Parakh Saxena writes: भीष्म पितामह का संवाद है यदि अतीत सक्षम होता तो परिवर्तन की आवश्यकता ही क्यों पडती। ये परिवर्तन हमने इसीलिए तो चुना था..
विदेश नीति भावनाहीन होती है और वैसी ही होनी चाहिए।
फ़रवरी मे बजट आया हमने ईरान के बंदरगाह के लिए कोई बजट नहीं रखा, जाहिर है हमें दो महीने पहले पता था कि ईरान के साथ क्या होने वाला है। इजरायल ज़ब गाजा मे मौत की बौछार कर रहा था तब मोदीजी ने उसका सीधा विरोध नहीं किया बल्कि टू स्टेट की बात कही, जबकि भारत मे पुलिस फिलिस्तीन के झंडे दिखने पर डंडे मार रही थी।
मोदीजी इजरायल गए और वहाँ जाकर IMEC कोरिडोर पर जोर दिया, ये तक कहा कि सारी बाधाएं दूर करेंगे जबकि IMEC की सबसे बड़ी बाधा खुद ईरान है। खामनई को लेकर कोई शोक संवेदना व्यक्त नहीं हुई।
सरकार को अरब देशो की पूरी चिंता है, जयशंकर साहब और मोदीजी खुद हर एक देश के राजा और मंत्री से बात कर रहे है।
ये सब कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं है, 2014 मे ही हमें पता था कि भारत की विदेश नीति अर्धचक्र घूमेगी। भारत ने राजनीतिक स्तर पर ईरान का त्याग कर दिया है, भारत की वर्तमान विदेश नीति मे ईरान सच मे अप्रासंगिक हो चुका था।
भारत का फोकस 5 चीजों पर है एक ai, दूसरा डेटा, तीसरा सेमीकंडक्टर चीप, चौथा परमाणु ऊर्जा और पांचवा सबसे जरुरी पश्चिम को निर्यात बढ़ाने के लिए IMEC कोरिडोर। Ai और डेटा मे क्षमता बढ़ाने के लिए ही तो अमेरिका से दोस्ती रखनी है, सेमीकंडक्टर के लिए दुर्लभ मृदा धातु चाहिए फिलहाल चीन दे देगा मगर दूर भविष्य के लिए ही ब्राजील के राष्ट्रपति को भारत बुलाया था।
परमाणु ऊर्जा के लिए यूरेनियम चाहिए इसीलिए कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी भारत आये है, ब्राजील और कनाडा वाली डील मे तो भारत को ढील देनी ही नहीं चाहिए, उन्हें जो चाहिए उसमे से बहुत कुछ दे दो मगर ये धातुओ और यूरेनियम की सप्लाई मजबूत करो।पांचवा सबसे जरुरी IMEC कोरिडोर, मुंबई से सामान पहले दुबई जाएगा। दुबई जहाँ जाने के लिए ईरान के प्रभाव वाली फारस की खाड़ी से जहाज जाएगा, दुबई के बाद ये सामान इजरायल के हैफा बंदरगाह भेजा जाएगा। वो हैफा जहाँ ईरान इस समय बम गिरा रहा है।
ये कारण है कि ईरान गले की फांस बन चुका था, कागज़ पर मित्र बनाने से क्या होगा? यदि ईरान अरब देशो और इजरायल का दुश्मन है तो व्यापारिक स्तर पर हमारा भी शत्रु बन जाता है।
वो बात ठीक है कि इतने समय से दोस्ती थी मगर भीष्म पितामह का संवाद है यदि अतीत सक्षम होता तो परिवर्तन की आवश्यकता ही क्यों पडती। ये परिवर्तन हमने इसीलिए तो चुना था, आज उसका फल मिल रहा है, कुछ दवाई कड़वी होती है इस्लामिक ईरान का पतन भी वही दवाई है।
(परख सक्सेना)



