Bama Khepa: बाबा ने कहा -यहाँ क्यों रो रही है? मंदिर में जा, माँ के सामने रो। तू जान बचाना चाहती है उसकी..
भोर का समय था।
तारापीठ की धरती पर सन्नाटा पसरा हुआ था।
एक पुराने से वृक्ष के नीचे, आँखें मूँदे, शरीर स्थिर—
बामा खेपा ध्यान में लीन थे।
अचानक उस शांति को चीरता हुआ किसी के दौड़ते कदमों की आवाज़ आई।
एक युवक हाँफता हुआ पहुँचा और सीधा बाबा के चरणों में गिर पड़ा।
काँपती आवाज़ में बोला—
“बाबा… मेरी जान बचा लीजिए…”
बामा खेपा ने आँखें खोलीं, स्वर में तीखापन था—
“अबे साले!
ज़िंदगी भर गलत काम करोगे और जब काल सामने आएगा तो मुझे पकड़ लोगे?
मैं कोई झाड़-फूँक करने वाला ओझा नहीं हूँ।
जा… तारा माँ के मंदिर में जा।”
युवक के पीछे उसकी बूढ़ी माँ भी थी।
बेटे को इस हालत में देखकर वह फूट-फूट कर रो पड़ी।
माँ के रोने की आवाज़ से बाबा और भड़क उठे—
“अरे!
यहाँ क्यों रो रही है?
मंदिर में जा, माँ के सामने रो।
यह जगह रोने के लिए नहीं है।”
पर न बेटा हिला, न माँ।
बामा खेपा ने फिर गरजकर कहा—
“बोल साले, क्या मुसीबत है?”
यह उनकी आदत थी—
वे हर किसी को उसी संबोधन से पुकारते थे,
पर उनके शब्दों में कठोरता कम, करुणा ज़्यादा छुपी रहती थी।
युवक ने सिर झुकाकर कहा—
“मेरा नाम दिगंबर है।
एक सप्ताह पहले मेरे घर एक संन्यासी आए थे।
उन्होंने कहा कि सातवें दिन मुझे साँप काटेगा
और उसी दिन एक दुर्घटना में मेरी मृत्यु हो जाएगी।”
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
“मैंने उनसे बचने का उपाय पूछा…
तो उन्होंने कहा—
मेरी मृत्यु को टालना उनके वश में नहीं,
लेकिन अगर तारापीठ के बाबा चाहें
तो शायद जीवन बच सकता है।”
इतना सुनते ही
बामा खेपा के चेहरे का कठोरपन पिघलने लगा।
माँ की सिसकियों ने
उनके भीतर के औघड़ शिव को जगा दिया।
लाल आँखों से दिगंबर को देखते हुए बोले—
“अबे साले…
तू अब भी यहाँ बैठा है?
तेरा काल तो निकल चुका है,
वह तेरी ओर बढ़ रहा है।”
फिर आदेश दिया—
“जा, तुरंत नदी में स्नान कर।
और सुन…”
माँ की ओर मुड़कर बोले—
“अरी बुढ़िया!
यहाँ मरने से कुछ नहीं होगा।
मंदिर में जा और तारा माँ से विनती कर
कि अपने बेटे की रक्षा करें।”
दिगंबर नदी की ओर दौड़ पड़ा,
माँ मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।
दोनों के जाते ही
बामा खेपा धीमे स्वर में खुद से बोले—
“मैं जितना अपने को छुपाना चाहता हूँ,
माँ उतना ही मुझे सामने ले आती हैं।
हर बार परीक्षा…”
कुछ देर बाद
दिगंबर भीगे वस्त्रों में लौट आया।
बामा खेपा उठ खड़े हुए—
“चल, मेरे साथ।”
वे उसे जंगल के भीतर ले गए।
सेमल के विशाल वृक्ष के नीचे
पंचमुंडी आसन था—
जहाँ बाबा की साधना सिद्ध थी।
दिगंबर को वहीं बैठाकर बोले—
“यहीं बैठकर बस एक ही मंत्र जपना—
‘जय माँ तारा’।”
चारों ओर रेखा खींचते हुए कहा—
“इस घेरे से बाहर मत निकलना।
चाहे जो दिखाई दे,
डरना मत।
डर लगे तो ज़ोर-ज़ोर से माँ को पुकारना।
मैं पास ही रहूँगा।”
इतना कहकर
बामा खेपा अंधकार की ओर बढ़ गए।
धीरे-धीरे शाम ढलने लगी।
श्मशान की भूमि पर
सियारों की चीखें गूँजने लगीं।
कुत्ते और गिद्ध
अधजले शवों पर झपट रहे थे।
चमगादड़ों की फड़फड़ाहट
आसमान को और भयावह बना रही थी।
डर से काँपता दिगंबर
लगातार मंत्र जप रहा था—
“जय माँ तारा… जय माँ तारा…”
अचानक
एक तेज़ फुफकार सुनाई दी।
उसने देखा—
एक विशाल साँप
धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ रहा है।
वह उठकर भागने ही वाला था
कि बाबा के शब्द याद आ गए।
डर चरम पर था।
दिगंबर बेहोश होकर वहीं गिर पड़ा।
साँप उस रेखा के चारों ओर घूमता रहा,
अंदर घुसने का मार्ग खोजता रहा,
लेकिन सफल न हो सका।
अंततः निराश होकर
वह अंधेरे में विलीन हो गया।
सुबह जब दिगंबर की आँख खुली
तो सामने पुजारी खड़े थे।
वे उसे माँ का प्रसाद खाने को कह रहे थे।
प्रसाद ग्रहण कर
वह मंदिर पहुँचा।
वहाँ उसने देखा—
बामा खेपा ध्यान में बैठे हैं।
उनका गोरा शरीर
नील वर्ण में बदल चुका था।
जैसे शिव ने हलाहल पिया हो—
वैसे ही
उन्होंने दिगंबर के भाग्य का विष
अपने भीतर धारण कर लिया था।
कुछ समय बाद
वे कुण्ड में स्नान करने गए।
लौटने पर
उनका स्वरूप फिर सामान्य हो गया।
बामा खेपा
सिर्फ एक तांत्रिक नहीं थे—
वे ब्रह्मज्ञान से प्रकाशित
उच्चतम कोटि के साधक
और माँ तारा के अनन्य भक्त थे।
जो साधना के रहस्यों को समझना चाहता है,
उसके लिए
बामा खेपा सिर्फ कथा नहीं—
अनुभव हैं।
परम संत बामा खेपा के चरणों में
कोटि-कोटि नमन
(प्रस्तुति -शरद राय)



