हरियाणा चुनाव के समय निर्धारित हुआ बटेंगे तो कटेंगे, जातियों मे विभाजित हिन्दू एक हुआ और ये भाव जागा कि अब जाति नहीं देखी जाएगी।
लेकिन फिर आया UGC एक्ट जिस पर स्टे भी लग गया, लेकर कौन आया स्टे कैसे लगा उससे किसी को कोई मतलब नहीं बस सीधा ठीकरा फोडा केंद्र सरकार पर। अब ना हिन्दुराष्ट्र चाहिए ना ही अखंड भारत, अब सिर्फ जातिगत सम्मान चाहिए। सारांश मे सवर्णों मे लालू मुलायम पैदा होने लगे।
हिन्दू की पहचान भूल सवर्ण बनकर अवलोकन करते है, आपने कहा मोदीजी ने गलत किया। वो अलग बात है कि उस दिन मोदीजी यूरोपीय संघ की अध्यक्ष के साथ मीटिंग कर रहे थे मगर चलिए हम तो उन्हें ही दोषी मानते है। आपने कहा मोदी जी की आलोचना करो, वो भी कर लेते है।
लेकिन फिर आपने कहा कि मायावती विकल्प है और यही से हमारे रास्ते अलग होते है, क्योंकि तिलक ताराजू और तलवार को जूते मारने वाले सवर्णों के नेता कैसे बन गए? ये तो विशुद्ध रूप से षड़यंत्र है, फिर आपने कहा इससे बेहतर तो कांग्रेस थी ये तो फिर वही बात हुई ज़ब राघोबा को पेशवाई के लालच मे अंग्रेज अच्छे लगने लगे थे।
फिर कुछ सवर्णों को ओवैसी भी अच्छा लगने लगा तब अब्दाली की मदद करते कुछ हिन्दू गद्दार नजर आये।
समष्टि के लिए व्यष्टि का बलिदान तो सुना था मगर व्यष्टि के लिए समष्टि का बलिदान आज सुनने को मिल रहा है। सवर्णों का सम्मान बना रहे इसलिए महिलाओ की नीलामी काबुल की मंडी मे करा लो ये वो समाधान है जो ज्यादातर सवर्ण दे रहे है।
तो यदि एक बार को हिन्दू पहचान छोड़ सवर्ण बन भी जाए तो बुद्धिहीनता के इस स्तर को आखिर कैसे छुए?
यहाँ तो ऐसे सवर्ण भी मिल रहे है जो UGC वाले मुद्दे के लिए व्यापारिक ट्रेड डीलो की निंदा कर रहे है, ज़ब मुगलो का पतन हुआ तब वो दिन देखने के लिए आप जीवित नहीं थे मगर आज उन्ही मुगलो की राजनीतिक पुत्र कांग्रेस डूब रही है उसका जश्न मनाने की जगह आप देश का सौदा करने मे जुट गए।
सवर्ण की परिभाषा है जिनके पास ज्ञान हो और जो सोच मे आगे हो लेकिन यहाँ तो खेल ही निराला है। यहाँ सिर्फ बचकाना है, सवर्ण मे ज्यादातर वे है जो इस बचकाने खेल का हिस्सा नहीं है। जो है उन्हें तो यही सलाह है वे खेलते रहे।
शेष सवर्ण खुद को पेशवाओ, महाराणाओ और भामाशाह की शिष्य परंपरा से ही जोड़े। ये देश हमारे पुरखो के ज्ञान, रक्त और पैसे से उर्जित है कोई फर्क नहीं पड़ता कि दिल्ली के सिन्हासन पर नरेंद्र मोदी बैठे है या कोई और। हमें बस ये सुनिश्चित करना है कि यहाँ गौरी, गजनवी और गांधीयो का इस्लामिक शासन दोबारा काबिज ना हो।
भारत माता दोबारा गुलामी की जंजीरो मे ना बाँधी जाये, रहा सवाल ये UGC एक्ट का तो उस पर अभी स्टे है। यदि इसका मूल दलितों का उद्धार है तो हमें इससे कोई विरोध नहीं मगर यदि इसका मूल सवर्णों का अहित करना है तो यह निंदनीय है। विरोध योग्य भी है लेकिन विरोध इतना भी नहीं कि कांग्रेस रूपी अब्दाली को देश मे घुसने दे।
सवर्ण होने के नाते UGC के मुद्दे पर विरोध रहेगा लेकिन हिन्दू होने के नाते अभी बीजेपी का कोई विकल्प नहीं है। यदि बीजेपी को हरा दिया तो दोबारा कोई हिंदूवादी पार्टी मंदिर या 370 जैसे मुद्दे छूने की नहीं सोचेगी। ज़ब तक कोई श्रेष्ठ हिंदूवादी विकल्प नहीं मिलता बीजेपी ही श्रेयस्कर है।
(परख सक्सेना)



