Time Blindness: क्या हमेशा देर से आने वाले लोग ‘टाइम ब्लाइंडनेस’ से जूझ रहे हैं या वे बस असभ्य हैं?
टाइम ब्लाइंडनेस क्या है?
टाइम ब्लाइंडनेस का मतलब है समय का सही अंदाज़ा न लगा पाना—किसी काम में कितना समय लगेगा या कितना समय बीत चुका है, यह समझना मुश्किल होना। यह समस्या अक्सर ADHD (अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर) और कभी-कभी ऑटिज़्म से जुड़ी होती है। ऐसे लोग देर से आने पर शर्मिंदगी और तनाव महसूस करते हैं, लेकिन उन्हें सच में लगता है कि उनके पास पर्याप्त समय है।
लेकिन हर दिन देर से आना टाइम ब्लाइंडनेस नहीं होता
विशेषज्ञ बताते हैं कि देर से आने के पीछे अलग-अलग कारण हो सकते हैं:
चिंता (Anxiety): कुछ लोग जल्दी पहुँचने से बचते हैं ताकि उन्हें छोटी-मोटी बातचीत न करनी पड़े।
नियंत्रण की चाह (Control issues): कुछ लोग जिम्मेदारियों से समय निकालने के लिए जानबूझकर देर करते हैं, जैसे “रिवेंज बेडटाइम प्रोकास्टिनेशन”।
अधिकार भावना (Entitlement): कुछ लोग मानते हैं कि उनका समय दूसरों से ज्यादा कीमती है। ऐसे लोग अक्सर देर से आते हैं और ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करते हैं।
फर्क कहाँ है?
अगर कोई देर से आने पर पछतावा दिखाता है और सुधार की कोशिश करता है, तो यह टाइम ब्लाइंडनेस या चिंता हो सकती है।
अगर कोई बार-बार देर करता है और दूसरों की नाराज़गी को नज़रअंदाज़ करता है, तो यह असभ्यता या अधिकार भावना का संकेत है।
समाधान क्या है?
चाहे किसी को ADHD हो या न हो, देर से आने की जिम्मेदारी व्यक्ति की ही होती है।
अलार्म और स्मार्टवॉच का उपयोग करें।
एनालॉग घड़ियाँ रखें ताकि ध्यान भटकने की संभावना कम हो।
कामों को छोटे-छोटे हिस्सों में बाँटकर चेकलिस्ट बनाएं।
दिन में बहुत सारे काम ठूंसने से बचें।
समय का अंदाज़ा लगाने के लिए हर कदम को लिखें—जैसे “जूते पहनना: 1 मिनट, नीचे जाना: 1 मिनट”।
कुल मिला कर देखा जाये तो ऐसा लगता है कि देर से आना कभी-कभी एक न्यूरोलॉजिकल समस्या हो सकता है और कभी-कभी सामाजिक आदत या असभ्यता। फर्क समझना ज़रूरी है, लेकिन किसी भी स्थिति में दूसरों के समय का सम्मान करना ज़रूरी है।
(सुमन सुरखाब)



