Acharya Anil Vats का लेख बताता है कि हमारे सनातन शास्त्रों में किस देवता को किस विधि या प्रक्रिया से प्रसन्न किया जाता है, उन्हें क्या चीज अत्याधिक प्रिय होती है,यह बातें हमारे वेद-शास्त्रों में बतलाई गई है..
वैसे तो भक्त सच्चे मन और अपार श्रद्धा व प्रेम के साथ अपने इष्ट देवता की पूजा करता है तो प्रभु प्रसन्न भी होते हैं और उसकी मनोकामना भी अवश्य पूर्ण करते है।
लेकिन हमारे सनातन शास्त्रों में किस देवता को किस विधि या प्रक्रिया से प्रसन्न किया जाता है, उन्हें क्या चीज अत्याधिक प्रिय होती है,यह बातें हमारे वेद-शास्त्रों में बतलाई गई है।
अतः आइए जानते हैं कौन से देवी – देवताओं को पूजा उपासना में क्या विशेष प्रिय है -:
श्रीगणेश जी
* भगवान श्रीगणेश की पूजा में “तर्पण” का विशेष महत्व है।
* समस्त देवी-देवताओं में प्रथम पूजनीय हैं भगवान गणेशजी, जिन्हें “तर्पण” अत्यंत प्रिय होता है।इसलिए गणेश जी की पूजा में तर्पण का विशेष ध्यान रखें।
भगवान सूर्य
* भगवान सूर्य की पूजा में “अर्घ्य” का विशेष महत्व है।
* भगवान सूर्य को “अर्घ्य” देना चाहिए। यह उनके ताप को कम करता है। अतः प्रातः काल सूर्योदय के समय भगवान सूर्य नारायण को अर्घ्य देना चाहिए।
भगवान शिव
* भगवान “शिव” की पूजा में अभिषेक का विशेष महत्व है।
* बिना “अभिषेक” के भगवान शिव की अराधना अधूरी है। शिव पुराण के अनुसार रुद्राभिषेक के जरिए शिव की कृपा प्राप्त की जा सकती है। मान्यता के अनुसार भगवान शिव का भिन्न-भिन्न चीजों से अभिषेक करने से वे मनुष्य की समस्त परेशानियों का नाश करते हैं। अतः भगवान शिव का अभिषेक जरूर करें। विशेष कर भगवान शिव की पूजा उपासना के दौरान ‘जलाभिषेक’ तो करना ही चाहिए।
भगवान श्री हरि विष्णु
* भगवान श्री विष्णु की पूजा में “स्तुति व जप” का विशेष महत्व है।
* भगवान श्री विष्णु को प्रसन्न करने के लिए उनकी “स्तुति” अनिवार्य है। केवल पूजन से उन्हें प्रसन्न करना संभव नहीं है। श्री विष्णु पूजा में विष्णुजी की स्तुति एवं नाम जप करने से मनचाहा फल प्राप्त होता है। अतः भगवान विष्णु जी की स्तुति व नाम जप करते रहें//
देवी मां
* देवी मां की पूजा-अर्चना में “हवन” का विशेष महत्व है।
* देवी का कोई भी रूप हो, उन्हें सबसे प्रिय होता है “हवन”। अतः देवी मां को प्रसन्न करने के लिए पूजा- उपासना के बाद हवन करना चाहिए (दीपक प्रज्वलित करना व ज्योत जलाना भी हवन का ही रूप है)
(प्रस्तुति – आचार्य अनिल वत्स)