AI पर UN की नई रिपोर्ट ने दुनिया को डरा दिया है – चौंकाने वाले इस खुलासे से पता चला 2030 तक AI के डेटा सेंटर दुनिया की 3% बिजली और 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी चाट जायेंगे..
AI 2030 तक दुनिया का पानी पी जाएगा? UN ने जो बताया वो सुनकर कलेजा मुँह को आ जाएगा
एक सवाल पूछते हैं। आपने कभी सोचा है कि जब आप ChatGPT से कोई सवाल पूछते हैं, या AI से कोई इमेज बनवाते हैं – तो उसमें कितना पानी खर्च होता है? कितनी बिजली जाती है? शायद नहीं सोचा। हम में से ज़्यादातर लोग नहीं सोचते। बस टाइप किया, जवाब मिला, खुश हो गए।
पर संयुक्त राष्ट्र यानी UN ने अभी एक रिपोर्ट जारी की है। और उसमें जो आँकड़े हैं – वो पढ़कर मन थोड़ा बेचैन हो जाता है।
पहले ज़रा बड़ी तस्वीर देखते हैं
AI चलता कहाँ है? डेटा सेंटर्स में। ये विशाल इमारतें होती हैं जिनमें हज़ारों-लाखों सर्वर रात-दिन चलते रहते हैं। और ये सर्वर गर्म होते हैं – बहुत ज़्यादा। तो इन्हें ठंडा रखने के लिए पानी चाहिए। चलाने के लिए बिजली चाहिए। ज़मीन चाहिए।
पिछले साल दुनियाभर के डेटा सेंटर्स ने मिलकर जितनी बिजली खर्च की – वो सऊदी अरब जैसे पूरे देश की बिजली खपत के बराबर थी। सऊदी अरब जो दुनिया का 11वाँ सबसे बड़ा बिजली खाने वाला देश है।
और यह अभी की बात है। 2030 की तो सोचिए।
UN ने क्या कहा? नंबर देखकर दिमाग़ चकरा जाएगा
UN की रिपोर्ट कहती है कि 2030 तक AI की बिजली खपत दोगुनी हो जाएगी। उस वक्त यह अकेला दुनिया की कुल बिजली का 3 प्रतिशत हिस्सा हड़प लेगा।
3 प्रतिशत सुनकर कम लग रहा है? ज़रा इसे ऐसे समझो — पाकिस्तान, बांग्लादेश और नाइजीरिया — इन तीनों देशों की बिजली खपत को जोड़ लो। AI उससे भी तीन गुना ज़्यादा बिजली अकेले खाएगा।
और कार्बन उत्सर्जन? वो ब्रिटेन जैसे पूरे देश के बराबर पहुँच जाएगा। इस नुकसान की भरपाई के लिए इंसान को 10 साल तक हर दिन 6.7 अरब पेड़ उगाने होंगे। पूरे दस साल। लगातार।
पानी की बात आई तो होश उड़ गए
पर सबसे डरावनी बात तो पानी वाली है।
2030 तक सिर्फ डेटा सेंटर्स के सर्वर ठंडे रखने के लिए 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी चाहिए होगा। यह इतना पानी है जितना पूरी दुनिया की आबादी मिलकर एक साल में भी नहीं पीती।
ज़रा रुकिए। यह पढ़िए फिर से। पूरी दुनिया जितना पानी एक साल में पीती है – उससे भी ज़्यादा। और यह सब सिर्फ मशीनों को ठंडा रखने के लिए।
लोग कहते हैं – “टेक्नोलॉजी सुधरेगी तो कम लगेगा” — UN ने यह भी झुठलाया
एक बहुत आम तर्क है जो AI कंपनियाँ और उनके फैन देते हैं। कहते हैं – “चिंता मत करो, आगे जाकर AI मॉडल्स ज़्यादा efficient होंगे, कम बिजली लगेगी, कम पानी लगेगा।”
UN की रिपोर्ट ने इस सोच को सीधे धराशायी कर दिया। और इसके लिए उन्होंने एक पुराने आर्थिक सिद्धांत का सहारा लिया – जेवन्स पैराडॉक्स ।
जेवन्स पैराडॉक्स — वो जाल जिसमें AI फँस चुका है
19वीं सदी की बात है। इंग्लैंड में एक अर्थशास्त्री थे — William Stanley Jevons। उन्होंने कुछ अजीब देखा।
कोयले के इंजन बेहतर हो गए थे। पहले से कम कोयले में ज़्यादा काम होने लगा था। तो सबने सोचा – अब तो कोयला कम लगेगा।
हुआ उल्टा।
जैसे ही इंजन सस्ते और efficient हुए — लोगों ने उनका इस्तेमाल और ज़्यादा बढ़ा दिया। नए-नए कामों में लगाने लगे। नतीजा? कोयले की कुल खपत पहले से भी ज़्यादा बढ़ गई।
AI के साथ बिल्कुल यही हो रहा है। जैसे-जैसे AI सस्ता और तेज़ होता जाएगा — लोग इसे हर छोटे-बड़े काम में घुसाते जाएंगे। जो बचत होगी efficiency से, वो नई खपत में डूब जाएगी। और पर्यावरण का नुकसान बढ़ता चला जाएगा।
सब AI एक जैसा नहीं खाता — कुछ ज़्यादा भूखे हैं
एक और बात जो रिपोर्ट में है — वो यह कि AI के अलग-अलग काम अलग-अलग ऊर्जा खाते हैं।
टेक्स्ट लिखना? कम बिजली।
कोड बनाना? थोड़ा ज़्यादा।
इमेज बनाना? और ज़्यादा।
वीडियो बनाना? सबसे ज़्यादा।
मतलब जब आप AI से “मेरे लिए एक शानदार वीडियो बनाओ” कहते हैं — उस एक रिक्वेस्ट में उतनी बिजली खर्च होती है जितनी आपके घर का बल्ब घंटों जलाए।
बिजली और पानी ही नहीं – ज़मीन भी चाहिए
यह भी जान लो। 2030 तक इन डेटा सेंटर्स के लिए जितनी ज़मीन चाहिए होगी – वो मेक्सिको सिटी से दस गुना बड़ी है। दस गुना।
एक पूरा महानगर नहीं – दस पूरे महानगरों जितनी ज़मीन सिर्फ AI के लिए।
अमीर देशों का खेल, गरीब देशों की कीमत
यहाँ एक और बड़ी बेइंसाफ़ी छुपी है जिसे रिपोर्ट उजागर करती है।
दुनिया में सिर्फ 32 देशों के पास AI चलाने का असली infrastructure है। और इस पूरी क्षमता का 90 प्रतिशत सिर्फ दो देशों के पास है – अमेरिका और चीन।
बाकी दुनिया? वो बस इस्तेमाल करती है। और नुकसान झेलती है।
AI के लिए जो खनिज चाहिए – उनकी खुदाई गरीब देशों में होती है। उनकी ज़मीन उजड़ती है। और जब पुरानी मशीनें बेकार होती हैं – वो e-waste भी इन्हीं देशों में डंप होता है। मुनाफा अमीर देशों का, ख़मियाज़ा गरीब देशों का।
सरकारें क्या कर रही हैं? ज़्यादातर कुछ खास नहीं
न्यूज़ीलैंड ने AI की एक राष्ट्रीय रणनीति बनाई है। एक framework भी। पर उसमें कहीं यह नहीं लिखा कि AI कंपनियों को अपनी बिजली खपत या कार्बन उत्सर्जन का हिसाब देना होगा। ऑस्ट्रेलिया का भी कमोबेश यही हाल है।
यानी सब AI अपना रहे हैं – पर कोई नहीं पूछ रहा कि इसकी कीमत कौन चुकाएगा।
तो आगे क्या?
पर्यावरण कोई सरकारी फाइल नहीं है जो बाद में निपटा लेंगे। यह हमारी हवा है, हमारा पानी है, हमारी ज़मीन है। AI अगर इसी रफ्तार से बढ़ता रहा – और दुनिया इसी तरह आँखें मूँदे रही – तो 2030 में जो तस्वीर होगी, वो बहुत सुहावनी नहीं होगी।
तकनीक बुरी नहीं है। पर बिना हिसाब की तकनीक ख़तरनाक होती है। और अभी हिसाब किसी के पास नहीं है।
(त्रिपाठी पारिजात)



