Dr PS Tripathi ‘Himanshu’ जी, मेरे स्वर्गीय पिता की कलम से इस धार्मिक आख्यान का गहन अंतर्निहित भाव प्रस्तुत है इस आलेख में..
एक सांस्कृतिक मर्म : जिए भालु-कपि निशिचर नाहीं !
गोस्वामी तुलसीदास के रामचरित मानस के लंका काण्ड में रावण वध के बाद देवराज इंद्र ने आकर प्रभु श्री राम की स्तुति की और उनसे अपने लिए कुछ कर्त्तव्य पूछा. श्री राम ने उनसे युद्धभूमि में अमृत वर्षा करने के लिए कहा. यह सुधा-वृष्टि दोनों ही पक्षों में एक सी हुई. किन्तु उससे जीवित केवल भालु-कपि ही हुए, निशाचर नहीं, ऐसा क्यों ?
एक सर्व-सामान्य विश्वास है कि मरते समय जो व्यक्ति जिसका ध्यान करता और नाम लेता हुआ अपनी अंतिम साँसें छोड़ता है, वह मृत्यु के पश्चात उसी को प्राप्त होता है. ”अंत मति सो गति ”
युद्ध में रावण पक्ष के निशाचर क्रोध के आवेश में राम का ध्यान या दर्शन करते-करते तथा उन्हें मारने पकड़ने की बात करते-करते मरते थे. अतः मर कर वे सभी श्री राम को प्राप्त हुए. जिन्हें प्राप्त कर जीव का फिर जन्म नहीं होता. अस्तु, मृत राक्षस जीवित नहीं हुए, ना ही उनके जीवित होने की आवश्यकता ही थी. जो तरा हमेशा को गया.
वानर-भालु युद्ध के आवेग में रावण को देखते, ध्यान करते और उसका ही नाम चिल्लाते और मारने की बात कहते हुए मरते थे, अतः मर कर वे राक्षसों की गति को प्राप्त हुए. वे सदगति प्राप्त होने से वंचित रह गए. उन्हें प्रभु श्री राम का ध्यान करते-करते, उनका उद्धारक नाम लेते-लेते यथा समय बाद में मरना सर्वथा आवश्यक था. अतः सुधा-वृष्टि से वे, प्रभु इच्छा से जीवित हो उठे. प्रभु श्री राम के बिना भव-संतरण कहाँ ?
साधक सिद्ध विमुक्त उदासी, कवी कोविद कृतज्ञ सन्यासी !!
जोगी शूर सु-तापस ग्यानी, धर्म निरत पंडित विज्ञानी !!
तरै न बिनु सेये मम स्वामी ! राम नमामि नमामि नमामि !!
(राम चरित मानस, उत्तरकाण्ड)