America Iran War: युद्ध समापन की ओर है क्योंकि ईरान की ओर से मिसाइल अटैक कम हो रहे है..वह अब ड्रोन्स पर निर्भर है या कहें कि उसकी उतनी ही उम्र है जितने उसके पास ड्रोन्स है..
सोशल मीडिया पर ईरान को जितना मर्जी जीत दिला दो वास्तविकता ये है कि ईरान पराजित हो चुका है अब तो खेल बस सत्ता परिवर्तन का चल रहा है। सोशल मीडिया पर जो ईरान फैन्स घूम रहे है वे ध्यान दे कि ईरान अपनी पूर्ण क्षमता से लड़ रहा है जबकि अमेरिका के पास हथियारों का जो जखीरा है उसमे से अमेरिका ने सिर्फ 1% प्रयोग किया है।
ये कुछ वैसा है कि आप डिस्कवरी चैनल पर किसी भालू को शेर से लड़ते देखते है और वह शेर को थोड़ा बहुत छका दे तो उसे भी भालू के लिए उपलब्धि समझते है। ईरान बस वही भालू है, शक्तिशाली जानवर से सभी को जलन रहती है।
ये ही मुसलमान और कांग्रेस थे जिनका अमेरिका के साथ तब प्रेम प्रसंग चल रहा था ज़ब ट्रम्प भारत पर हमलावर थे। आज वे ही दोनों अमेरिका के दुश्मन हो गए और ईरान के कसीदे पढ़ रहे है। सूचना युद्ध मे इस्लामिक समाज सबसे आगे रहा है, ये हमें भी सीखना चाहिए। मुसलमान सोशल मीडिया की सबसे शक्तिशाली कौम है।
पाकिस्तान हो या फिलिस्तीन, इराक हो या अफगानिस्तान सोशल मीडिया पर इन्होने कुतर्कों से हमेशा भारत, इजरायल और अमेरिका की सेनाओ को मात दी है।
ईरान के मिसाइल बेस कम हो रहे है, डोनाल्ड ट्रम्प तो बोल रहे है कि समाप्त हो चुके है। ये बात यदि उन्होंने भारत के विरुद्ध बोली होती तो अब तक तो सब सबूत माँगने शुरु कर देते लेकिन चलिए हम उतना नहीं भी गिरे तो ये मान सकते है कि ये समापन की ओर है क्योंकि ईरान की ओर से मिसाइल अटैक कम हो रहे है।
ईरान अब ड्रोन हमले के भरोसे है, अमेरिका को बस उसका भंडार नष्ट करना है और फिर ईरान का पतन उसी दिन है। ईरान जो टिका हुआ है वो मोज़ेक प्रणाली की वजह से टिका है, ईरान के टॉप नेता मर जाए तो इस प्रणाली के अनुसार ईरान के 31 राज्यों के मुखिया को पॉवर चली जाती है और वे अपने अपने हिसाब से लड़ते रहते है।
ये लोग अंतर्राष्ट्रीय कानून मानने के लिए बाध्य नहीं है इसलिए होर्मूज जलडमरूमध्य मे हमले हो रहे है, एक प्रान्त शांति चाहता है तो दूसरा युद्ध। अमेरिका को यही डील करने मे दिक्कत हो रही है।
ट्रम्प चाचा ने एक गलती तो ये भी कर दी कि ईरान के लोगो पर भरोसा कर लिया। ईरान के लोग क्रांति के लिए बाहर नहीं निकले, अब अमेरिका के पास दो ही रास्ते है पहला वो ईरान मे हथियारबंद गुट पैदा करके गृहयुद्ध करा दे और दूसरा कि वो जैविक और रसायनिक बमो से ईरान को दहला दे।
पहला नैतिक रूप से गलत है दूसरा मानवीय रूप से, लेकिन अमेरिका को दोनों लक्ष्मण रेखा पार करने का अनुभव है। अमेरिका ने इराक और सीरिया मे हथियारबंद गुट पैदा किये है जबकि वियतनाम और जापान को रसायनिक और परमाणु बमो से जलाया है।
लेकिन कुछ सबक है जो हम भारत के लिए ले सकते है, हथियारों की हौड़ का समय जा चुका है। इससे कोई मतलब नहीं किसके पास कितने जेट है, आप कुछ हथियार रखिये मगर ऐसे सुनिश्चित कीजिए जिनमे कोई आपसे ना जीत सके।
ईरान जानता था कि लड़ाकू विमान उसे कोई बेचेगा नहीं और खुद बना नहीं पायेगा इसलिये उसने ड्रोन तकनीक मे प्रशंसनीय काम किया। आज ईरान की आयु उसकी ड्रोन संख्या के बराबर है।
भारत का केस इसके विपरीत है, भारत के पास बड़ा बजट है इसलिए विमान बना रहा है लेकिन हम विमान बना पा रहे है क्योंकि अमेरिका से इंजन की सप्लाय आ रही है। जो बाइडन के समय ये स्लो हो गयी थी और हमारे कई प्रोजेक्ट पटरी से उतर गए थे। शुक्र है ट्रम्प चाचा आये और ये फिर से तेजी से शुरु हुई।
लेकिन ट्रम्प चाचा और कब तक है? आत्मनिर्भर हम हो नहीं सकते उसके लिए रिसर्च पर पैसा बहाना पड़ेगा, पैसा भी नहीं बहा सकते क्योंकि लाड़ली बहना योजना चलानी है। ऐसे मे यही ठीक है कि ट्रम्प चाचा जब तक है अमेरिका का फायदा उठा ले।
भारत का हित यही है कि ये फ्रीबीज बंद करके रिसर्च पर पैसा खर्च करे, ईरान ने ये अच्छा किया कि अमेरिका को अहसास करा दिया ज़ब ईरान इतना छका सकता है तो भारत चीन क्या हाल करेंगे। दूसरा अमेरिका की जो योजना थी कि भारत मे सत्ता परिवर्तन करेंगे वो भी अब दस बार सोचेगा क्योंकि भारत का विपक्ष खुलकर अमेरिका के विरुद्ध है।
अमेरिका अभी जितना मर्जी बेबस दिख रहा हो, वो इसीलिए क्योंकि उसने भीषण हथियारो का पिटारा नहीं खोला है। जिस दिन दिमाग़ ठनका वो दिन ईरान का आखिरी दिन होगा।
ईरान को अमेरिका के आगे ठहर जाना चाहिए इससे पहले कि बहुत देर हो जाये। ईश्वर से प्रार्थना है कि अमेरिका को जैविक हथियारों के प्रयोग की जरूरत ही ना पड़े क्योंकि हवाएं सीमा नहीं देखती ऐसे हथियारों का विपरीत प्रभाव इराक, अफगानिस्तान और उज्बेकिस्तान पर भी दिख सकता है।
(परख सक्सेना)



