Friday, August 29, 2025
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China: चीन ने अपनी ग्लोबल EV जंग जीतने के लिए फिर से पेट्रोल का सहारा लिया

China के प्रमुख इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) निर्माता अब पूरी तरह बैटरी पर चलने वाली गाड़ियों (Pure-Electric) से हटकर प्लग-इन हाइब्रिड इंजन वाली गाड़ियों पर ज़ोर देने लगे हैं..

China के प्रमुख इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) निर्माता अब पूरी तरह बैटरी पर चलने वाली गाड़ियों (Pure-Electric) से हटकर प्लग-इन हाइब्रिड इंजन वाली गाड़ियों पर ज़ोर देने लगे हैं..

इसका मतलब है कि चीन की कंपनियां अब ऐसी कारें ज़्यादा बना और बेच रही हैं जो बैटरी और पेट्रोल दोनों से चल सकती हैं। यह रणनीति उन्हें उन देशों में बाज़ार पकड़ने में मदद कर रही है, जहाँ चार्जिंग ढांचा (Infrastructure) अभी मजबूत नहीं है या पूरी तरह बैटरी गाड़ियों के लिए ग्राहकों की झिझक बनी हुई है।

चीन के हाइब्रिड वाहनों का वैश्विक उभार

2024 की पहली छमाही में चीन के प्लग-इन हाइब्रिड वाहनों (PHEVs) का निर्यात पिछले साल की तुलना में 210% बढ़ गया, जबकि केवल बैटरी से चलने वाले इलेक्ट्रिक वाहनों (BEVs) का निर्यात मात्र 40% बढ़ा।

यूरोप में चीनी हाइब्रिड कारों का आयात 551% तक उछला, जबकि वहीं बैटरी-आधारित गाड़ियों का आयात 2% घट गया।

आने वाले 3 से 5 सालों तक हाइब्रिड गाड़ियां निर्यात में बढ़त बनाए रखेंगी, ऐसा अनुमान है।

इलेक्ट्रिक क्रांति में यू-टर्न

चीन, जो दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रिक वाहन (EV) निर्माता है, अब सिर्फ बैटरी वाले EVs पर निर्भर न रहकर, बैटरी और पेट्रोल दोनों से चलने वाले हाइब्रिड वाहनों को दुनिया भर में तेजी से भेज रहा है।

चीन की चाइना ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अनुसार, 2025 की पहली छमाही में PHEVs का निर्यात तीन गुना से ज्यादा बढ़ा, जबकि BEVs का निर्यात केवल 40% बढ़ा।

यूरोप इसका सबसे बड़ा बाज़ार बना, जहां PHEVs का आयात छह गुना से ज्यादा बढ़ गया। खासकर बेल्जियम, जो यूरोप में गाड़ियों के प्रवेश का बड़ा केंद्र है, वहां चीनी हाइब्रिड्स की बड़ी खेप पहुंची। यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब यूरोप 2035 तक ज़ीरो-एमिशन (Zero Emission) लक्ष्य पाने की जद्दोजहद कर रहा है।

क्यों बदला चीन का रुख?

चीन के ऑटोमेकर हर साल 1.1 करोड़ गाड़ियां बेचते हैं और दुनिया की आधी से ज्यादा EV मांग पर उनका कब्जा है। लेकिन अब हाइब्रिड पर जोर देना इस बात का संकेत है कि दुनिया फिलहाल पूरी तरह पेट्रोल इंजन छोड़ने के लिए तैयार नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, हाइब्रिड गाड़ियां सामान्य पेट्रोल गाड़ियों की तुलना में लगभग 30% कम कार्बन उत्सर्जन करती हैं, लेकिन चूंकि इनमें अभी भी ईंधन का इस्तेमाल होता है, इसलिए पूरी तरह ज़ीरो-एमिशन की ओर संक्रमण कई साल पीछे जा सकता है।

शंघाई स्थित रणनीति फर्म Automobility के CEO बिल रुसो ने कहा –

“जहां चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर या सब्सिडी कमजोर है, वहां PHEVS ग्राहकों को बेहतर समाधान देते हैं। यह लागत, रेंज और परफ़ॉर्मेंस के मामले में भी फायदेमंद हैं।”

आज PHEVs चीन के कुल EV निर्यात का लगभग एक-तिहाई हिस्सा हैं। पहले चीन सिर्फ बैटरी वाहनों को निर्यात कर रहा था, लेकिन अब उसकी रणनीति बहुस्तरीय हो गई है, जिसमें इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी और ग्राहकों की चिंताओं (जैसे – बीच रास्ते बैटरी खत्म होने का डर) का समाधान शामिल है।

यूरोप और ब्राज़ील में बंपर डिमांड

चीनी कंपनी BYD का उदाहरण लीजिए –
ब्राज़ील, उसका सबसे बड़ा विदेशी बाजार है। यहां कंपनी के हाइब्रिड निर्यात, पूरी तरह बैटरी वाले मॉडलों की तुलना में लगभग दोगुने हो गए हैं।

यूरोप में भी यह ट्रेंड तेज है क्योंकि यूरोपीय संघ (EU) ने चीनी बैटरी गाड़ियों पर तो टैक्स बढ़ा दिया है, लेकिन हाइब्रिड गाड़ियों पर कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लगाया। इससे चीनी कंपनियों को एक बड़ा फायदा मिल गया, जिसका उन्होंने तुरंत फायदा उठाया।

चाइना पैसेंजर कार एसोसिएशन के महासचिव कुई डोंगशु ने कहा –

“साल की पहली छमाही में EV निर्यात उम्मीद से ज्यादा बढ़ा, और इसका श्रेय मुख्य रूप से PHEVS और अन्य हाइब्रिड गाड़ियों को जाता है।”

चार्जिंग नेटवर्क की कमी

विशेषज्ञ मानते हैं कि दुनिया के कई हिस्सों – दक्षिण-पूर्व एशिया से लेकर लैटिन अमेरिका तक – चार्जिंग नेटवर्क की कमी है। इसलिए पूरी तरह बैटरी गाड़ियों की बजाय हाइब्रिड गाड़ियां लोगों को ज्यादा व्यावहारिक विकल्प लग रही हैं।

चीनी कंपनी SAIC-GM-Wuling के उपाध्यक्ष विन्सेंट वोंग ने कहा –

“अगर मैं सिर्फ BEVS बनाऊं, तो नए ऊर्जा वाहन बाजार का 50% हिस्सा खो दूंगा। हर देश की नीतियां और इकोसिस्टम अलग हैं। इसलिए PHEVS की भी अपनी जगह है।”

जापान बनाम चीन – अलग राह

जापानी कंपनियां (टोयोटा, होंडा) कई दशक पहले ही हाइब्रिड गाड़ियां बना चुकी थीं। उनकी तकनीक में गाड़ी चलते और ब्रेक लगाने पर बिजली पैदा होती थी, और उन्हें चार्ज करने की जरूरत नहीं होती थी।

चीन की कंपनियां बाद में आईं और उन्होंने प्लग-इन हाइब्रिड तकनीक अपनाई, जिसमें गाड़ियां चार्जिंग स्टेशन या घर से चार्ज की जा सकती हैं, और फिर पेट्रोल इंजन सपोर्ट करता है।

वैश्विक तस्वीर क्या है

अमेरिका में चीनी EVs पर प्रतिबंध है और वहां की सरकारी सब्सिडी भी जल्द खत्म होने वाली है।

वहां का बाजार जापानी, कोरियाई और घरेलू निर्माताओं के पास है, जो तरह-तरह की इंजन तकनीकें उपलब्ध कराते हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि –

“दुनिया में वाहनों का भविष्य एक जैसा नहीं होगा। अलग-अलग देशों, इलाकों और ग्राहकों की ज़रूरतों और आय के आधार पर अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल होगा।”

कुल मिला कर कहा जा सकता है कि

चीन ने EV निर्यात की रणनीति बदल दी है। अब वह सिर्फ बैटरी वाली गाड़ियां नहीं, बल्कि बैटरी + पेट्रोल वाली हाइब्रिड गाड़ियां भी बड़े पैमाने पर बेच रहा है। यूरोप और लैटिन अमेरिका जैसे बाज़ारों में, जहां चार्जिंग ढांचा कमजोर है, ये हाइब्रिड गाड़ियां लोगों को व्यावहारिक और सस्ती लग रही हैं। इससे साफ है कि दुनिया अभी पेट्रोल इंजन पूरी तरह छोड़ने को तैयार नहीं है, और हाइब्रिड गाड़ियां आने वाले 3–5 साल तक सबसे बड़ा ट्रेंड बनी रहेंगी।

हाइब्रिड्स और EVs की असली तस्वीर

जनरल मोटर्स इंडोनेशिया के पूर्व अध्यक्ष और अब Dunne Insights नामक कंसल्टिंग कंपनी चलाने वाले माइकल डन कहते हैं कि मौजूदा हालात किसी विचारधारा (ideology) की वजह से नहीं, बल्कि बाज़ार की वास्तविकता को दर्शाते हैं।

उनके मुताबिक –

“लोग अक्सर सोचते हैं कि दुनिया या तो पूरी तरह इलेक्ट्रिक हो जाएगी या पेट्रोल पर ही टिकेगी। असलियत यह है कि इंजन टेक्नॉलजी (पावरट्रेन) का बंटवारा ग्राहक, इलाका, देश और लोगों की आमदनी पर निर्भर करेगा।”

3–5 साल तक हाइब्रिड का दबदबा

रणनीति विशेषज्ञ बिल रुसो का कहना है कि चीन के हाइब्रिड निर्यात में तेजी अगले 3 से 5 साल तक बनी रह सकती है। इसके बाद बैटरी टेक्नोलॉजी और चार्जिंग ढांचा मजबूत होगा और BEVs (बैटरी इलेक्ट्रिक व्हीकल्स) को बढ़ावा मिलेगा।

लेकिन वे मानते हैं कि –

“ये एक संक्रमणकाल है, न कि वापसी। लंबी अवधि में दिशा अब भी ज़ीरो-एमिशन वाहनों की ही ओर है।”

यूरोप की ढीली पॉलिसी का फायदा

यूरोपीय संघ (EU) ने हाल ही में कंपनियों को उत्सर्जन लक्ष्यों (emission targets) को पूरा करने के लिए ज्यादा समय दे दिया है। इसका मतलब है कि पहले जो टाइमलाइन तय की गई थी, वह बहुत ज्यादा आशावादी थी।

यही नीतिगत लचीलापन चीनी हाइब्रिड गाड़ियों को यूरोप में पैर जमाने का मौका दे रहा है, जबकि वहां पूरी तरह बैटरी गाड़ियों का ढांचा अभी विकसित हो ही रहा है।

Nio का अलग रास्ता

जहाँ ज़्यादातर चीनी कंपनियां हाइब्रिड और अन्य विकल्पों को अपना रही हैं, वहीं नियो (Nio) के संस्थापक विलियम ली अब भी पूरी तरह बैटरी वाहनों पर टिके हुए हैं।

उन्होंने हाल ही में कहा –

“अगर मैं समय में पीछे जा सकता, तो रेन्ज एक्सटेंडेड इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (REEVS) भी बनाता ताकि थोड़ी कमाई कर लेता। अब मैं वही कर सकता हूँ कि धैर्य रखूँ और उस दिन का इंतजार करूँ जब सब लोग BEVS खरीदने को तैयार होंगे।”

REEVs यानी Range Extended Electric Vehicles वे गाड़ियां हैं जिनमें बैटरी कम होने पर एक छोटा पेट्रोल इंजन या जेनरेटर बैटरी को चार्ज करता है। इससे गाड़ी की दूरी (range) बैटरी से ज्यादा बढ़ जाती है।
Gasgoo नामक चीनी रिसर्च फर्म के अनुसार, REEVs और हाइब्रिड्स ग्राहकों को शुद्ध बैटरी और पारंपरिक पेट्रोल गाड़ियों के बीच एक और विकल्प देते हैं।

चीन के लिए निर्यात ज़रूरी

घरेलू बाजार में प्रतिस्पर्धा और धीमी वृद्धि के चलते चीनी ऑटो कंपनियों के लिए विदेशों में विस्तार बेहद जरूरी हो गया है। अब उनके लिए यह मायने नहीं रखता कि गाड़ी हाइब्रिड है या बैटरी पर चलने वाली – जो बिकेगी वही बनानी और भेजनी है।

यूरोप के आंकड़े बताते हैं कि चीनी कंपनियों ने एक मध्यम रास्ता खोज लिया है – इतनी क्लीन गाड़ियां बनाना कि नियमों का पालन हो जाए, और इतनी प्रैक्टिकल भी कि चार्जिंग ढांचे की कमी को झेल सके।

इस लचीलापन (flexibility) ने चीनी ऑटो कंपनियों को बड़ा फायदा दिया है। जबकि कई प्रतिस्पर्धी कंपनियां सिर्फ एक ही तकनीक (जैसे केवल BEV) पर अटकी हैं, चीन की कंपनियां अलग-अलग बाज़ारों की ज़रूरत के हिसाब से अपनी पेशकश बदल सकती हैं।

कई तकनीकें साथ-साथ

विशेषज्ञ माइकल डन के अनुसार, पहले ये सोचा गया था कि बहुत जल्दी पूरी दुनिया सिर्फ बैटरी गाड़ियों की ओर बढ़ जाएगी। लेकिन अब साफ है कि ये अनुमान हकीकत से बहुत ऊँचा था।
वास्तव में आने वाले कई सालों तक कई तकनीकें (हाइब्रिड, REEV, BEV, पेट्रोल) एक साथ चलेंगी।

उनके शब्दों में –

“PHEVS (प्लग-इन हाइब्रिड्स) एक पुल हैं। ये शुद्ध पेट्रोल गाड़ियों से बेहतर हैं। हां, EVS की ओर रफ्तार उम्मीद से धीमी है, लेकिन दिशा अब भी सही है।”

इसको ऐसे कह लें कि

दुनिया अभी पूरी तरह बैटरी गाड़ियों पर शिफ्ट होने के लिए तैयार नहीं है। आने वाले कई सालों तक हाइब्रिड, REEVs और बैटरी गाड़ियां सब साथ-साथ मौजूद रहेंगी। चीन इस लचीलेपन का फायदा उठाकर अपने वाहनों को दुनिया भर में बेच रहा है, जबकि यूरोप और बाकी देशों की नीतियां व ढांचा अभी विकास की राह पर हैं। लंबी अवधि में लक्ष्य अब भी वही है – शून्य उत्सर्जन वाले वाहन।

(प्रस्तुति -त्रिपाठी पारिजात)

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