Parakh Saxena Writes: भले ही अच्छी न लगे पर दिखाई दे रही है ये बात कि दरसल समय ही खराब चल रहा है, देश का, बीजेपी का और उसके समर्थको का..
ज़ब समय अच्छा होता है तो अयोध्या कश्मीर सुलझ जाते है और अब बुरा है तो FCRA जैसी चीज भी नहीं सुलझ सकी। ये वो समय है ज़ब सोने की खदान मे भी हाथ डाल दो तो कोयला हो रही है लेकिन समय की अच्छी बात यही है कि ये बदलता है।
मोदीजी एकछत्र राज चलाते है लेकिन ये बात भी है कि जो तानाशाह हम चाहते थे वो ये नहीं है। ये गुण अमित शाह मे है, राहुल गाँधी का कद मोदीजी के सामने उनके जूते तक भी नहीं है लेकिन वो जिस तरह उपहास कर रहा है वो स्वीकार्य नहीं है। यदि ये ही गुजरात वाले मोदीजी होते तो शायद ये इसके जीवन के अंतिम क्षण होते।
लेकिन मोदीजी तो अब दिल्ली वाले है, ये पैटर्न अकेले मोदीजी के साथ नहीं है। शिवराज मामा मध्यप्रदेश मे कुछ अलग अवतार मे थे दिल्ली मे अलग, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और निर्मला सीतारमण को भी देखे तो ऐसा लग रहा है जैसे ये लोग संघ की शाखा मे बैठे किसी अनुशासन का पालन कर रहे हो।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा आया, फिर FCRA बिल अटक गया। कही ना कही मैसेज ये गया कि सरकार झुक गयी, हालांकि ये सब कांग्रेस सरकारों के समय सामान्य बात थी तो थोड़ा खुश भी होना चाहिए कि हमारा पैमाना उनकी तुलना मे कितना ऊँचा हो चुका है।
ज़ब आपके पास पूर्ण शक्ति हो और आप शत्रु का दमन ना करो तो उसकी स्थिति वही होती है जो राहुल गाँधी की है। नेशनल हेराल्ड की बंदूक आज भी उसकी कनपटी पर है लेकिन कही ना कही वो जानता है कि सरकार पर दबाव ही इतना ज्यादा है कि वो कुछ नहीं कर सकेगी।
कोई प्रधानमंत्री की माँ को अपशब्द कहे और प्रधानमंत्री उसे माफ़ कर दे ये बात सभी को नहीं पचती। मोदीजी की ख़ामोशी का समर्थक नहीं हूँ मगर इन्हे कही ना कही गुजरात प्रकरण ने बहुत कुछ सिखाया है। गुजरात के जो 12 साल निकाले उसमे भी 10 कांग्रेस की केंद्रीय सरकार के अंदर, उसने मोदी शाह को कई सबक सिखाये है।
सच पूछो तो 2024 मे तो हमें ये भी संदेह था कि ये गठबंधन सरकार कैसे चलाएंगे लेकिन क्या किसी ने भी काकोली घोष और चंद्रबाबू नायडू को ड्रामा करते देखा? कदाचित ये भारतीय इतिहास का पहला गठबंधन है जहाँ समर्थन देने वाली पार्टियां इतनी शांत और प्रोफेशनल है। ये जादू कैसे हुआ तो यही गुजरात का अनुभव है।
समस्या सिर्फ अंदर नहीं बाहर भी है, अमेरिका मे ज़ब बाइडन थे तो तख्तापलट मे लगे थे अब ट्रम्प है तो इन्होने युद्ध मे लगा दिया है। ईरान मे ये यदि इन्होने कोई परमाणु बम फेक दिया तो वो एक अलग ही स्तर की समस्या पैदा कर देगा। युद्ध की वजह से दुनिया भर मे व्यापार अटका हुआ है असर हम पर भी हो रहा है।
जीवन या तो थम गया है या पीछे जा रहा है किसी को कोई प्रगति नजर नहीं आ रही और दुर्भाग्यवश यही वो स्थिति है जहाँ वाजपेयी 2004 मे थे, ये बात सही है कि तब और आज मे अंतर आ चुका है। बीजेपी सत्ता के बाहर होंगी ये तो अतिश्योक्ति अलंकार हो जाएगा, लेकिन 2026 किसी भी तरह कट जाए बस।
कभी कभी हम गलत नही होते समय भी गलत होता है, इस समय हमारी जीत सिर्फ इसी मे है कि हम ये समय झेल जाए। कुछ अच्छा तो नहीं लग रहा है मगर धैर्य बड़ा आवश्यक है।
(परख सक्सेना)



