Friday, April 24, 2026
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Tree Huggers: हम पेड़ों को गले लगाते हैं – इस प्यार को आप क्या नाम देंगे?

Tree Huggers हिमालय से अमेरिका तक ‘ट्री-हगर’ आंदोलन की कहानी: कैसे एक मज़ाक बना पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक..

Tree Huggers हिमालय से अमेरिका तक ‘ट्री-हगर’ आंदोलन की कहानी: कैसे एक मज़ाक बना पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक..

नेपाल में विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर 5 जून 2011 को काठमांडू में लोगों ने एक साथ पेड़ों को गले लगाकर प्रकृति के प्रति अपना प्रेम जताया था। यह दृश्य आज भी पर्यावरण आंदोलन की एक मजबूत पहचान माना जाता है।

हाल ही में वॉशिंगटन डी.सी. के बीचों-बीच स्थित रॉक क्रीक पार्क में एक गर्म दिन के दौरान करीब एक दर्जन छोटे बच्चे, जिनकी उम्र चार साल तक थी, क्रीक के किनारे खेलते नजर आए। वे कीचड़ में हाथ डाल रहे थे, पत्थरों के नीचे छिपे छोटे जलीय जीव ढूंढ रहे थे और अपने बालों में फंसी घास निकाल रहे थे।

55 वर्षीय ब्राउन “फॉरेस्टकिड्स” नाम का एक कार्यक्रम चलाती हैं, जिसका मकसद बच्चों को प्रकृति के करीब लाना है। उन्होंने बताया कि 2000 के शुरुआती वर्षों में पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरूक होना लोगों को अजीब लगता था।

उन्होंने याद करते हुए कहा कि लोग उन्हें ताना मारते थे—“ओह, तुम तो ट्री-हगर हो, तुम उन लोगों में से हो।” उस समय यह शब्द अपमानजनक माना जाता था। लेकिन अब यही शब्द उनके लिए गर्व का कारण बन चुका है।

उनके साथ खड़ी 9 साल की ओरला मैकक्लेनेन, जो पेड़ों वाली टोपी और नेशनल पार्क की टी-शर्ट पहने हुए थी, ने बताया कि उसे “ट्री-हगर” शब्द के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन उसे पेड़ों के ऊपर चलकर क्रीक पार करना बहुत अच्छा लगता है। उसने कहा, “पेड़ हमें ऑक्सीजन देते हैं, जो हमारे लिए बेहद जरूरी है।”

आज “ट्री-हगर” शब्द का इस्तेमाल पर्यावरण प्रेमियों और जंगलों को बचाने वाले लोगों के लिए किया जाता है, लेकिन इसका इतिहास काफी पुराना है।

इस शब्द की जड़ें हिमालय से जुड़ी हैं। 1973 में भारत में शुरू हुए चिपको आंदोलन ने इस शब्द को पहचान दी। पर्यावरण इतिहासकार रामचंद्र गुहा के अनुसार “चिपको” का मतलब होता है “गले लगना” या “चिपक जाना”।

उस समय हिमालय के गांवों में रहने वाले लोग पेड़ों की अंधाधुंध कटाई के खिलाफ खड़े हुए थे। ये पेड़ न केवल उनकी अर्थव्यवस्था का आधार थे बल्कि बाढ़ और भूस्खलन से भी सुरक्षा देते थे। लेकिन सरकार ने एक विदेशी कंपनी को इन पेड़ों का उपयोग करने की अनुमति दे दी थी।

इस आंदोलन में लोगों ने गांधीजी के अहिंसक तरीकों से प्रेरणा लेकर पेड़ों को बचाने के लिए उन्हें गले लगाने की चेतावनी दी। करीब 300 लोगों के इस विरोध के बाद सरकार को पीछे हटना पड़ा।
इस आंदोलन में महिलाओं की अहम भूमिका रही। बाद में पेड़ों को गले लगाती महिलाओं की तस्वीरें सामने आईं, जो इस आंदोलन का प्रतीक बन गईं।

1973 से 1980 तक कई शांतिपूर्ण प्रदर्शन हुए और आखिरकार सरकार को पेड़ों की कटाई पर रोक लगानी पड़ी।

गुहा ने इसकी तुलना Silent Spring से की, जिसने अमेरिका में पर्यावरण को लेकर जागरूकता बढ़ाई थी। उनके अनुसार ये दोनों घटनाएं समाज और पर्यावरण के संतुलन को समझाने वाली थीं।
यह आंदोलन 1730 में बिश्नोई समुदाय की उस घटना से भी जुड़ा है, जब खेजड़ी पेड़ों को बचाने के लिए 363 लोगों ने अपनी जान दे दी थी। पर्यावरण कार्यकर्ता वंदना शिवा के अनुसार यह बलिदान इतिहास में एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

हालांकि इस घटना के ऐतिहासिक प्रमाण सीमित हैं, लेकिन भारत सरकार ने 2013 में 11 सितंबर को “राष्ट्रीय वन शहीद दिवस” घोषित किया।

अमेरिका में “ट्री-हगर” शब्द 1960 के दशक में सामने आया। 1965 में शिकागो में एक सड़क निर्माण के विरोध के दौरान इस शब्द का इस्तेमाल हुआ। 1990 के दशक में यह शब्द राजनीति में प्रचलित हुआ, लेकिन उस समय इसे नकारात्मक रूप में इस्तेमाल किया जाता था।

यहां तक कि Newt Gingrich जैसे नेता को भी एक समय “ट्री-हगर” कहा गया था, जब उन्होंने जलवायु परिवर्तन पर सहमति की बात की।

आज के दौर में खासकर Gen Z पीढ़ी इस शब्द को गर्व के साथ अपनाती है। पर्यावरण कार्यकर्ता Leah Thomas के अनुसार यह अब इकोफेमिनिज्म से जुड़ा हुआ है।

उन्होंने कहा, “मुझे यह शब्द बहुत पसंद है। खुद को ट्री-हगर कहना मुझे अच्छा लगता है।”

रॉक क्रीक पार्क में आज भी लोग पेड़ों के नीचे बैठते हैं, आराम करते हैं, साइकिल चलाते हैं और बच्चे खेलते हैं। यह दिखाता है कि इंसान और प्रकृति के बीच रिश्ता आज भी मजबूत है।

अंत में, जब बच्चे फिर से पानी में खेलने लगे, तो एक बच्चा चिल्लाया—“क्रेफिश!” और उनकी खुशी की आवाजें पूरे जंगल में गूंज उठीं।

 

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