Pakistan में हिंदू और ईसाई बच्चियों के जबरन धर्मांतरण और निकाह के मामलों पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। जानिए कैसे नाबालिग लड़कियों को निशाना बनाया जा रहा है और सिस्टम की भूमिका क्या है..
पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय, खासकर हिंदू और ईसाई परिवारों की बच्चियों के साथ होने वाली घटनाएं लंबे समय से चिंता का विषय रही हैं। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट सामने आई है, जिसने इन घटनाओं की गंभीरता को और स्पष्ट कर दिया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, कई मामलों में कम उम्र की लड़कियों का अपहरण किया जाता है, उन पर दबाव डाला जाता है और फिर उनका धर्म परिवर्तन कराकर शादी करा दी जाती है।
क्या हो रहा है इन बच्चियों के साथ?
रिपोर्ट बताती है कि 14 साल या उससे भी कम उम्र की बच्चियों को अक्सर निशाना बनाया जाता है। उन्हें घर के बाहर से या रास्ते में अगवा कर लिया जाता है। इसके बाद उन्हें डराया-धमकाया जाता है और कहा जाता है कि वे अपना धर्म बदल लें। कई मामलों में यह सब बहुत तेजी से किया जाता है, ताकि परिवार को कुछ समझने का मौका ही न मिले।
धर्म परिवर्तन के बाद इन बच्चियों का निकाह उन्हीं लोगों से करा दिया जाता है, जिन पर अपहरण का आरोप होता है। इस पूरी प्रक्रिया में बच्चियों की इच्छा या उनकी उम्र को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति
पाकिस्तान की कुल आबादी 24 करोड़ से अधिक है, लेकिन उसमें हिंदू और ईसाई समुदाय की संख्या बहुत कम है। हिंदू लगभग 1.6 प्रतिशत और ईसाई करीब 1.37 प्रतिशत हैं। यानी ये समुदाय पहले से ही कमजोर स्थिति में हैं, जिससे वे आसानी से निशाना बन जाते हैं।
बाल विवाह भी बड़ी समस्या
पाकिस्तान में पहले से ही बाल विवाह एक गंभीर मुद्दा है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, वहां हर छह में से एक लड़की की शादी 18 साल से पहले कर दी जाती है। कई लड़कियां तो इससे भी कम उम्र में शादी के बंधन में बांध दी जाती हैं।
हालांकि कानून में लड़कियों की शादी की उम्र 16 साल तय की गई है, लेकिन अल्पसंख्यक बच्चियों के मामलों में यह नियम अक्सर लागू नहीं होता। कई बार तो नाबालिग होने के बावजूद भी शादी को वैध मान लिया जाता है।
कौन सबसे ज्यादा निशाने पर?
रिपोर्ट के अनुसार, जबरन धर्मांतरण और निकाह के मामलों में लगभग 75 प्रतिशत पीड़ित हिंदू लड़कियां होती हैं, जबकि बाकी 25 प्रतिशत ईसाई समुदाय से आती हैं। इन घटनाओं में 14 से 18 साल की किशोरियों को सबसे ज्यादा निशाना बनाया जाता है, लेकिन कई मामलों में इससे भी छोटी बच्चियों को उठाया गया है।
सिंध प्रांत इन घटनाओं का मुख्य केंद्र माना जाता है। यहां के गरीब और पिछड़े इलाकों में रहने वाले परिवार ज्यादा प्रभावित होते हैं। इन परिवारों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति कमजोर होने के कारण वे अपनी बेटियों की सुरक्षा ठीक से नहीं कर पाते।
सोच और सामाजिक कारण
कुछ सामाजिक मान्यताएं भी इस समस्या को बढ़ावा देती हैं। कुछ कट्टरपंथी सोच रखने वाले लोग यह मानते हैं कि किसी गैर-मुस्लिम का धर्म परिवर्तन कराना एक अच्छा काम है। इसी सोच के कारण कई लोग इस तरह के अपराधों को सही ठहराने की कोशिश करते हैं।
इसका सबसे ज्यादा नुकसान मासूम बच्चियों को झेलना पड़ता है, जिनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल जाती है।
पुलिस और प्रशासन की भूमिका
इन मामलों में सबसे चिंताजनक बात यह है कि कई बार पुलिस और प्रशासन भी सक्रिय भूमिका नहीं निभाते। जब कोई परिवार अपनी बेटी के अपहरण की शिकायत लेकर पुलिस के पास जाता है, तो कई बार एफआईआर दर्ज करने में ही टालमटोल की जाती है।
अगर मामला अदालत तक पहुंच भी जाए, तो न्याय मिलना आसान नहीं होता। कई बार अदालतें परिवार द्वारा दिए गए जन्म प्रमाण पत्र को मानने से इनकार कर देती हैं, जबकि आरोपियों द्वारा बनाए गए दस्तावेजों को स्वीकार कर लिया जाता है।
कानून की कमी
पाकिस्तान में जबरन धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए कोई स्पष्ट और सख्त कानून नहीं है। हालांकि जबरन शादी के खिलाफ सजा का प्रावधान है, लेकिन धर्म परिवर्तन के मामलों में इसका इस्तेमाल कम ही होता है।
इसका फायदा उठाकर अपराधी जल्दी-जल्दी फर्जी दस्तावेज तैयार कर लेते हैं और अपने पक्ष में माहौल बना लेते हैं।
मानसिक दबाव और डर
इन बच्चियों को कानूनी प्रक्रिया के दौरान भी काफी दबाव झेलना पड़ता है। कई बार उन्हें उनके परिवार से मिलने नहीं दिया जाता, जबकि आरोपियों को उनसे मिलने की अनुमति मिल जाती है।
इस दौरान बच्चियों को इतना डराया जाता है कि वे अदालत में वही बोलती हैं जो उनसे कहलवाया जाता है। इस तरह सच सामने आ ही नहीं पाता।
यह मुद्दा केवल एक देश या एक समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानवाधिकारों से जुड़ा गंभीर सवाल है। मासूम बच्चियों की सुरक्षा, उनकी स्वतंत्रता और उनके अधिकारों की रक्षा करना हर समाज की जिम्मेदारी है।
जरूरी है कि ऐसे मामलों पर सख्त कानून बनाए जाएं, उनका सही तरीके से पालन हो और पीड़ित परिवारों को न्याय मिले। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस मुद्दे पर ध्यान दिया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।
(न्यूज़ हिन्दू ग्लोबल ब्यूरो)



