Khari-Khari by Manmeet Soni: मैंने माँ को उत्तर दिया – मैंने उनसे कहा कि अभी मोदीजी ख़ूब जियेंगे माँ ! तू घबरा मत !..
पांच का सिक्का, दस का नोट
मोदी साला माद…………….!
एक सत्रह – अठारह बरस की लड़की जब जंतर मंतर पर यह नारा लगा रही थी, तो इसकी जानकारी नरेन्द्र मोदी को न हो, इसकी सम्भावना शून्य है। लेकिन कमाल यह है कि नरेन्द्र मोदी ने अपने चेहरे पर एक शिकन तक नहीं आने दी।
हमारे प्रधानमन्त्री ने जैसे अपने हृदय को पत्थर बना लिया। किसी कठोर या तुरंत प्रतिक्रिया के बजाय वे इंस्टाग्राम पर नमूदार हुए। उन्होंने वहाँ जेन ज़ी जैसी मूर्ख / अबोध / खोखली पीढ़ी को सम्बोधित किया और यह जानते हुए भी कि कमेंट बॉक्स गालियों से भर जाएगा, एक नहीं बल्कि दो रील्स डाली।
बात इंस्टाग्राम के एलगोरिद्म के बदल जाने या 300 मिलयन से ऊपर के व्यूज भर की नहीं है। बात यह है कि यह व्यक्ति एक विशाल चुंबक बनकर जब चाहे भीड़ को अपनी ओर खींच सकता है। यह चुंबकीय शक्ति इस व्यक्ति को कहाँ से प्राप्त हुई, कोई नहीं जानता।
यह भी कौई नहीं जानता कि किस तरह यह व्यक्ति हमेशा चर्चा के केंद्र में बना रहता है और चाहे इसके पक्ष में या चाहे इसके विपक्ष में ही बातें होती रहती हैं। इस चुंबकीय शक्ति का स्त्रोत इस व्यक्ति का महान भाग्य है या बरसों की राजनीतिक उठक-पटक से तैयार हुआ जीवट, कोई नहीं जानता।
कमाल यह है कि सभी को इस व्यक्ति से कोई न कोई शिकायत है। दलित की अपनी शिकायत, सवर्ण की अपनी, छात्र की अपनी, अल्पसंख्यक की अपनी, लेकिन इन तमाम शिकायतों के बावजूद देश में एक ऐसा बहुजन वर्ग है, जो लगभग अदृश्य रहता है, चुनावों में मोदी को वोट देता है और सत्ता देकर ग़ायब हो जाता है।
यह किसी बड़े शोध का विषय है कि आख़िर इस व्यक्ति ने ऐसा क्या जादू कर रखा है कि हर व्यक्ति इस व्यक्ति से एक जुड़ाव महसूस करता है। सभी को यह लगता है कि मोदी मेरा इतना अपना है कि मैं इसको प्यार करूँ या आलोचना करूँ या गाली दूँ, यह मेरा हक़ है।
मैं आपको एक बहुत छोटा किस्सा बताऊँ। ऑपरेशन सिंदूर चल रहा था। सारी रात टीवी चल रहा था। मेरी बूढी दादी भी समाचार देख रही थी। इतने में मोदी की कोई क्लिप आई। और मेरी दादी ने मुझसे कहा :
“ओ मीतूड़ा! मोदी कै की हो ज्यासी तो देस को काई होसी रे?”
(अरे मीतू! मोदी को कुछ हो जाएगा तो देश का क्या होगा रे?)
मैंने उसे कहा कि अभी मोदीजी ख़ूब जियेंगे माँ! तू घबरा मत!
लेकिन यह कम महत्वपूर्ण नहीं है कि लोगों को मोदी से इतना लगाव है। मैं पहले ही कह चुका हूँ कि मोदी के प्रति यह लगाव मोदी नामक व्यक्ति द्वारा फेंके हुए सिक्कों या नोटों से नहीं बल्कि उसके खिलाफ़ उगले गए करोड़ों लीटर ज़हर को अपने कंठ में रोक कर रखने की क्षमता के कारण पैदा हुआ है।
सच बात तो यह है कि मोदी के जीवन की एक भी बात के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। वे अपने भाषणों में कितनी ही बार विरोधी बातें कह चुके हैं। भिक्षा माँगने से लेकर मगरमच्छ पकड़ने तक, सरदारों से सम्पर्क से लेकर ईसाईयों से सम्पर्क तक, चाय बेचने से लेकर आपातकाल में भूमिगत हो जाने तक।
इन सब बातों के बावजूद लोगों को उनकी बातों पर हँसी तो आती है और वे उपहास तक उड़ाते हैं लेकिन कोई भी यह नहीं कहता : यह फ़र्ज़ी आदमी है। और, जो ऐसा कहते हैं, वे स्वयं इतने फ़र्ज़ी हैं कि उनकी बातों को भारत का बहुजन गंभीरता से नहीं लेता।
मोदी, मोदी हैं। वे लवणेन भोज्यम भी कर सकते हैं और न्यूज़ीलैंड में मफलर लहरा कर कह सकते हैं : अजी आपने ही दिया था, देखो! संभालकर रखा है!
मोदी के बचपन पर प्रश्न, मोदी की स्कूलिंग पर प्रश्न, मोदी की डिग्री पर प्रश्न, मोदी के विवाह पर प्रश्न, मोदी के अन्यान्य निजी प्रसंगों पर कितने ही गंभीर प्रश्न : लेकिन मजाल है कि कोई ऐसा सबूत मिल जाए जिससे इस व्यक्ति को घेरा जा सके या पिंजरे में बंद किया जा सके।
उल्टा होता यह है कि जब आप किसी “लड़की” का नाम लेते हैं, तो मोदी को चाहने वाले डिफेंस-मोड में न जाकर नेहरू की अय्याशी, इंदिरा के शान्तिनिकेतन के दिनों के चाल-चरित्र, राजीव के सोनिया से प्यार पर बदतमीज़ी की हद तक बेबाक हो जाते हैं। लेकिन अपने नेता मोदी को झुकने नहीं देते।
आप इसे अंधभक्ति कह लीजिये। कहनी भी चाहिए। लेकिन इस अंधभक्ति की कमाई आसान नहीं होती। मोदी ने अगर अपने पीछे अपने जीवन का कोई भी सबूत नहीं छोड़ा है तो निश्चित रूप से वे जानते होंगे कि उनका 50 की आयु तक का जीवन नहीं बल्कि 50 से 80 वर्ष तक का जीवन ही केंद्र में रहना चाहिए।
ख़ैर,
यह सम्भव है कि मोदी के बारे में आप कुछ भी नहीं जान पाएं। उनके अतीत के बारे में कोई पुलिस नहीं छोड़ी जा सकती। यह व्यक्ति अपने अतीत को नष्ट कर देता है। कुछ निर्लज्ज लोगों ने मोदी के विवाह प्रसंग को लेकर मोदी को क्या क्या न कहा। यहाँ तक कि जंतर मंतर पर यह मीम तक बना दिया कि “बीवी नहीं है तो देश को पेलेगा क्या”।
परंतु मैं दावे से कहता हूँ कि गधेपन और मानसिक बाँझपन की अंतिम सीढ़ी पर खड़ी जेन ज़ी और उनको अपना खट्टा दूध पिलाने वाली हिंदी की अधेड़ कवयित्रियां कितनी ही राजी हो जाएं, लेकिन यह मीम देखकर मोदी के प्रति एक सामान्य भारतीय के मन में बहुत प्रेम और लाड आया होगा।
जितने वोट कट सकते थे, उससे कई गुना नए जुड़ गए होंगे। अपनी आलोचना को हथियार बनाना पिछले तीस वर्षों में मोदी ने सीख लिया है और निकट भविष्य में इस कला का कोई दूसरा ऐसा विकट जादूगर आएगा, इसकी अभी कोई संभावना नहीं।
अंतिम बात, यदि भारत इतना दुर्भाग्यशाली है कि वह मोदी जैसे विज़नरी को किसी चुनाव में खो देता है, तब मैं हिन्दू समुदाय के मध्य एक भयानक शून्य पनपता हुआ देख रहा हूँ। केवल योगी हैं, जिनके पास मोदी “स्पार्क” है। कारण वही कि एक रहस्यमयी अतीत और आक्रामक भविष्य। इसलिए मेरा निजी रूप से यह चाहना बिलकुल ग़लत नहीं कि मोदी को अभी कम से कम 7 – 8 बरस शासन और करना चाहिए ताकि भारतीय बहुजन का ऐसे निकम्मे विपक्ष से पाला ही न पड़े।
मैं दावे से कह सकता हूँ कि मोदी सत्ता में न आए होते तो अब तक यह महादेश फिर से कई टुकड़ों में बंट गया होता। अल्पसंख्यक अप्रत्यक्ष रूप से मेजॉरिटी पर शासन कर रहे होते और भारत एक वैश्विक ताक़त के बजाय भूमि का ऐसा टुकड़ा-भर होता जिसकी हैसियत विश्व में पाकिस्तान से मामूली ऊपर होती।
ख़ैर, मोदीजी सत्ता में बने रहें। उनका तिलिस्म कभी न टूटे। क्योंकि टूट गया तो भारत का हृदय कहीं गहरे धंस जाएगा। केवल वे हैं जो आठों दिशाओं से तीर खाते हुए भी जैसे-तैसे अपनी आँखें और मस्तिष्क बचाए हुए हैं।
एक महान राजनेता, एक महान योजनाकार, एक महान सहिष्णु परन्तु यदा-कदा अपनी ही छवि में क़ैद होकर रह जाने वाला यह व्यक्ति क्या स्वतंत्र भारत के इतिहास में अपनी तरह का पहला व्यक्ति नहीं है, कि अगर कभी इस व्यक्ति ने अपना शरीर छोड़ा तो भारत पूरी तरह से सड़क पर आ जाएगा और फूट फूटकर रोयेगा।
मैं, उस दिन की कल्पना करके अभी से रुआँसा हूँ! फिर ख़ुद ही से कहता हूँ : हिम्मत रखो मनमीत! इतिहास को अपनी जगह भरनी आती है!
(मनमीत सोनी)



