Universal Law: घुसपैठियों की मार झेल रहा दुनिया का सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश भारत ही ऐसा देश है दुनिया में जहाँ घुसपैठियों पर पार्टियां और समुदाय-संप्रदाय जम कर प्यार बरसाते हैं..
यह वीडियो #अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के दौरान #अवैध_घुसपैठियों के खिलाफ चलाए गए अभियान से जुड़ा है, जिसमें इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट यानी #ICE के जवान एक #बांग्लादेशी मूल की मुस्लिम महिला को हिरासत में लेते दिखाई देते हैं। महिला #बुर्का पहने हुई है और आरोप है कि वह अवैध रूप से अमेरिका में रह रही थी। जब #ICE अधिकारियों ने उसे कार से उतरकर सरेंडर करने को कहा, तो उसने इनकार कर दिया, जबकि कार चला रहा व्यक्ति मौके से भागने की कोशिश करने लगा। ऐसे हालात में #अमेरिकी_कानून के तहत #ICE को अधिकार है कि वह संदिग्ध अवैध #प्रवासियों को बल प्रयोग कर हिरासत में ले, खासकर तब जब सहयोग से इनकार किया जाए या फरार होने की कोशिश हो।
वीडियो में साफ दिखता है कि सभी #ICE जवान पुरुष हैं, मौके पर कोई #महिला अधिकारी मौजूद नहीं है। महिला को कार से बाहर खींचकर नीचे गिराया जाता है, काबू में किया जाता है और फिर हथकड़ी पहनाई जाती है। स्वाभाविक है कि जबरन गिरफ्तारी और छीना-झपटी की स्थिति में शारीरिक संपर्क होता है, जिसे जानबूझकर या दुर्भावनापूर्ण छेड़छाड़ कहना कानूनी और तथ्यात्मक रूप से सही नहीं माना जाता, क्योंकि यह LawEnforcement की मानक प्रक्रिया का हिस्सा है। अमेरिका में कानून धर्म, पहनावे या लिंग के आधार पर नहीं बल्कि नागरिकता और कानूनी स्थिति के आधार पर लागू होता है, और #ICE इसी दायरे में काम करता है।
अब सवाल यह है कि जब भारत में एक राज्य के #मुख्यमंत्री द्वारा सार्वजनिक स्थल पर Hijab हटाने जैसे मुद्दे पर पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय तक ने प्रेस ब्रीफिंग कर दी, BBCUrdu, DWUrdu और AlJazeera जैसी अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थाओं ने उसे इस्लामोफोबिया बताकर प्रमुखता से दिखाया, तब अमेरिका में एक #बुर्कानशी महिला को पुरुष अधिकारियों द्वारा घसीटकर गिरफ्तार किए जाने पर वही अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव, वही मानवाधिकार के ठेकेदार और वही कथित सेक्युलर आवाजें पूरी तरह खामोश क्यों हैं।
यह चुप्पी बताती है कि मुद्दा महिला का सम्मान, #मानवाधिकार या धार्मिक स्वतंत्रता नहीं है, बल्कि SelectiveOutrage है। जब कार्रवाई भारत में होती है तो उसे #अल्पसंख्यक उत्पीड़न बताया जाता है, लेकिन जब वही या उससे भी कठोर कार्रवाई अमेरिका जैसे पश्चिमी देश में होती है तो उसे कानून का पालन कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। यही #दोहरा_मापदंड वैश्विक विमर्श की साख पर सवाल खड़े करता है और दिखाता है कि तथाकथित उदारवाद और मानवाधिकार की बहस किस हद तक #राजनीतिक_एजेंडे से संचालित है।
(प्रस्तुति -राजेन्द्र)



