Consciousness: ब्रह्मांड से पहले क्या था? वैज्ञानिक का बड़ा दावा — चेतना ही है हर चीज़ की जड़ – मन और पदार्थ, आत्मा और ब्रह्म -ये सब वास्तव में एक ही हैं, भेद केवल भ्रम है..
आपने बचपन में ज़रूर यह पढ़ा होगा कि सबसे पहले ब्रह्मांड बना, फिर धरती बनी, फिर उस पर जीवन आया, और लाखों साल बाद इंसान जैसे समझदार प्राणी अस्तित्व में आए। यह क्रम हम सभी को सच लगता है क्योंकि विज्ञान की किताबें यही बताती हैं। लेकिन क्या होगा अगर यह पूरा क्रम ही उल्टा हो? क्या होगा अगर कोई यह कहे कि ब्रह्मांड पहले नहीं आया – चेतना पहले आई, और उसी से ब्रह्मांड जन्मा? यही वह सवाल है जो आज दुनिया भर के वैज्ञानिकों और दार्शनिकों के बीच एक बड़ी बहस का केंद्र बना हुआ है।
वह थ्योरी जिसने सबको चौंका दिया
यह विचार किसी कहानीकार या दार्शनिक का नहीं है। इसे सामने लाया है प्रोफेसर मारिया स्ट्रोम ने, जो स्वीडन की प्रतिष्ठित उप्सला यूनिवर्सिटी में मटेरियल साइंस पढ़ाती हैं। साल भर पहले 2025 में उन्होंने एक शोध पत्र लिखा जो अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका एआईपी एडवान्सेस में प्रकाशित हुआ। यह पत्रिका पिअर रिव्यूड है, यानी इसमें छपने से पहले अन्य विशेषज्ञ उस शोध की जाँच करते हैं।
मारिया स्ट्रोम का कहना है कि चेतना अर्थात अवेयरनेस या जागरूकता – कोई ऐसी चीज़ नहीं जो हमारे दिमाग में न्यूरॉन्स की हलचल से पैदा होती है। बल्कि उनके अनुसार, चेतना एक मूलभूत ऊर्जा-क्षेत्र है – ठीक वैसे ही जैसे गुरुत्वाकर्षण या विद्युत-चुम्बकीय क्षेत्र होता है। इस क्षेत्र से ही भौतिक संसार यानी पदार्थ, समय और अंतरिक्ष – सभी कुछ उत्पन्न हुआ।
और बिग बैंग? जिसे हम ब्रह्मांड की सबसे बड़ी घटना मानते हैं, उसके बारे में मारिया स्ट्रोम कहती हैं कि वह कोई “शुरुआत” नहीं थी – बल्कि वह उस सार्वभौमिक चेतना का वह क्षण था जब वह एकरूप, अखंड अवस्था से बाहर निकली और स्थान, समय व पदार्थ के रूप में प्रकट हो गई। यानी बिग बैंग चेतना का विस्फोट नहीं, बल्कि चेतना का रूपांतरण था।
यह सोच एकदम नई नहीं है
दिलचस्प बात यह है कि ऐसा सोचने वाली मारिया स्ट्रोम पहली वैज्ञानिक नहीं हैं। आधुनिक विज्ञान के कई दिग्गज इस दिशा में पहले भी सोच चुके हैं। मैक्स प्लैंक – जिन्होंने क्वांटम सिद्धांत की नींव रखी थी, उनका मानना था कि पदार्थ असल में चेतना का ही एक रूप है।
इरविन श्रॉडिन्जर, जिन्हें नोबेल पुरस्कार मिला था, उन्होंने कहा था कि चेतना अलग-अलग नहीं बँटी हुई है, बल्कि यह एक अखंड अस्तित्व है जो सबमें समाई हुई है। और इसी तरह की बात डेविड बॉह्म ने भी कही. इस महान भौतिकशास्त्री का कहना था कि ये उनका विचार है कि हम जो दुनिया देखते हैं वह एक गहरी, अदृश्य व्यवस्था की बाहरी झलक मात्र है।
स्ट्रोम ने इन सभी विचारों को क्वांटम फिजिक्स के आधुनिक ढाँचे में ढालने की कोशिश की है। साथ ही उनकी थ्योरी में भारतीय अद्वैत दर्शन की भी छाप दिखती है – वह दर्शन जो कहता है कि मन और पदार्थ, आत्मा और ब्रह्म -ये सब वास्तव में एक ही हैं, भेद केवल भ्रम है।
इस थ्योरी पर आपत्तियाँ भी हैं
हर बड़े दावे की तरह इस थ्योरी के आलोचक भी हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ नेवादा के भौतिकशास्त्री माइकल प्रैविका इस विचार से सहमत नहीं हैं। उनका तर्क है कि वास्तविकता का निर्माण केवल चेतना से नहीं होता। यह ब्रह्मांड अनगिनत कणों, ऊर्जाओं और अंतर्क्रियाओं का एक विशाल जाल है — और उस जाल में चेतना महज एक हिस्सा है, पूरी कहानी नहीं।
वे एक रोचक उदाहरण देते हैं – हर सेकंड अरबों-खरबों न्यूट्रिनो कण हमारे शरीर में से गुज़र जाते हैं और हमें ज़रा भी एहसास नहीं होता। वे हमारी चेतना की पहुँच से बाहर हैं, फिर भी वे सच हैं। इसका मतलब यह हुआ कि वास्तविकता हमारी जागरूकता की सीमाओं से कहीं बड़ी और व्यापक है। प्रैविका यह भी मानते हैं कि ऐसे सवाल विज्ञान की दुनिया में कम और दर्शन की दुनिया में ज़्यादा आते हैं – हालाँकि वे खुद इस ब्रह्मांडीय अंतर्संबंध में एक ईश्वरीय चेतना की झलक देखते हैं।
न्यूरोसाइंस यानी मस्तिष्क विज्ञान की दृष्टि से भी यह थ्योरी विवादास्पद है। इस क्षेत्र की जानी-मानी वैज्ञानिक मोना सोभानी कहती हैं कि विज्ञान में अभी तक कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला जो यह सिद्ध करे कि चेतना किसी मूलभूत क्षेत्र से आती है। उलटे, अधिकांश वैज्ञानिक प्रमाण यह दिखाते हैं कि चेतना मस्तिष्क की जटिल भौतिक गतिविधियों का परिणाम है — पहले दिमाग काम करता है, तब चेतना जागती है।
डोनाल्ड होफमैन का अनोखा नज़रिया
इस पूरी बहस में एक और दिलचस्प आवाज़ है – कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डोनाल्ड होफमैन की। वे मारिया स्ट्रोम से थोड़ा अलग रास्ते पर चलते हैं, पर मंज़िल एक जैसी लगती है। उन्होंने कंप्यूटर पर एक दिलचस्प प्रयोग किया। उन्होंने काल्पनिक जीव बनाए और उन्हें आपस में प्रतिस्पर्धा में डाला। जो जीव दुनिया को जैसी है वैसी देख सकते थे, वे उन जीवों से हार गए जो केवल अपने जीवित रहने के लिए ज़रूरी चीज़ें देख सकते थे।
इससे होफमैन का निष्कर्ष है कि हमारा दिमाग हमें दुनिया की सच्ची तस्वीर नहीं दिखाता – बल्कि वह एक उपयोगी झलक दिखाता है, जैसे कंप्यूटर की स्क्रीन पर आइकन होते हैं। वह आइकन असली फ़ाइल नहीं होता, पर काम चलाने के लिए काफी होता है। ठीक वैसे ही हम जो आसमान, पेड़, पत्थर देखते हैं – वे वास्तविकता की सच्ची छवि नहीं, बल्कि हमारे दिमाग की बनाई हुई उपयोगी छवियाँ हैं।
इस थ्योरी पर भी आपत्तियाँ हैं। कई वैज्ञानिक कहते हैं कि एक सीमित कंप्यूटर सिमुलेशन से पूरी वास्तविकता के बारे में इतना बड़ा निष्कर्ष निकालना जल्दबाज़ी है।
विज्ञान और दर्शन मिल रहे हैं
जो बात इस पूरी चर्चा में सबसे महत्वपूर्ण है वह यह है कि ये सवाल जो कभी केवल दार्शनिकों और धर्मशास्त्रियों के क्षेत्र में माने जाते थे, अब धीरे-धीरे वैज्ञानिकों की प्रयोगशालाओं में घुस रहे हैं। मोना सोभानी जैसी वैज्ञानिक भी मानती हैं कि होफमैन जैसे शोधकर्ताओं का काम यह संभावना दिखाता है कि विज्ञान और दर्शन के बीच की दीवार धीरे-धीरे पतली हो रही है।
यह बदलाव बहुत ज़रूरी है – क्योंकि चेतना का रहस्य शायद तब तक नहीं सुलझेगा जब तक हम केवल एक दृष्टिकोण से देखते रहेंगे।
आखिरकार – जवाब अभी नहीं मिला
मारिया स्ट्रोम की यह थ्योरी उन 350 से भी ज़्यादा प्रतिस्पर्धी थ्योरियों में से एक है जो यह समझाने की कोशिश कर रही हैं कि चेतना आखिर है क्या। इनमें से अभी तक कोई भी थ्योरी पूरी तरह सिद्ध नहीं हुई है — न स्ट्रोम की, न होफमैन की, और न किसी अन्य की। लेकिन एक बात तय है: यह बहस अब रुकने वाली नहीं है।
जैसे-जैसे विज्ञान आगे बढ़ रहा है, यह सवाल और गहरा होता जा रहा है कि हम जो दुनिया देखते हैं, क्या वह सच में वैसी ही है जैसी हमें दिखती है? और शायद इसी सवाल का जवाब ढूँढते-ढूँढते एक दिन विज्ञान उस सच तक पहुँच जाए जिसे हमारे ऋषि-मुनि हज़ारों साल पहले अनुभव के ज़रिए जानने का दावा करते थे -कि यह सारा संसार चेतना का ही खेल है।



