Parakh Saxena writes: ..कीचड़ इसलिए क्योंकि हर विदेश यात्रा के बाद दुनिया हँस रही होती है और भारतीय घृणा से भर जाते है..
2024 मे राहुल गाँधी अमेरिका गया था, वहाँ भारत और उसके लोकतंत्र को गाली देकर आया था, लेकिन आश्चर्य ये है कि तब डेमोक्रेटिक पार्टी की सत्ता होते हुए अमेरिका ने भारत को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की।
ज़ब से डोनाल्ड ट्रम्प राष्ट्रपति बने है तब से तो उसने अमेरिका जाना बंद ही कर दिया है। अब सवाल पर आते है कि आखिर अमेरिका कांग्रेस को लेकर इतना उदासीन क्यों है?
1968 मे सोनिया गाँधी की राजीव गाँधी से शादी होती है तब अमेरिका और सोवियत संघ का शीतयुद्ध चल रहा था। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि सोनिया के पिता इटली की सेना मे थे और सोवियत संघ के बड़े भक्त थे। दरसल इटली शुरुआत मे सोवियत संघ से लड़ा था मगर ज़ब पराजित हो गया तो इन्होने सोवियत के पैर पकड़ लिए थे।
अब अचरज की बात यह है कि इसी दौर मे इंदिरा गाँधी का मन बदलने लगता है, के कामराज जैसे राजनीतिक धुरंधर ने इंदिरा को चुना ही इसलिये था ताकि अपने इशारे पर नचा सके। लेकिन सीधी साधी इंदिरा बहुत शातिर हो जाती है।
वो नेहरू के समय के नेताओं को ठिकाने लगा देती है और अचानक भारत का झुकाव सोवियत संघ की ओर हो जाता है। हम बैंको का राष्ट्रीयकरण कर देते है, राजाओं के भत्ते रोक देते है। देश अचानक से समाज़वाद का रास्ता पकड़ लेता है।
सोनिया गाँधी के रास्ते के कंटक जिस तरह हटे वह भी दिलचस्प है, संजय गाँधी विमान दुर्घटना मे मारे गए, मेनका गाँधी को दूध पीते बच्चे के साथ घर छोड़ना पड़ा, खुद इंदिरा मारी गयी, राजेश पायलट निपट गए, माधवराव सिंधिया भी मारे गए।
प्रणब मुखर्जी भी बस इसलिए बच गए क्योंकि जनाधर नहीं था। वरना जो प्रधानमंत्री की रेस मे आता वो मारा जाता, 1991 मे सोनिया के ही इशारे पर नरसिम्हाराव चुने गए।
नरसिम्हा राव के चुने जाने की एक वज़ह ये थी कि वे राजनीति से सन्यास लेने वाले थे और कितनी दिलचस्प बात हुई कि वहाँ राव गए और यहाँ सोनिया गाँधी के हाथ मे पार्टी की कमान आ गयी। वो कांग्रेस जिसकी अध्यक्षता मोतीलाल नेहरू, सुभाषचंद्र बोस और गोपालकृष्ण गोखले जैसे लोगो ने की थी।
उस कांग्रेस की कमान अब एक विदेशी महिला के हाथ मे थी जिसके परिवार मे सिवाय उसके बेटे के कोई नहीं बचा था। अमेरिका की CIA भी कोई अनाड़ी तो है नहीं, वो भी देख रही थी कि कांग्रेस सोवियत संघ की कठपुतली है।
लेकिन हर शेर को एक सवा शेर जरूर मिलता है, 1991 मे सोवियत संघ का ही विघटन हो गया अब लोमड़ी को शिकार का आदेश कौन देगा? दूसरा अटल बिहारी वाजपेयी ने सोनिया गाँधी को बर्बाद करने मे कोई कसर नहीं छोड़ी।
वाजपेयी ज़ब प्रधानमंत्री थे तो अमेरिका ने अफगानिस्तान युद्ध मे भाग लेने का आग्रह किया था, वाजपेयी खुद मना करते तो बुश को अच्छा नहीं लगता इसलिए उन्होंने सोनिया गाँधी को प्रयोग किया और सोनिया को खबर करवा दी कि मैं सेना भेज दूंगा। सोनिया गाँधी ने आव देखा ना ताव और विरोध शुरू कर दिया।
वाजपेयी तो लोकतंत्र का हवाला देकर पीछे हो गए मगर वाशिंगटन मे गुलामो की राजमाता सोनिया गाँधी बदनाम हुई, वाजपेयी ने बिल्कुल ऐसे ही इराक युद्ध मे मूर्ख बनाया। सोनिया गाँधी की राजनीतिक क्षमता को आप बहुत कुशल मत समझिये, ये अक्ल के मामले मे भी राहुल की ही माँ है।
मुसलमानो को लुभाने और अपनी सोवियत पहचान को बनाये रखने के लिए इटालियन लेडी ने खुद को अमेरिका विरोधी घोषित करने मे कोई कसर नहीं छोड़ी। यही कारण है कि अमेरिका इन्हे मुंह नहीं लगाता, अमेरिका भी चाहता है कि बीजेपी की सरकार तो हटे मगर उसे ये भी पता है कि अमेरिका के लिए भी बीजेपी कांग्रेस से बेहतर है।
मैं बहुत बार कहता हूँ कि कांग्रेस दफन हो चुकी है उसके पीछे ये तर्क भी होते है, राहुल गाँधी की स्थिति ऐसी है कि कांग्रेस सिकुड़ रही है और जो विदेशी मदद कारगर होती वो उसकी अपनी माँ की कृपा से दूर हो चुकी है।
विदेशियों की मंडी मे हिंदुस्तान बेचने की इच्छा तो है मगर ज़ब भी मंडी जाता है तो कीचड़ मे गिरकर लौट जाता है। कीचड़ इसलिए क्योंकि हर विदेश यात्रा के बाद दुनिया हँस रही होती है और भारतीय घृणा से भर जाते है।
(परख सक्सेना)



