Vaibhav Suryavanshi: बिहार के समस्तीपुर से निकली वैभव सूर्यवंशी की क्रिकेट यात्रा- अभावों और समस्याओं की चुनौतियों के बीच स्टार क्रिकेटर की जीत..
सुबह की पहली किरणों के साथ जब सड़कें अभी नींद से जाग ही रही थीं, तब समस्तीपुर की धुंधली गलियों से एक दुबला-पतला लड़का निकलता। कभी बस पकड़ता, कभी साइकिल पर चढ़ता और पटना की ओर बढ़ जाता। उसका लक्ष्य था—करीब नब्बे किलोमीटर का सफ़र तय करके इंटर-स्कूल टूर्नामेंट का फ़ॉर्म हासिल करना।
बिहार में अक्सर सपने संसाधनों से तेज़ दौड़ते हैं, और यही तेज़ रफ़्तार उस परिवार की आदत बन चुकी थी। समय बीतता गया, लड़का बड़ा हुआ और एक दिन वही युवक, अब पिता बन चुका, अपने आठ साल के बेटे को लेकर एक कोच के दरवाज़े पर खड़ा था। उस बेटे का नाम था वैभव सूर्यवंशी।
पिता संजीव सूर्यवंशी कम बोलने वाले इंसान थे। घर की ज़मीन बिक चुकी थी, कर्ज़ लिया जा चुका था और सुबह चार बजे उठने की दिनचर्या तय हो चुकी थी। बस से, फिर कार से—समस्तीपुर से पटना तक का सफ़र अब रोज़मर्रा की कहानी बन गया था। खाने के डिब्बे सिर्फ़ बेटे के लिए नहीं, बल्कि साथ आने वाले हर गेंदबाज़ के लिए भी होते।
नेट्स पर कोई थक जाता तो दूसरा आ जाता, लेकिन वैभव लगातार बल्लेबाज़ी करता रहता। पाँच सौ गेंदें खेलना उसके लिए सामान्य था, कभी उससे भी ज़्यादा।
कोच मनीष ओझा शुरुआत में सतर्क थे। उन्हें लगता था कि इतना छोटा बच्चा तेज़ गेंदों का सामना नहीं कर पाएगा। इसलिए शुरुआत अंडरआर्म थ्रो और सिंथेटिक गेंदों से हुई। लेकिन छह से आठ महीने बाद जब रोबो-आर्म से 130-135 की रफ़्तार निकली, तब भी वैभव डगमगाया नहीं। उसने गेंद की गति को समझ लिया, समय को पहचान लिया और कोच हैरान रह गए।
नए मैदानों पर, खराब पिचों पर, अंडर-19 खिलाड़ी संघर्ष कर रहे थे, लेकिन वैभव एक बार भी बीट नहीं हुआ। फिर आया अभ्यास मैच—सामने राज्य स्तर के क्रिकेटर गेंदबाज़ी कर रहे थे। वैभव ने अब तक जिला क्रिकेट भी नहीं खेला था, लेकिन स्कोर बना—118 रन। हर छक्का अस्सी-पचासी मीटर से कम नहीं था।
कोच ओझा ने पिता की ओर देखा और कहा—“आपका बेटा बड़े क्रिकेट के लिए तैयार है।”
लेकिन यह सफ़र सिर्फ़ आक्रामकता का नहीं था, यह धैर्य सीखने की भी यात्रा थी। गीली सीमेंट पिचें, दो नए गेंद वाले तेज़ गेंदबाज़, रेत और कंकड़ डालकर बनाई गई टर्निंग विकेटें—सब इसलिए कि वैभव टिकना सीखे।
और तब वैभव ने जवाब दिया—“जिस गेंद को छक्का मार सकते हैं, उस पर सिंगल-डबल क्यों लें?” उस पल के बाद कोच पीछे हट गए। उन्हें समझ आ गया कि यह बच्चा अपनी भाषा जानता है।
वैभव कम बोलता था, ज़्यादा करता था। फिटनेस ड्रिल से बचने के लिए कभी पेट दर्द का बहाना बनाता, लेकिन बल्ला हाथ में आते ही सब ठीक हो जाता।
फिर पड़ाव आने लगे—ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ़ यूथ टेस्ट में शतक, चौदह साल की उम्र में IPL कॉन्ट्रैक्ट, पहली गेंद पर छक्का, गुजरात टाइटंस के खिलाफ़ 38 गेंदों में 101 रन।
जब उससे पूछा गया कि सबसे पहले किसे फ़ोन करोगे, वैभव मुस्कराया और कहा—“पापा को ही।”
लाइन जुड़ी, भीड़ का शोर दूर हो गया और आवाज़ नरम पड़ गई—“पापा… परनाम।”
बिहार की मिट्टी से निकला वह शब्द छोटे सफ़रों से बड़े सफ़रों तक साथ चलता रहा। समस्तीपुर से पटना और अब दुनिया भर के स्टेडियमों तक।
यह सिर्फ़ एक प्रतिभा की कहानी नहीं है। यह पिता के धैर्य, कोच की जिद और एक बच्चे के सपने की लंबी यात्रा है—जिसे क्रिकेट ने शब्द दिए और बल्ले ने आवाज़।



