Raaj Singh writes: एक अलग एंगिल और एक अलग शैली प्रस्तुति की – बात बताने की और समझाने की – आनंद लीजिये राज सिंह की अनोखी कलम का..
भूमिका (Preface)
इतिहास अक्सर ताक़तवर की भाषा बोलता है।
जो सत्ता के साथ खड़ा हो, वह नायक कहलाता है –
और जो सवाल करे, वह अपराधी।
यह कथा उसी सवाल की है।
यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है जिसे डकैत कहा गया,
एक ऐसी स्त्री की है जिसे डरना नहीं आया,
और एक ऐसे कानून की है
जो न्याय नहीं, नियंत्रण चाहता था।
अध्याय 1 : रेगिस्तान और एक नाम
रेगिस्तान में रात जल्दी उतरती है।
दिन की तपिश जाते-जाते सब कुछ जला जाती है –
सपने, भ्रम और झूठ।
उसी रेत पर बैठा था गब्बर सिंह।
चेहरे पर सख़्ती नहीं थी,
आँखों में थकान थी।
वह पैदा से अपराधी नहीं था।
उसने बस इतना किया था
कि ज़मींदार के सामने सिर नहीं झुकाया,
और पुलिस के सामने झूठ नहीं बोला।
यही उसका अपराध था।
अध्याय 2 : ठाकुर बलदेव सिंह
ठाकुर बलदेव सिंह को लोग “कानून का स्तंभ” कहते थे।
वर्दी सधी हुई, आवाज़ भारी,
और आदेशों में कोई भाव नहीं।
उसके लिए इंसान संख्या थे –
फ़ाइलों में बंद,
आदेशों से नियंत्रित।
गब्बर को पकड़ना उसके लिए कर्तव्य नहीं,
उदाहरण था।
“देखो,” ठाकुर ने भीड़ से कहा था,
“जो व्यवस्था के खिलाफ जाएगा,
उसका यही हश्र होगा।”
अध्याय 3 : बिना न्याय की सज़ा
कोई अदालत नहीं हुई।
कोई गवाह नहीं बुलाया गया।
गब्बर को बाँधकर
धूप में खड़ा किया गया।
भीड़ ने पत्थर मारे,
पर गब्बर की आँखें
ठाकुर की आँखों से नहीं हटीं।
उसी क्षण गब्बर समझ गया –
यह आदमी उसे मारना नहीं चाहता,
यह उसे कहानी बनाना चाहता है।
अध्याय 4 : एक रात, कई मौतें
जिस रात गब्बर भागा,
उसी रात उसका घर जला।
माँ की लाश
आँगन में पड़ी थी।
भाई की उँगलियाँ
अब भी ज़मीन पकड़ने की कोशिश कर रही थीं।
गब्बर ने चीखा नहीं।
उसकी आवाज़ वहीं मर गई।
कुछ दिन बाद
ठाकुर कटे हाथों के साथ सामने आया।
पूरा इलाका रोया।
कहानी लिखी जा चुकी थी।
अध्याय 5 : #जय_और_वीरू
जय और वीरू आदर्श नहीं थे।
वे ज़रूरत थे।
ठाकुर ने उन्हें चुना
क्योंकि वे सवाल नहीं पूछते थे।
“नाम मेरा रहेगा,”
ठाकुर ने कहा,
“काम तुम्हारा।”
उन्होंने सिर हिला दिया।
अध्याय 6 : #रामगढ़
रामगढ़ एक ऐसा गाँव था
जहाँ लोग सूरज उगने से पहले डर जाते थे।
यहाँ कानून लाठी में बोलता था
और चुप्पी को समझदारी कहा जाता था।
जब गब्बर पहुँचा,
तो सब दरवाज़े बंद हो गए।
लेकिन उसने किसी का घर नहीं जलाया।
उसने सिर्फ़ उन हाथों को तोड़ा
जो बेगुनाहों पर उठते थे।
अध्याय 7 : #बसंती
बसंती तांगा चलाती थी।
हँसते हुए।
लोग कहते थे –
“यह लड़की डरती नहीं।”
जब उसने गब्बर को देखा,
तो बाकी लोग पीछे हटे,
वह आगे बढ़ी।
“तुम वही हो न,” उसने पूछा,
“जिससे सब डरते हैं?”
गब्बर ने कहा,
“डर सिखाया जाता है।”
अध्याय 8 : संवादों की शुरुआत
बसंती ने सवाल पूछे।
गब्बर ने जवाब नहीं दिए –
उसने अपनी चुप्पी दी।
धीरे-धीरे
बसंती ने गब्बर की कहानी पढ़ी –
उसके घावों में,
उसकी आँखों में।
वह समझ गई –
यह आदमी हिंसा से नहीं,
अन्याय से बना है।
अध्याय 9 : प्रेम
उनका प्रेम घोषणा नहीं था।
वह साझी चुप्पी था।
बसंती ने गब्बर को
फिर से हँसना सिखाया।
गब्बर ने बसंती को
डर से आज़ाद होना सिखाया।
अध्याय 10 : झूठ का राज
ठाकुर ने गाँव पर कहर ढाया।
कर बढ़े।
लाशें गिरीं।
हर बार कहा गया –
“गब्बर ने किया।”
जय और वीरू ने आग लगाई,
और गब्बर दोषी बना।
अध्याय 11 : आग की रात
वह अंतिम चाल थी।
रामगढ़ जल उठा।
आसमान लाल था।
गब्बर लड़ा।
बसंती ने लोगों को निकाला।
जय मारा गया।
वीरू भाग गया।
अध्याय 12 : सच का सामना
ठाकुर पकड़ा गया।
भीड़ बदला चाहती थी।
गब्बर ने बंदूक फेंक दी।
“अगर मैंने मारा,”
उसने कहा,
“तो तुम फिर झूठ मान लोगे।”
ठाकुर बोला नहीं।
क्योंकि पहली बार
उसके सामने डर खड़ा था।
अध्याय 13 : न्याय
ठाकुर मारा नहीं गया।
उसे देखा गया।
उसके अपराध बोले।
उसका झूठ गिरा।
सत्ता ढह गई।
अंतिम अध्याय : विदा
रामगढ़ आज़ाद था।
पर गब्बर और बसंती रुके नहीं।
वे नायक नहीं बने।
वे रास्ता बन गए।
रेगिस्तान की हवाओं में
अब गब्बर का नाम
डर नहीं था –
वह एक सवाल था।
अंतिम वाक्य
– जब कानून अन्याय बन जाए,
तब सवाल करना अपराध नहीं,
कर्तव्य होता है।
(राज सिंह)



