Tuesday, March 3, 2026
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Pakistan: भारत ने 60 साल पहले ही मिटा दिया होता नक्शे से पाकिस्तान का नाम अगर ये न हुआ होता

Pakistan: अगर ईरान के शाह ने न निभाई होती अमेरिका की चाल, तो आज नक्शे पर नहीं होता पाकिस्तान: जानिए 1965 और 1971 की गुप्त सैन्य साजिश की पूरी कहानी..

Pakistan: अगर ईरान के शाह ने न निभाई होती अमेरिका की चाल, तो आज नक्शे पर नहीं होता पाकिस्तान: जानिए 1965 और 1971 की गुप्त सैन्य साजिश की पूरी कहानी..

भारत और पाकिस्तान के बीच अब तक चार युद्ध हो चुके हैं, जिनमें 1965 और 1971 के युद्ध बेहद निर्णायक रहे। इन दोनों युद्धों में ईरान और अमेरिका की भूमिका ने पाकिस्तान के अस्तित्व को बचाने में अहम योगदान दिया।

अगर उस समय ईरान के तत्कालीन शासक शाह मोहम्मद रजा पहलवी ने पाकिस्तान का साथ न दिया होता, तो शायद आज पाकिस्तान का नक्शे पर कोई नामोनिशान न होता।

अमेरिका की चाल और शाह की गुप्त मदद

आज जिस अमेरिका ने इज़रायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला किया है, वही अमेरिका कभी ईरान के शाह के जरिए पाकिस्तान को सैन्य मदद दिलवाता था। 1965 और 1971 के युद्धों में अमेरिका ने ईरान को तैयार किया कि वह पाकिस्तान को फाइटर जेट, मिसाइल, बम, गोला-बारूद और अन्य सैन्य उपकरण उपलब्ध कराए।

अमेरिका के गुप्त दस्तावेजों से यह साफ हुआ है कि शाह पहलवी ने पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति याह्या खान को बचाने के लिए हर संभव मदद की।

1965 का युद्ध: ईरान बना हथियारों का एजेंट

1965 के युद्ध के बाद पाकिस्तान को पश्चिमी देशों से हथियार खरीदने में मुश्किलें आने लगीं। तब ईरान ने एक बिचौलिये की भूमिका निभाई और पश्चिम जर्मनी के एक हथियार डीलर से लगभग 90 F-86 फाइटर जेट, मिसाइलें, तोपें और स्पेयर पार्ट्स खरीदे।

ये हथियार पहले ईरान लाए गए और फिर गुप्त रूप से पाकिस्तान भेजे गए। कुछ सैन्य सामान सीधे कराची बंदरगाह पर उतारा गया। इस तरह ईरान ने पाकिस्तान की सैन्य ताकत को बनाए रखने में मदद की और अंतरराष्ट्रीय दबावों के बीच उसे एक वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग भी दिया।

1971 का युद्ध: शाह की रणनीतिक चाल

1971 में जब भारत ने पूर्वी पाकिस्तान में हस्तक्षेप किया और कराची बंदरगाह पर हमले हुए, तो पाकिस्तान की स्थिति बेहद कमजोर हो गई।

4 दिसंबर को याह्या खान ने अमेरिका से तत्काल मदद की अपील की। हेनरी किसिंजर ने राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को बताया कि पाकिस्तान की सैन्य आपूर्ति कट चुकी है। निक्सन ने पूछा, “क्या हम ईरान के जरिए मदद कर सकते हैं?” किसिंजर ने जवाब दिया, “अगर ईरान को भरोसा दिलाया जाए कि अमेरिका उसकी भरपाई करेगा, तो यह संभव है।”

6 दिसंबर को निक्सन ने इस योजना को मंजूरी दी। समझौता हुआ कि ईरान पाकिस्तान को गुप्त रूप से सैन्य मदद देगा और बदले में अमेरिका ईरान को सैन्य सहायता देगा।

सोवियत संघ से टकराव की आशंका 

5 दिसंबर को वॉशिंगटन के निर्देश पर एक अमेरिकी अधिकारी ने तेहरान में शाह से मुलाकात की। शाह ने मदद की इच्छा जताई लेकिन शर्त रखी कि अमेरिका जल्द उसकी भरपाई करे।

8 दिसंबर को शाह ने साफ किया कि वह सीधे अपने विमान और पायलट पाकिस्तान नहीं भेज सकते क्योंकि भारत और सोवियत संघ के बीच मैत्री संधि हो चुकी थी। शाह सोवियत संघ से टकराव का जोखिम नहीं लेना चाहते थे।

शाह की वैकल्पिक योजना

शाह ने सुझाव दिया कि अमेरिका जॉर्डन के राजा हुसैन पर दबाव बनाए कि वे अपने F-104 फाइटर जेट पाकिस्तान भेजें। बदले में ईरान अपने दो स्क्वाड्रन विमान जॉर्डन भेजेगा ताकि वहां की सुरक्षा बनी रहे।

1970 के दशक के दस्तावेज बताते हैं कि ईरान, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच घनिष्ठ संबंध थे। ये तीनों देश CENTO और बाद में RCD जैसे संगठनों के सदस्य थे।

1979 की क्रांति और बदले समीकरण

1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान की विदेश नीति में बड़ा बदलाव आया। भारत के साथ उसके संबंध अपेक्षाकृत संतुलित हो गए और पाकिस्तान से दूरी बढ़ गई।

आज जब अमेरिका और इज़रायल ईरान में सत्ता परिवर्तन की बात कर रहे हैं, यह इतिहास याद दिलाता है कि एक समय यही ईरान पाकिस्तान के लिए जीवनरेखा था—वह भी अमेरिका की रणनीति के तहत।

अब सवाल उठता है कि अगर ईरान में फिर से सत्ता परिवर्तन होता है, तो क्या दक्षिण एशिया में पुराने गठजोड़ फिर से जीवित होंगे? इतिहास यही कहता है कि पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की राजनीति आपस में गहराई से जुड़ी रही है।

(त्रिपाठी पारिजात)

 

 

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