Russia–Pakistan Relations: पाकिस्तान की नई चाल: इस्लामिक नाटो के बाद अब रूस से बढ़ाई नजदीकी, अमेरिका और भारत के लिए बढ़ी चिंता
भारत के ऑपरेशन सिंदूर में मात खाने के बाद पाकिस्तान ने अब ऐसे कदम उठाने शुरू कर दिए हैं, जिनसे उसका सबसे बड़ा सहयोगी अमेरिका भी नाराज़ हो सकता है। पहले पाकिस्तान ने तुर्की और सऊदी अरब के साथ मिलकर इस्लामिक नाटो जैसी सुरक्षा गठबंधन की पहल की थी और अब उसने अमेरिका के कट्टर विरोधी रूस से हाथ मिलाना शुरू कर दिया है। यह कदम अमेरिकी राजनीति में बड़ा झटका माना जा रहा है और डोनाल्ड ट्रंप को बिल्कुल रास नहीं आएगा।
पाकिस्तान–रूस की बढ़ती दोस्ती
पाकिस्तान, जो आमतौर पर अमेरिकी खेमे में खड़ा दिखाई देता है, अब रूस के साथ अपने रिश्ते मजबूत कर रहा है। हाल ही में पाकिस्तान के राजदूत फैसल नियाज तिर्मिजी ने मॉस्को में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को अपने परिचय पत्र सौंपे। इसके बाद पुतिन ने पाकिस्तान के साथ संबंधों को “आपसी लाभकारी” बताते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच सहयोग लगातार गहरा हो रहा है। इस मुलाकात ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर रूस और पाकिस्तान अचानक इतने करीब क्यों आ रहे हैं और इसका असर क्षेत्रीय राजनीति पर किस तरह पड़ेगा।
नजदीकी की वजहें
यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों ने रूस को मजबूर कर दिया कि वह नए आर्थिक और ऊर्जा साझेदार तलाशे। दूसरी ओर पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट, विदेशी मुद्रा की कमी और महंगे तेल–गैस बिलों से परेशान है। ऐसे में दोनों देशों की ज़रूरतें एक-दूसरे से मेल खाती हैं।
साल 2023 में पाकिस्तान ने पहली बार रूसी कच्चे तेल को अपने ऊर्जा ढांचे में शामिल किया।
पाकिस्तान अपनी ज़रूरत का लगभग 70 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। परीक्षण के तौर पर रूस से पहली खेप में 45,000 टन और दूसरी खेप में 55,000 टन कच्चा तेल कराची बंदरगाह पर पहुंचा। हालांकि पाकिस्तान का रूस से तेल आयात चीन और भारत जैसे बड़े देशों की तुलना में बहुत कम है।
इसके अलावा शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के मंच पर भी रूस और पाकिस्तान का संपर्क बढ़ा है, जहां रूस अपना क्षेत्रीय प्रभाव बनाए रखना चाहता है।
भारत के लिए चुनौती
भारत लंबे समय से रूस का रणनीतिक साझेदार रहा है, खासकर रक्षा और ऊर्जा के क्षेत्र में। ऐसे में रूस–पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकी भारत के लिए चिंता का विषय है। अभी यह रिश्ता ऊर्जा और व्यापार तक सीमित दिखता है, लेकिन अगर भविष्य में रक्षा सहयोग भी बढ़ा तो यह भारत के लिए संवेदनशील मुद्दा बन सकता है। राहत की बात यह है कि रूस अब भी भारत को बड़ा और भरोसेमंद साझेदार मानता है, लेकिन बदलते वैश्विक हालात में संतुलन बनाए रखना भारत के लिए कठिन चुनौती होगी।
अमेरिका और ट्रंप की नाराज़गी
पाकिस्तान एक तरफ अमेरिका के साथ रिश्ते बनाए रखने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर रूस से सस्ती ऊर्जा और आर्थिक मदद चाहता है। यह कदम वॉशिंगटन की नज़र में संदेह पैदा कर सकता है।
अमेरिका पहले ही रूस पर कड़े प्रतिबंध लगा चुका है। ऐसे में पाकिस्तान का रूसी तेल पर भरोसा और मॉस्को से समझौते, अमेरिका–पाकिस्तान संबंधों में तनाव ला सकते हैं।
पाकिस्तान पहले ही तुर्की और सऊदी अरब के साथ मिलकर इस्लामिक नाटो जैसी पहल कर चुका है, जो अमेरिका को बिल्कुल पसंद नहीं आई।
इसके अलावा पाकिस्तान ने गाज़ा संकट के दौरान अमेरिकी स्टैबिलाइजेशन फोर्स में शामिल न होकर हमास नेताओं को अपनी धरती पर बुलाया था, जिससे इज़राइल के नेतन्याहू और ट्रंप दोनों नाराज़ हुए थे।
कुल मिला कर कहा जा सकता है कि
रूस–पाकिस्तान की यह नजदीकी दोनों देशों की आर्थिक और ऊर्जा ज़रूरतों से पैदा हुई है। लेकिन इसके दूरगामी राजनीतिक और रणनीतिक असर भारत और अमेरिका दोनों के लिए अहम साबित हो सकते हैं। आने वाले समय में पाकिस्तान को व्यापार, वित्तीय सहायता और रणनीतिक समर्थन के मामलों में अमेरिका की सख्ती का सामना करना पड़ सकता है।
(प्रस्तुति -त्रिपाठी पारिजात)



