RSS के 100 वर्ष: कैसे ब्रिगेडियर प्रीतम सिंह और RSS स्वयंसेवकों ने रातों-रात एयरस्ट्रिप बनाकर पुंछ को विनाश से बचाया – स्वतंत्रता उपरान्त एक अनसुना वीर अध्याय..
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के 100 साल पूरे होने पर उनकी अनगिनत ऐतिहासिक भूमिकाओं की चर्चा एक बार फिर हो रही है। इन्हीं घटनाओं में से एक है 1947–48 के दौरान पुंछ की रक्षा की कहानी—जहाँ संघ स्वयंसेवकों ने भारतीय सेना के साथ मिलकर ऐसी मिसाल पेश की, जिसकी आज भी लोग चर्चा करते हैं। यह वही घटना है जब ब्रिगेडियर प्रीतम सिंह ने स्थानीय लोगों और स्वयंसेवकों की मदद से एक बेहद संकरी पगडंडी को रातों-रात हवाई पट्टी में बदल दिया और पूरा इलाक़ा बच गया।
अनसुनी कहानियाँ और उनका महत्व
भारत के इतिहास में कई ऐसे साहसी ऑपरेशन हुए जहाँ आम नागरिकों की मदद ने युद्ध का रुख बदल दिया, परंतु अक्सर इनका श्रेय केवल सैन्य नायकों तक सीमित रह गया। जैसे—फिल्म भुज में विजय कार्णिक को तो पूरा देश जान गया, लेकिन उस काम में शामिल 300 महिलाओं का नाम इतिहास की किताबों में बहुत छोटा रह गया।
उसी तरह, श्रीनगर एयरपोर्ट से बर्फ हटाने में मदद करने वाले स्वयंसेवकों या पुंछ में सेना के लिए रातों-रात हवाई पट्टी बनाने वाले संघ स्वयंसेवकों के नाम कहीं प्रमुखता से नहीं आए।
1947 में पुंछ की परिस्थिति
भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद पुंछ क्षेत्र की स्थिति बहुत संवेदनशील हो गई थी। उस समय पुंछ की लगभग 5 लाख आबादी में करीब 90,000 हिंदू थे। 1942 में स्वयंसेवकों सूर्यप्रकाश खड़वाल और विश्वनाथ बख्शी ने यहाँ पहली RSS शाखा शुरू की थी। जल्द ही अमृत सागर जैसे युवाओं के जुड़ने से संघ का विस्तार इतनी तेजी से हुआ कि इलाके के लोग अचंभित रह गए।
पाकिस्तान बनने से पहले पुंछ-मीरपुर रावलपिंडी डिवीजन के अंतर्गत थे, बाद में इसे जम्मू डिवीजन के साथ जोड़ दिया गया। तभी अमृत सागर को दूर-दराज के हिंदू गांवों को चौकन्ना रखने और पाकिस्तान समर्थक तत्वों की गतिविधियों पर नज़र रखने की ज़िम्मेदारी दी गई।
धीरे-धीरे हालात बिगड़ते गए। कबाइली दस्तों और पाकिस्तानी सैनिकों की मदद से स्थानीय हमलों में वृद्धि हुई, जिसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों के हजारों हिंदू पुंछ शहर में आकर शरण लेने लगे। देखते-देखते लगभग 40,000 शरणार्थी शहर में इकट्ठा हो गए।
उरी के बाद पाकिस्तानी फौज की नज़र पुंछ पर
उरी पर कब्ज़ा करने के बाद पाकिस्तान ने एक टुकड़ी पुंछ की तरफ भेजी। रियासती सेना और स्वयंसेवकों ने मिलकर उनका जबरदस्त मुकाबला किया, लेकिन स्थिति दिन-प्रतिदिन गंभीर होती जा रही थी। पाकिस्तान बाकी टुकड़ियों का इंतजार कर रहा था और आसपास की पहाड़ियों पर कब्ज़ा करता जा रहा था, जिससे पुंछ का मुख्य मार्ग खतरे में पड़ गया।
कहानी के नायक — प्रीतम सिंह
ब्रिगेडियर प्रीतम सिंह का जीवन स्वयं में एक रोमांचक साहस कथा है।
पंजाब के दीना गाँव में जन्मे प्रीतम सिंह को 1938 में हैदराबाद रेजीमेंट में कमीशन मिला। द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होते ही उन्हें सिंगापुर भेजा गया। 1941 में जापानी सेना के हाथों ब्रिटिश-भारतीय टुकड़ी को भयंकर हार का सामना करना पड़ा और अधिकांश सैनिक या तो मारे गए या युद्धबंदी बना लिए गए।
प्रीतम सिंह भी कैद किए गए, लेकिन उन्होंने अपने दो साथियों के साथ जापानी कैम्प से भागने में सफलता पाई। वे घने जंगलों, थाइलैंड और फिर बर्मा के रास्ते लगभग 2000 मील दूर भारत के मणिपुर पहुँचे—यह यात्रा किसी चमत्कार से कम नहीं थी। उनकी बहादुरी के लिए उन्हें मिलिट्री क्रॉस मिला और मेजर बनाया गया।
कश्मीर का विलय और सेना की तैनाती
26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह के भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर करते ही भारतीय सेना की पहली यूनिट 27 अक्टूबर की सुबह श्रीनगर पहुँची।
इसी दिन प्रीतम सिंह को 1 पैरा (कुमायूं) का कमांडिंग ऑफिसर बनाकर कश्मीर भेजा गया।
बारामूला और श्रीनगर की लड़ाइयों में भारी नुकसान के बाद सेना ने हालात संभाले और 14 नवंबर तक बारामूला पर पुनः नियंत्रण पा लिया। 18 नवंबर को उरी में भी भारतीय सेना सफल रही।
लेकिन तभी प्रीतम सिंह को आदेश मिला कि वे तुरंत पुंछ जाएँ—क्योंकि शहर चारों ओर से घिर चुका था और खतरा बेहद नजदीक था।
पुंछ पहुँचने की खतरनाक कोशिश
प्रीतम सिंह की टुकड़ी के पास केवल 24 वाहन थे। उरी से पुंछ तक का रास्ता बेहद कठिन था, बमुश्किल गाड़ियों के लायक। रास्ते में कबाइली दस्तों से कम से कम 16 सैनिक शहीद हुए और 14 घायल। कई अधिकारियों ने वापसी का प्रस्ताव रखा, लेकिन प्रीतम सिंह ने स्पष्ट कहा – “1 पैरा हर हाल में पुंछ पहुँचेगी।”
कबाइलियों ने रास्ते में एक लकड़ी के पुल पर आग लगा दी थी। फिर भी सेना ने एक वैकल्पिक मार्ग खोजा और 21 नवंबर की आधी रात को 419 जवानों के साथ पुंछ पहुँच गई। यह खबर श्रीनगर मुख्यालय को भी अविश्वसनीय लगी।
पुंछ में राशन खत्म, मनोबल टूट चुका था
पुंछ में पहले से मौजूद सैनिक और कमांडर मनोबल खो चुके थे। खाने-पीने की चीजें लगभग समाप्त थीं। शहर में चारों तरफ से घिरा हुआ माहौल था।
ऐसे समय में प्रीतम सिंह ने सभी को भरोसा दिलाया—
“जब तक आखिरी गोली है, हम लड़ते रहेंगे।”
उन्होंने स्थानीय स्वयंसेवकों और शरणार्थियों से भी मुलाकात की। उनके साथ मिलकर पहाड़ी ठिकानों पर कई हमले भी किए, लेकिन दुश्मन ऊँचाई पर होने से स्थिति लगातार चुनौतीपूर्ण बनी रही।
एकमात्र समाधान – हवाई रास्ता
अब यह स्पष्ट हो गया था कि अगर पुंछ को बचाना है, तो सैन्य रसद हवाई मार्ग से ही लाई जा सकती है। लेकिन सबसे बड़ी समस्या थी— पुंछ में कोई हवाई पट्टी थी ही नहीं। यानी नई एयरस्ट्रिप बनानी पड़ेगी—वह भी उस समय जब दुश्मन कुछ ही किलोमीटर दूर था और शहर में खाने-पीने का संकट गंभीर था।
RSS स्वयंसेवकों ने पगडंडी को एयरस्ट्रिप में बदला
अमृत सागर और अन्य स्वयंसेवकों को बुलाया गया। प्रीतम सिंह ने उन्हें हालात समझाए।
तुरंत ही सैकड़ों स्वयंसेवक बेलचे, कुल्हाड़ियाँ और अन्य सामान लेकर काम में जुट गए।
एक तंग पगडंडी को चौड़ा किया गया, आसपास के पेड़ों को काटा गया, ज़मीन समतल की गई और कई कच्चे-पक्के मकान भी गिराने पड़े।
मास्टर मूलराज शर्मा, सरदार कुबेर सिंह, ज्ञानी जीवन सिंह, बाबू बिहारी लाल, मुंशीलाल जैसे अनेक स्वयंसेवकों ने दिन-रात एक कर दिया।
10 दिन में चमत्कार — एयरस्ट्रिप तैयार
दिसंबर 1947 के पहले हफ्ते में एयरस्ट्रिप बनकर तैयार हो गई। 6 दिसंबर को पहला विमान—जिसे ग्रुप कैप्टन बाबा मेहर सिंह और एयर मार्शल सुब्रतो मुखर्जी उड़ा रहे थे—सुरक्षित उतर गया।
उस दिन पुंछ के लोगों ने प्रीतम सिंह और पायलटों को फूल-मालाओं से ढक दिया। इसके बाद लगातार डकोटा विमानों से हथियार, राशन और जवान आने लगे।
लोगों ने प्रीतम सिंह का नया नाम रख दिया – “शेर बच्चा।”
युद्ध का अंत और प्रीतम सिंह के साथ अन्याय
करीब एक साल की लड़ाई के बाद 1 जनवरी 1949 को युद्धविराम हुआ। पुंछ का अधिकांश हिस्सा बच गया, हालांकि कुछ क्षेत्र पाकिस्तान के पास चला गया।
40,000 से अधिक लोग आज भी मानते हैं कि यदि प्रीतम सिंह और संघ स्वयंसेवकों ने मिलकर हवाई पट्टी न बनाई होती, तो पुंछ पूरी तरह नष्ट हो जाता।
लेकिन दुखद तथ्य यह है कि बाद में पुंछ के राजा ने उन पर अपने महल (जिसे फोर्स हेडक्वार्टर बनाया गया था) से कीमती वस्तुओं की चोरी का आरोप लगाया, जिसके आधार पर उनका कोर्ट मार्शल कर दिया गया। सेना के वरिष्ठ अधिकारी आज भी मानते हैं कि यह अन्याय था, क्योंकि राजा खुद युद्ध के समय जनता को छोड़कर भाग गया था।
कई लोग आज भी मानते हैं कि ब्रिगेडियर प्रीतम सिंह को उनके वीर योगदान के लिए राष्ट्रपति स्तर पर क्षमा मिलनी चाहिए थी।



