Accent Penalty in UK: बौद्धिक शक्ति ही नहीं, भारतवंशी सामाजिक शक्ति भी हैं जो समाज की विषमताओं के विरुद्ध सजग भी हैं और अडिग भी -यूनाइटेड किंगडम की ये मिसाल देखिये..
लंदन: ब्रिटेन में कार्यस्थलों पर बोली और उच्चारण (Accent) के आधार पर होने वाले भेदभाव को खत्म करने के लिए एक नई मुहिम शुरू हुई है। 12 जनवरी को कानूनी पेशेवरों और छात्र प्रतिनिधियों का एक दल 10 डाउनिंग स्ट्रीट के बाहर इकट्ठा हुआ और संसद में एक याचिका दाखिल की।
याचिका में क्या मांग की गई
याचिका में Equality Act 2010 में संशोधन कर ‘Accent’ को 10वीं संरक्षित विशेषता (Protected Characteristic) बनाने की मांग की गई है। अभियानकर्ताओं का कहना है कि मौजूदा कानून जाति, धर्म, उम्र और अन्य आधारों पर भेदभाव को रोकता है, लेकिन बोलने के तरीके या उच्चारण पर होने वाले भेदभाव से सुरक्षा नहीं देता।
पहल का नेतृत्व
इस पहल का नेतृत्व एडवोकेट यश जांगिड ने किया। उनके साथ विश्वजीत सिंह डियोरा (क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के छात्र प्रतिनिधि) और शौर्य साह (पोस्टग्रेजुएट शोधकर्ता) भी शामिल रहे। उन्होंने इसे एक ‘ग्लास सीलिंग’ बताया, जो अंतरराष्ट्रीय पेशेवरों और ब्रिटेन के क्षेत्रीय पृष्ठभूमि वाले नागरिकों दोनों को प्रभावित करती है।
भेदभाव की समस्या
अभियानकर्ताओं का कहना है कि यूके की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता के बावजूद Accent आधारित भेदभाव जारी है। शोध से पता चला है कि गैर-स्थानीय अंग्रेज़ी बोलने वाले और स्कॉटिश, वेल्श तथा उत्तरी इंग्लैंड जैसे क्षेत्रीय उच्चारण वाले लोग भर्ती और पदोन्नति में अक्सर कम आंके जाते हैं। इससे कार्यस्थलों पर योग्यता आधारित उन्नति प्रभावित होती है।
मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक असर
याचिका में यह भी कहा गया है कि पेशेवरों को अक्सर अपने Accent को छिपाना पड़ता है ताकि करियर में रुकावट न आए। इससे मानसिक तनाव बढ़ता है और नेतृत्व भूमिकाओं में विविधता सीमित हो जाती है।
“एक आधुनिक मेरिटोक्रेसी में योग्यता को आवाज़ से ज़्यादा महत्व मिलना चाहिए,” यश जांगिड ने कहा। उन्होंने जोड़ा कि कोई भी पेशेवर सिर्फ इसलिए बाहर न किया जाए क्योंकि वह ‘Received Pronunciation’ में बात नहीं करता।
100,000 हस्ताक्षरों का लक्ष्य
अभियानकर्ताओं ने पूरे देश में 100,000 हस्ताक्षर जुटाने का अभियान शुरू किया है। यह संख्या पूरी होने पर संसद में इस मुद्दे पर बहस हो सकती है। इसके लिए विश्वविद्यालयों, अंतर्राष्ट्रीय समुदायों और सामाजिक संगठनों को जोड़ा जा रहा है।
(कल्पेश शाह, लंदन)



