक और संस्कृत-सेवा के प्रति समर्पित बताया।
कार्यक्रम का समापन स्वस्ति वाचन के साथ हुआ, जिसे पल्लवी किरण ने प्रस्तुत किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन प्रत्यूष शुभम् ने किया। इस अवसर पर उपस्थित सभी लोगों ने शांति देवी के आदर्शों को आगे बढ़ाने और संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार में सक्रिय योगदान देने का संकल्प लिया।



