Gawaskar Love Story: एक ऑटोग्राफ़ से शुरू हुई उम्रभर की संगत: सुनील गावस्कर और मार्शनील की वह प्रेम कहानी जिसने क्रिकेट से आगे जीवन को जीता..
कुछ रिश्ते योजनाओं की नहीं, बल्कि किस्मत की लिखावट होते हैं। वे बनाए नहीं जाते, बल्कि अपने आप बन जाते हैं। ऐसी ही एक भावनात्मक और सच्ची प्रेम कहानी की शुरुआत 1970 के दशक की एक शांत दोपहर को दिल्ली के एक क्रिकेट स्टेडियम में हुई थी।
वह समय जब सूरज पूरी चमक के साथ मैदान को रोशन कर रहा था, भारतीय क्रिकेट टीम अभ्यास कर रही थी और दर्शक दीर्घा में बैठी युवतियों की आँखों में सपने बस रहे थे – खेल के, खिलाड़ियों के और भविष्य के भी। उन्हीं दर्शकों में कानपुर से पढ़ाई के सिलसिले में दिल्ली आई एक युवती मौजूद थीं – मार्शनील। क्रिकेट उन्हें पसंद था, लेकिन भारतीय टीम के ओपनर सुनील गावस्कर उन्हें कुछ अधिक ही आकर्षित करते थे।
लंच ब्रेक के दौरान खिलाड़ियों से ऑटोग्राफ़ लेने की अनुमति मिली। भीड़ उमड़ पड़ी। अधिकांश खिलाड़ी प्रशंसकों से घिरे थे, लेकिन थोड़ी दूरी पर एक शांत, अनुशासित और गंभीर स्वभाव का युवक खड़ा था – वही सुनील गावस्कर। उनकी आँखों की स्थिरता और व्यक्तित्व की सादगी ने मार्शनील को अनायास ही अपनी ओर खींच लिया।
मार्शनील ने सहज भाव से उनसे पूछा – “क्या आप ऑटोग्राफ़ देंगे?”
काग़ज़ पर तो हस्ताक्षर हुए, लेकिन उसी पल दो दिलों के बीच भी एक अदृश्य हस्ताक्षर हो गया। यह कोई फिल्मी प्रेम नहीं था, न ही शोर-शराबे वाला आकर्षण – यह एक शांत एहसास था, जिसमें बिना शब्दों के ही बहुत कुछ समझ लिया गया।
उस एक क्षण ने दो ज़िंदगियों को एक नई दिशा दे दी।
कुछ ही समय बाद सुनील गावस्कर कानपुर पहुँचे – इस बार क्रिकेट खेलने नहीं, बल्कि जीवन की सबसे अहम पारी शुरू करने का प्रस्ताव लेकर। बिना किसी तामझाम, पूरी सादगी और सम्मान के साथ उन्होंने मार्शनील से विवाह का प्रस्ताव रखा। मार्शनील ने सहमति दी – और एक प्रशंसक, जीवनसाथी बन गई।
धीरे-धीरे यह खबर फैलने लगी। अख़बारों में कानपुर आने-जाने की चर्चा हुई, मित्रों के घर रुकने की बातें सामने आईं और अटकलें भी लगने लगीं। लेकिन इस प्रेम को इन चर्चाओं से कोई फर्क नहीं पड़ा। इस रिश्ते के सेतु बने मित्र अजय गुप्ता, जिन्होंने परिवारों को मिलवाया, मैच के टिकट भिजवाए और दोनों परिवारों के बीच भरोसे की नींव रखी।
23 सितंबर 1974 को यह रिश्ता सामाजिक बंधन में बंध गया। दो अलग दुनिया, दो अलग पृष्ठभूमियाँ – एक साझा जीवन के सूत्र में जुड़ गईं।
समय के साथ ज़िम्मेदारियाँ बढ़ीं, यात्राएँ लंबी हुईं और परिवार का दायरा फैलता गया। उनके पुत्र रोहन का जन्म हुआ। बाद में परिवार में नई पीढ़ी आई – पोती रेहा और पोते विवान।
आज जब सुनील गावस्कर पीछे मुड़कर देखते हैं, तो वे स्वीकार करते हैं कि क्रिकेट करियर की व्यस्तताओं के कारण वे पिता के रूप में वह समय नहीं दे पाए जो देना चाहते थे। लेकिन उनका मानना है कि अगली पीढ़ी उस खालीपन को भर देती है, जिसे पिछली पीढ़ी अधूरा छोड़ देती है।
यह कहानी किसी किताब के आख़िरी पन्ने पर समाप्त नहीं होती — क्योंकि यह प्रेम आज भी जारी है। यादों में, सादगी में और उस पहले ऑटोग्राफ़ में, जिसने दो ज़िंदगियों को हमेशा के लिए एक-दूसरे से जोड़ दिया।
(प्रस्तुति – त्रिपाठी पारिजात)



